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Kerala Grand Mufti: ‘महिलाएं घर में रहें’ बयान पर विवाद, शालिनी अली ने कहा- महिला कोई सोने का हार नहीं

Kerala Grand Mufti Women Statement: केरल के ग्रैंड मुफ्ती शेख अबूबकर अहमद के महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित रखने वाले बयान ने देश में नई बहस छेड़ दी है. कोच्चि में आयोजित एक धार्मिक सम्मेलन में उन्होंने कहा कि महिलाओं को घर में रहना चाहिए और सार्वजनिक जीवन में नहीं आना चाहिए. उन्होंने अपनी बात समझाने के लिए महिलाओं की तुलना सोने के आभूषण से की और कहा कि जिस तरह सोने के हार को सुरक्षित रखने के लिए डिब्बे में रखा जाता है, उसी तरह महिलाओं को भी घर में रहना चाहिए. उनके इस बयान पर मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की राष्ट्रीय संयोजक और महिला विंग की प्रमुख डॉ. शालिनी अली ने कड़ा विरोध जताया है. उन्होंने कहा कि महिलाओं को सम्मान के नाम पर घर में बंद करना सम्मान नहीं, बल्कि उनकी स्वतंत्रता, प्रतिभा और क्षमता पर पहरा लगाना है.

‘महिला कोई सोने का हार नहीं’

ग्रैंड मुफ्ती ने अपने भाषण में सोने के हार का उदाहरण देते हुए कहा कि आभूषण को उसकी सुंदरता और कीमत सुरक्षित रखने के लिए अलमारी और डिब्बे में रखा जाता है. इसी तर्क के आधार पर उन्होंने महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में आने को लेकर आपत्ति जताई. डॉ. शालिनी अली ने इसी तुलना को बयान का सबसे आपत्तिजनक हिस्सा बताया. उनका कहना है कि महिला कोई निर्जीव वस्तु या सजावटी सामान नहीं है, जिसे किसी डिब्बे में बंद करके रखा जाए. महिला अपने सपनों, प्रतिभा, मेहनत और फैसले लेने के अधिकार के साथ जीने वाली स्वतंत्र इंसान है.

‘सम्मान के नाम पर कैद स्वीकार नहीं’

डॉ. शालिनी अली ने कहा कि अगर कोई महिला घर संभालना चाहती है तो यह उसका अधिकार है, लेकिन किसी महिला को यह कहकर सार्वजनिक जीवन से दूर करना कि यही उसकी सुरक्षा या गरिमा है, उचित नहीं है. उनके मुताबिक महिलाओं को शिक्षित, आत्मनिर्भर और सक्षम बनाने के बजाय उन्हें चारदीवारी में सीमित रखने की सोच समाज को पीछे ले जाती है. उन्होंने कहा कि आज की भारतीय महिलाएं सेना, विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, शिक्षा, पत्रकारिता, विमानन, कारोबार और खेल समेत तमाम क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रही हैं.

‘देश की बेटियां सेना से लेकर अंतरिक्ष तक’

महिला सशक्तिकरण की बात करते हुए डॉ. शालिनी अली ने कहा कि भारत की बेटियां सेना के तीनों अंगों में देश की सेवा कर रही हैं. महिलाएं डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर, अर्थशास्त्री, शिक्षाविद और पायलट बनकर देश का नाम रोशन कर रही हैं. उनका सवाल है कि जिस देश की महिलाएं देश की सुरक्षा और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, वहां उन्हें सिर्फ घर की चारदीवारी तक सीमित रखने की सलाह आधुनिक भारत की वास्तविकता से कैसे मेल खा सकती है?

