Lab Grown Gold news: सदियों से इंसानों का एक सबसे बड़ा सपना रहा है कि किसी साधारण धातु को छूकर या बदलकर उसे सोने में तब्दील कर देना. लेकिन विज्ञान कथाओं जैसी लगने वाली यह बात अब हकीकत में बदल चुकी है. दरअसल सैन फ्रांसिस्को के एक न्यूक्लियर फ्यूजन स्टार्टअप ‘मैराथन फ्यूजन’ (Marathon Fusion) ने न्यूक्लियर फ्यूज़न तकनीक के जरिए पारे यानी मर्करी को शुद्ध और स्थिर सोने में बदलने का सनसनीखेज कारनामा कर दिखाया है. कंपनी का दावा है कि उन्होंने आधुनिक कीमियागरी के जरिए सर्न (CERN) द्वारा बनाए गए सोने के पिछले रिकॉर्ड को भी 10 गुना पीछे छोड़ दिया है.
बता दें इस खबर के सामने आते ही वैश्विक बाजारों और निवेशकों के बीच हड़कंप मच गया है. हर कोई यही सोच रहा है कि क्या लैब-ग्रोन डायमंड की तरह अब ‘लैब-ग्रोन गोल्ड’ भी मार्केट में आ जाएगा और क्या सोने की कीमतें 80-90% तक गिर जाएंगी? आइए जानते हैं इस हैरान कर देने वाली रिसर्च के पीछे का पूरा सच.
ज्ञात रहे यह कोई जादुई ट्रिक नहीं बल्कि विशुद्ध परमाणु विज्ञान है. मैराथन फ्यूजन के वैज्ञानिकों ने इसके लिए ‘न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन’ प्रक्रिया का इस्तेमाल किया है:
न्यूट्रॉन की बौछार: सबसे पहले ड्यूटेरियम-ट्रिटियम फ्यूजन से निकलने वाले अत्यंत उच्च-ऊर्जा न्यूट्रॉन को पारे के एक स्थिर आइसोटोप (Mercury-198) पर टारगेट किया जाता है.
परमाणु संरचना में बदलाव: इस बमबारी से पारा एक अस्थाई आइसोटोप (Mercury-197) में बदल जाता है.
रेडियोएक्टिव क्षय: कुछ ही दिनों के भीतर यह अस्थाई पारा स्वाभाविक रूप से बदलता है और अंततः Gold-197 यानी 100% असली, शुद्ध और स्थिर सोने में परिवर्तित हो जाता है.
Last month, we demonstrated high-rate alchemy: turning mercury into real, stable gold, beating CERN’s record by a factor of 10.
Last week, we enriched isotopes in the world’s most powerful plasma centrifuge, beating the Soviet record that stood for 40 years.
Now, we’re building a fusion reactor in San Francisco to achieve record power density.
— Marathon Fusion (@MarathonFusion) October 21, 2026
इस तकनीक की सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौती इसकी रेडियोधर्मिता (Radioactivity) है. लैब में तुरंत तैयार हुआ यह सोना सीधे तौर पर पहनने या इस्तेमाल करने के लिए सुरक्षित नहीं होता. सुरक्षा मानकों के अनुसार, इसे बाजार में बेचने या इसके आभूषण बनाने से पहले 7 से 17 साल तक के ‘कूलिंग पीरियड’ (सुरक्षित स्टोरेज) में रखना होगा. इतने लंबे अंतराल के बाद ही इसकी रेडियोधर्मिता पूरी तरह खत्म होगी. ऐसे में कोई भी व्यापारी या रिफाइनरी तुरंत इस सोने को कैश नहीं कर पाएगी.
निवेशकों का सबसे बड़ा डर यह है कि जब लैब में हीरे (Lab-Grown Diamonds) बनने शुरू हुए थे, तो प्राकृतिक हीरों के दाम 80% तक गिर गए थे. लेकिन विशेषज्ञों का साफ कहना है कि सोने के साथ ऐसा होना नामुमकिन है:
लागत का जमीन-आसमान का अंतर: लैब में हीरा बनाना एक ‘फैक्ट्री’ चलाने जैसा है, जहां कार्बन को तेज दबाव में रखा जाता है. इसके विपरीत, सोने को बनाने के लिए ‘न्यूक्लियर रिएक्टर’ की जरूरत होती है. लैब में न्यूक्लियर एनर्जी की मदद से 1 ग्राम सोना बनाने का खर्च, खदान से 1 किलो सोना खोदकर निकालने से भी लाखों गुना ज्यादा है.
सीमित उत्पादन: खदानों से हर साल लगभग 3,600 टन सोना निकलता है. इसके मुकाबले मैराथन फ्यूजन का वर्तमान रिएक्टर मात्र 1 किलोवाट का है. कंपनी का अनुमान है कि अगर भविष्य में 1-गीगावाट का विशाल कमर्शियल पावर प्लांट लग भी जाए, तब भी वह साल भर में बमुश्किल 2 से 5 टन सोना ही बना पाएगा, जो वैश्विक मांग के मुकाबले ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है.
सोना सिर्फ एक आभूषण या धातु नहीं, बल्कि दुनिया की ‘असली करेंसी’ है. दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों (जैसे भारत का RBI या अमेरिकी फेडरल रिजर्व) के पास 2,22,600 टन से अधिक सोने का सुरक्षित भंडार (Gold Reserves) मौजूद है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को स्थिरता देता है. चूंकि लैब में बनने वाले सोने की मात्रा बेहद सीमित और अत्यधिक खर्चीली होगी, इसलिए केंद्रीय बैंकों के प्रभुत्व और सोने की वैश्विक कीमतों पर इसका रत्ती भर भी असर नहीं पड़ने वाला है.
मैराथन फ्यूजन के वैज्ञानिकों ने स्पष्ट(Lab Grown Gold news) किया है कि उनका प्राथमिक उद्देश्य सोना बनाकर बाजार में बेचना बिल्कुल नहीं है. कंपनी असल में स्वच्छ परमाणु ऊर्जा (Clean Energy) और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए आवश्यक मेडिकल आइसोटोप्स बनाने पर रिसर्च कर रही है. पारे से सोना बनना इस न्यूक्लियर फ्यूजन प्रक्रिया का महज एक ‘बाय-प्रोडक्ट’ (सह-उत्पाद) है, जिसका इस्तेमाल वे केवल अपनी महंगी वैज्ञानिक रिसर्च की फंडिंग जुटाने के लिए करेंगे.
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-भारत एक्सप्रेस
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