अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच से इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने महाशक्ति अमेरिका के कड़े दबाव को दरकिनार करते हुए जैसे ही भारत और उसकी 140 करोड़ की आबादी का जिक्र(Netanyahu Statement on India) किया, वैसे ही वैश्विक भू-राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई है. दरअसल, यह बयान सिर्फ दो देशों की दोस्ती तक सीमित नहीं है बल्कि यह इस बात का जिंदा सुबूत है कि जिस जनशक्ति को भारत के भीतर अक्सर एक भारी ‘बोझ’, ‘गरीबी का कारण’ या प्रशासनिक ‘सिरदर्द’ के रूप में देखा जाता रहा है, वो असल में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के चेस-बोर्ड पर भारत का सबसे अचूक और शक्तिशाली ‘ब्रह्मास्त्र’ बन चुकी है.
आज के दौर में जब वैश्विक समीकरण बड़ी तेजी से बदल रहे हैं, तब रूस से लेकर इजरायल तक, दुनिया के बड़े-बड़े मुल्क भारत की इसी विशाल जनशक्ति के सामने नतमस्तक नजर आते हैं. आइए पूरी गहराई से समझते हैं कि कैसे भारत की यह विशाल आबादी आज वैश्विक महाशक्तियों के लिए एक ऐसी मजबूरी और ताकत (India 140 Crore Population Global Power) बन चुकी है, जिसे कोई भी नजरअंदाज नहीं कर सकता.
बता दें कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक राजनीति का पहला और आखिरी शाश्वत नियम हमेशा से ‘व्यापारिक मुनाफा’ रहा है, और इसी मोर्चे पर भारत की आबादी दुनिया की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत बन जाती है. भारत आज के समय में पूरी दुनिया का सबसे बड़ा, सबसे जीवंत और सबसे तेजी से बढ़ता हुआ कंज्यूमर मार्केट यानी उपभोक्ता बाजार है.
चाहे अमेरिका की दिग्गज टेक कंपनियां गूगल और एप्पल हों, रूस का अथाह कच्चा तेल हो, या फिर इजरायल के अत्याधुनिक सैन्य और हाई-टेक उपकरण-दुनिया की हर छोटी-बड़ी महाशक्ति को अपनी अर्थव्यवस्था का पहिया चालू रखने के लिए भारत के इन 140 करोड़ खरीदारों की सख्त जरूरत है.
वैश्विक नेता बहुत अच्छे से जानते हैं कि अगर भविष्य में पश्चिमी देश या कोई अन्य ताकत उन पर कोई कड़ा राजनयिक दबाव या प्रतिबंध बनाती भी है, तो भी भारत के इस अकेले विशाल बाजार के दम पर उनके व्यापारिक हित पूरी तरह सुरक्षित रह सकते हैं. इसे आधुनिक कूटनीति की भाषा में ‘इकोनॉमिक शील्ड’ यानी आर्थिक ढाल कहा जाता है, जहां देश की विशाल आबादी ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी सबसे बड़ी सुरक्षा गारंटी बन जाती है.
इस वक्त दुनिया के अधिकांश विकसित और संपन्न देश एक बेहद अजीब और गंभीर जनसांख्यिकीय संकट से जूझ रहे हैं, क्योंकि वहां की आबादी बहुत तेजी से बूढ़ी हो रही है. चीन, जापान, पूरे यूरोप और खुद सुपरपावर अमेरिका में काम करने वाले युवाओं यानी वर्किंग पापुलेशन की भारी कमी हो चुकी है, जिसके कारण उनकी औद्योगिक विकास दर थमने की कगार पर है. इसके ठीक उलट, भारत इस समय पूरी दुनिया का सबसे युवा देश बना हुआ है, जिसकी औसत उम्र महज 28-29 साल के आसपास है.