ग्रैंड मुफ्ती ने कुरान और पर्दे का दिया हवाला

अपने भाषण में शेख अबूबकर अहमद ने महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर रखने की अपनी बात को धार्मिक व्याख्या से जोड़ा. उन्होंने कहा कि कुरान में महिलाओं के लिए ऐसे निर्देश दिए गए हैं और पर्दा महिलाओं की गरिमा तथा सुरक्षा की रक्षा के लिए है. उन्होंने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य महिलाओं को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि उनका सम्मान और संरक्षण करना है. उनके अनुसार धार्मिक विद्वानों ने लंबे समय से इस व्यवस्था की व्याख्या की है और वे इस मुद्दे पर अपनी बात कहते रहेंगे.

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‘क्या सुरक्षा के नाम पर स्वतंत्रता छीनी जा सकती है?’

ग्रैंड मुफ्ती के तर्क के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या किसी महिला की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उसकी स्वतंत्रता सीमित करना जरूरी है? क्या महिला की गरिमा इस बात से तय होगी कि वह समाज और सार्वजनिक जीवन से कितनी दूर रहती है? या फिर उसकी गरिमा उसके अधिकारों, निर्णय लेने की स्वतंत्रता और सम्मानजनक जीवन से तय होनी चाहिए? आलोचकों का कहना है कि सुरक्षा के नाम पर महिलाओं की आवाजाही और अवसरों पर प्रतिबंध लगाने के बजाय ऐसा समाज बनाया जाना चाहिए जहां महिलाएं बिना डर के शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में हिस्सा ले सकें.

इस्लाम और महिलाओं के अधिकारों का भी किया जिक्र

ग्रैंड मुफ्ती ने अपने भाषण में इस्लाम के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि इस्लाम ने बेटियों की हत्या जैसी प्रथाओं का विरोध किया और महिलाओं को संपत्ति तथा विरासत के अधिकार दिए. उनका तर्क था कि महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर रखने वाली व्यवस्था को महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. हालांकि आलोचकों का कहना है कि धार्मिक व्याख्या के बावजूद महिला की व्यक्तिगत पसंद और नागरिक अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

‘एक बयान से पूरे मुस्लिम समाज को परिभाषित करना उचित नहीं’

इस विवाद के बीच यह अंतर करना भी जरूरी है कि किसी एक धार्मिक नेता का बयान पूरे मुस्लिम समाज या सभी मुस्लिम विद्वानों की राय का प्रतिनिधित्व नहीं करता. करोड़ों मुस्लिम महिलाओं और पुरुषों की सोच को किसी एक व्यक्ति के बयान के आधार पर परिभाषित करना उचित नहीं होगा. इसी तरह इस बयान की आलोचना को भी किसी धर्म के खिलाफ अभियान के रूप में देखने के बजाय महिलाओं की स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों से जुड़े सवाल के तौर पर देखा जाना चाहिए.

असली सवाल: सम्मान या नियंत्रण?

पूरे विवाद का केंद्र आखिरकार एक बुनियादी सवाल पर आकर टिकता है—महिला को सम्मान चाहिए या उसके नाम पर नियंत्रण? अगर कोई महिला परिवार और घर को प्राथमिकता देती है तो यह उसका फैसला होना चाहिए. और अगर वह सेना में जाना चाहती है, डॉक्टर, वैज्ञानिक, पत्रकार या पायलट बनना चाहती है, कारोबार करना चाहती है या सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होना चाहती है, तो यह चुनाव भी उसी का होना चाहिए.

भारत की महिलाएं पहले ही यह साबित कर चुकी हैं कि उनकी क्षमताओं की कोई सीमा नहीं है. इसलिए बहस सिर्फ इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि महिलाएं घर में रहें या बाहर निकलें, बल्कि इस बात पर होनी चाहिए कि क्या हर महिला को अपने जीवन का फैसला खुद लेने की आजादी है? क्योंकि महिला किसी डिब्बे में रखी जाने वाली वस्तु नहीं है. वह अपने भविष्य की निर्माता है. उसे अवसर देकर परिवार, समाज और देश—तीनों को मजबूत किया जा सकता है.

भारत एक्सप्रेस

Swati Pandey

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