keralam Nilavilakku controversy: भारत के केरल राज्य से एक बेहद हैरान करने वाला और सनसनीखेज मामला सामने आया है. इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के इतिहास में पहली बार महिला विधायक बनकर इतिहास रचने वाली फातिमा तहिलिया अचानक इस्लामिक कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गई हैं. उनका ‘गुनाह’ सिर्फ इतना है कि उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान एक पारंपरिक भारतीय दीपक जला दिया था. इस बात पर मुस्लिम संगठनों के मौलाना इस कदर भड़क उठे हैं कि उन्होंने सरेआम इसे ‘हराम’ करार देते हुए विधायक को इस्लाम से बेदखल करने की धमकी दे डाली है.
यह पूरा हाई-वोल्टेज ड्रामा 25 मई 2026 को पेराम्ब्रा (Perambra) निर्वाचन क्षेत्र में शुरू हुआ. 2026 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे के दिग्गज नेता टीपी रामकृष्णन को धूल चटाने वाली फातिमा तहिलिया अपने क्षेत्र में महिलाओं के एक समूह द्वारा शुरू किए गए रेस्तरां का उद्घाटन करने पहुंची थीं. यहां उन्होंने शुभ शुरुआत के लिए पारंपरिक तेल का दीपक यानी ‘निलाविलक्कु’ (Nilavilakku) जलाया. बस फिर क्या था, इस ‘दीपक’ की रोशनी से केरल के कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों की आंखों में चुभन होने लगी.
विधायक के इस कदम के बाद ‘समस्त केरल जमिय्यतुल उलमा’ नामक संगठन ने तुरंत एक आपातकालीन बैठक बुलाई और फातिमा पर जोरदार हमला बोल दिया. संगठन के नेताओं ने सख्त लहजे में फतवा सा जारी करते हुए कहा कि निलाविलक्कु जलाना गैर-मुसलमानों की परंपरा है और कोई भी सच्चा मुसलमान ऐसा नहीं कर सकता. उन्होंने दावा किया कि अगर कोई मुसलमान इसे धार्मिक मान्यता के आधार पर करता है, तो वह सीधा ‘इस्लाम से बाहर’ हो जाएगा. यहां तक कि अगर इसे सिर्फ एक ‘परंपरा’ या देखा-देखी में भी किया गया है, तब भी यह ‘हराम’ और ‘गुनाह’ की श्रेणी में ही आएगा.
संगठन के वरिष्ठ नेता अब्दुल हमीद फैजी अंबालाक्कदावु ने आग में घी डालते हुए कहा कि, “इस्लाम अपने अनुयायियों को दूसरे धर्मों की परंपराओं का पालन करने की कतई अनुमति नहीं देता.” इस खुले फरमान और चारों तरफ से हो रहे हमलों के बाद केरल की राजनीति में भूचाल आ गया है. हालांकि, विवाद को बढ़ता देख विधायक फातिमा तहिलिया ने चुप्पी साध ली है. उन्होंने इस पूरे मुद्दे पर आगे कोई भी टिप्पणी करने से साफ इनकार कर दिया है.
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फातिमा तहिलिया की इस खामोशी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. एक तरफ वो महिलाएं हैं जो 21वीं सदी में सियासत की सीढ़ियां चढ़ रही हैं और दूसरी तरफ वो कट्टरपंथी सोच है जो आज भी एक ‘दीपक’ जलाने को धर्म के लिए खतरा मानती है. केरल की सियासत में इस विवाद ने एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या सार्वजनिक जीवन में काम कर रहे जनप्रतिनिधियों को भी ऐसे धार्मिक फरमानों की जंजीरों में जकड़ कर रखा जा सकता है?
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