आज इजरायल जैसे देशों को अपने इंफ्रास्ट्रक्चर, कंस्ट्रक्शन, एग्रीकल्चर और हाई-टेक सेक्टर्स को चालू रखने के लिए बड़े पैमाने पर एक भरोसेमंद और कुशल वर्कफोर्स की जरूरत है, जिसे सिर्फ और सिर्फ भारत ही पूरा कर सकता है.
अमेरिकी सिलिकॉन वैली के दिग्गज सीईओ से लेकर खाड़ी देशों के विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर और इजरायल की एडवांस टेक लैब्स तक-भारत की यह युवा आबादी ग्लोबल सप्लाई चेन की असली रीढ़ बन चुकी है. पूरी दुनिया यह हकीकत जानती है कि आने वाले तीन दशकों तक अगर वैश्विक विकास की गति को बनाए रखना है, तो भारत के इस ‘जवान खून’ की जरूरत हर देश को पड़ने वाली है.
आज के डिजिटल, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के आधुनिक दौर में युद्ध सिर्फ मैदान पर मिसाइलों या टैंकों से नहीं लड़ा जाता बल्कि इंटरनेट पर ‘नैरेटिव’ यानी विमर्श, जनमत और प्रोपेगैंडा के स्तर पर भी लड़ा जाता है. इस नए जमाने के डिजिटल वॉर में भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे आक्रामक डिजिटल फौज मौजूद है, क्योंकि भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा इंटरनेट, यूट्यूब और सोशल मीडिया यूजर्स रहते हैं.
जब भी संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इजरायल या रूस के खिलाफ पश्चिमी ताकतों द्वारा कोई एकतरफा नैरेटिव बनाने या उन्हें वैश्विक स्तर पर घेरने की कोशिश होती है, तो भारत की यह विशाल डिजिटल आबादी जिस तरफ खड़ी होती है, ग्लोबल नैरेटिव का पलड़ा तुरंत उसी तरफ झुक जाता है.
अंतरराष्ट्रीय नेता जब भारत के ‘140 करोड़ लोगों’ का विशेष जिक्र करते हैं, तो वे असल में इसी ‘पब्लिक ओपिनियन पॉवर’ की ताकत को पहचान रहे होते हैं, जो पश्चिमी मीडिया के बड़े से बड़े प्रोपेगैंडा को चंद घंटों में सोशल मीडिया पर पूरी तरह ध्वस्त करने का माद्दा रखती है.
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हालिया वैश्विक इतिहास इस बात का सबसे बड़ा गवाह है कि कैसे भारत ने अपनी इस विशाल आबादी के दम पर दुनिया के बड़े-बड़े समीकरणों को उलट कर रख दिया है और संकट के समय महाशक्तियों का इकलौता सहारा बना है. इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान देखने को मिला, जब अमेरिका और पूरे यूरोप ने रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उसका तेल खरीदने पर पूरी तरह रोक लगा दी थी और रूसी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में थी.
उस बेहद नाजुक वक्त में भारत अपनी 140 करोड़ की आबादी की विशाल ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस के साथ मजबूती से खड़ा रहा और रिकॉर्ड मात्रा में रूसी तेल खरीदा, जिससे रूस की डूबती अर्थव्यवस्था को संजीवनी मिल गई. पश्चिमी देश भारत पर लगातार दबाव बनाते रह गए, लेकिन भारत की विशाल मार्केट वैल्यू के आगे आखिरकार उन्हें झुकना ही पड़ा.
ठीक इसी तरह, आज इजरायल (Netanyahu Statement on India) भी पूरी तरह वाकिफ है कि जब वैश्विक मंचों पर वह अलग-अलग मुद्दों पर अकेला पड़ता है, तब भारत की यह विशाल जनशक्ति और उसका संतुलित कूटनीतिक रुख उसके लिए दुनिया में सबसे बड़ा नैतिक, रणनीतिक और राजनीतिक संबल साबित होता है.
-भारत एक्सप्रेस
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