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‘जीरो-टू-हीरो’: 10वीं फेल लड़का कैसे बना 1,30,00,00,00,000 रुपये की कंपनी का मालिक

Rakesh Chopdar Success Story: अक्सर माना जाता है कि अच्छी नौकरी या बड़ा कारोबार करने के लिए शानदार डिग्री होना जरूरी है. लेकिन कुछ लोग अपनी मेहनत, सीखने की ललक और अलग सोच से इस धारणा को गलत साबित कर देते हैं. हैदराबाद के उद्योगपति राकेश चोपदार (Rakesh Chopdar) ऐसी ही एक मिसाल हैं. वह 10वीं की परीक्षा पास नहीं कर पाए, कॉलेज की पढ़ाई भी नहीं की, लेकिन आज उनकी कंपनी आजाद इंजीनियरिंग (Azad Engineering) देश की अग्रणी हाई-प्रिसिजन इंजीनियरिंग कंपनियों में गिनी जाती है. कंपनी का बाजार पूंजीकरण अब 13,000 करोड़ रुपये से भी अधिक पहुंच चुका है.

10वीं में असफलता, लेकिन हौसला नहीं टूटा

राकेश चोपदार की पढ़ाई 10वीं कक्षा में ही रुक गई. परीक्षा में फेल होने के बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया. कई लोगों ने मान लिया कि अब उनका भविष्य सीमित रह जाएगा. लेकिन राकेश ने अपनी कमी को कमजोरी नहीं बनने दिया. उन्होंने किताबों की बजाय मशीनों से सीखना शुरू किया.

उनके पिता की एक छोटी-सी फास्टनर बनाने की फैक्ट्री थी, जहां नट-बोल्ट तैयार किए जाते थे. राकेश ने वहीं से मशीनों को समझना शुरू किया. धीरे-धीरे उन्होंने उत्पादन, इंजीनियरिंग और कारोबार की बारीकियां व्यावहारिक अनुभव से सीख लीं. बिना किसी इंजीनियरिंग डिग्री के उन्होंने खुद को इस क्षेत्र का विशेषज्ञ बना लिया.

पिता के कारोबार से मिली असली सीख

राकेश ने लगभग 12 वर्षों तक अपने पिता की कंपनी में काम किया. इसी दौरान उन्होंने देखा कि केवल मशीन चलाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि गुणवत्ता, तकनीक और ग्राहक का भरोसा ही किसी कंपनी की असली ताकत होता है. इसी अनुभव ने उन्हें अपना अलग व्यवसाय शुरू करने का आत्मविश्वास दिया. उन्होंने तय किया कि वह सिर्फ पुर्जे बनाने वाली कंपनी नहीं, बल्कि विश्वस्तरीय इंजीनियरिंग समाधान देने वाला ब्रांड तैयार करेंगे.

एक सेकेंड-हैंड मशीन से हुई शुरुआत

साल 2008 में राकेश चोपदार ने हैदराबाद के बालानगर इलाके में करीब 200 वर्ग मीटर के एक छोटे से शेड में आजाद इंजीनियरिंग की स्थापना की. शुरुआत के समय उनके पास केवल एक सेकेंड-हैंड सीएनसी मशीन थी. संसाधन सीमित थे, लेकिन इरादे बड़े थे. कंपनी ने धीरे-धीरे हाई-प्रिसिजन मशीनिंग और जटिल इंजीनियरिंग उत्पादों पर काम शुरू किया. शुरुआती दिनों में हर नया ऑर्डर उनके लिए सीखने और खुद को साबित करने का मौका था.

एक एयरोफॉइल ने बदल दी पूरी कहानी

राकेश के जीवन में बड़ा मोड़ तब आया जब एक विदेशी ग्राहक उनके पिता की फैक्ट्री में फास्टनर खरीदने आया. उसके पास जेट इंजन में इस्तेमाल होने वाला एक एयरोफॉइल था और वह दुनिया में बेहतर गुणवत्ता वाले सप्लायर की तलाश कर रहा था.

राकेश ने उसे भरोसा दिलाया कि वह इस जटिल पुर्जे को तैयार करने की कोशिश करेंगे. कई महीनों की मेहनत के बाद जब उन्होंने तैयार उत्पाद ग्राहक को सौंपा, तो वह उसकी गुणवत्ता देखकर हैरान रह गया. यही ऑर्डर आगे चलकर आजाद इंजीनियरिंग के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार के दरवाजे खोलने वाला साबित हुआ.

नवाचार को बनाया सबसे बड़ी ताकत

राकेश हमेशा नई तकनीक और चुनौतीपूर्ण उत्पादों पर काम करने में विश्वास रखते हैं. उनकी कंपनी गैस टर्बाइन, स्टीम टर्बाइन, एयरो इंजन और ऊर्जा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले अत्यधिक जटिल और सटीक पुर्जों का निर्माण करती है.

लगातार अनुसंधान और गुणवत्ता पर फोकस की वजह से कंपनी ने ऐसे उत्पाद विकसित किए, जिन्होंने वैश्विक इंजीनियरिंग कंपनियों का भी ध्यान आकर्षित किया. यही कारण है कि रक्षा और एयरोस्पेस जैसे अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों में भी कंपनी ने अपनी मजबूत पहचान बनाई.

दुनिया की दिग्गज कंपनियां बनीं साझेदार

आज आजाद इंजीनियरिंग सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है. कंपनी एयरोस्पेस, रक्षा, ऊर्जा और ऑयल-एंड-गैस सेक्टर के लिए अत्याधुनिक कंपोनेंट तैयार करती है.

कंपनी के ग्राहकों और साझेदारों में दुनिया की बड़ी कंपनियां जैसे Boeing, Rolls-Royce और GE शामिल हैं. वहीं भारत के रक्षा अनुसंधान संगठन DRDO के साथ भी कंपनी की साझेदारी है. डीआरडीओ के लिए हाइब्रिड टर्बो-गैस जनरेटर इंजन के निर्माण का काम भी कंपनी को मिला है.


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छोटे कारोबार से हजारों करोड़ की कंपनी तक

आजाद इंजीनियरिंग ने बेहद कम समय में उल्लेखनीय विकास किया. शुरुआत में कंपनी का कारोबार करीब 2 करोड़ रुपये का था, इसके बाद लगातार नई तकनीक, गुणवत्ता और वैश्विक ग्राहकों पर ध्यान देने का असर दिखाई दिया.

वित्त वर्ष 2024-25 में कंपनी का राजस्व लगभग 400 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने के कुछ ही महीनों के भीतर इसका बाजार पूंजीकरण 1 अरब डॉलर से अधिक हो गया. फिलहाल कंपनी का मार्केट कैप 13,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है.

-भारत एक्सप्रेस

Sahil Singh

पढ़ने-लिखने से शुरू हुआ सफर खबरों तक ले गया. पत्रकारिता को करियर बनाने का एक मात्र उद्देश्य—पढ़ना, साथ ही नई-नई चीज़ों को जानने की जिज्ञासा रखना था. आज से पहले ‘आज तक’ चैनल, उसके बाद दायित्व वेबसाइट, और अब भारत एक्सप्रेस में बतौर सब-एडिटर की भूमिका निभा रहा हूं.

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