संसद में जब खान एवं खनिज विकास और विनियमन (MMDR) संशोधन बिल पारित हुआ था, तब झारखंड के सियासी गलियारों में भारी हलचल देखने को मिली थी. खुद मुख्यमंत्री और सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने केंद्र सरकार के इस कानून के खिलाफ एक राज्यव्यापी और ऐतिहासिक आंदोलन छेड़ने का बड़ा ऐलान किया था.
जेएमएम ने चेतावनी दी थी कि वे राज्य से खनिजों की ढुलाई तक रोकने की योजना बना रहे हैं. हालांकि, इस घोषणा के लगभग एक महीने बीत जाने के बाद भी मैदान में कोई बड़ा जनांदोलन नजर नहीं आ रहा है.
बिल पास होने के शुरुआती दिनों में लगा था कि जेएमएम इस मुद्दे पर सड़कों पर बड़ा संग्राम करेगी, लेकिन फिलहाल यह विरोध जिला और प्रखंड स्तर के छोटे-मोटे धरनों तक ही सीमित रहकर रह गया है. जब इस सुस्ती पर सवाल उठाया गया, तो जेएमएम के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज पांडे ने कहा कि केंद्र सरकार झारखंड के तेवरों को कम आंकने की भूल न करे, पार्टी बहुत जल्द एक बड़े आंदोलन की रूपरेखा के साथ सड़क पर उतरेगी.
दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी (BJP) इस ढिलाई पर मुख्यमंत्री और सत्ताधारी दल पर जमकर तंज कस रही है. बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता मृत्युंजय शर्मा का कहना है कि कोई भी आंदोलन तभी बड़ा रूप लेता है जब उसके पीछे आम जनता की ताकत होती है. बीजेपी नेताओं का दावा है कि वे राज्य की जनता को यह समझाने में सफल रहे हैं कि यह बिल झारखंड के विकास के लिए कितना जरूरी है, इसलिए जनता जेएमएम के बहकावे में नहीं आई.
दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे पर क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों की कार्यशैली का अंतर साफ झलक रहा है. एक तरफ जहां जेएमएम अभी रणनीति ही बना रही है, वहीं उसकी सहयोगी पार्टी कांग्रेस लगातार बैठकों और प्रदर्शनों के जरिए आक्रामक रुख अपनाए हुए है. कांग्रेस ने इस विरोध की कड़ी में 26 सितंबर को लोक भवन का घेराव करने का फैसला किया है.
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-भारत एक्सप्रेस
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