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विसर्जित मूर्तियों से बना डालीं स्टडी टेबल्स!” मल्हार और बिनीश की ‘मूर्तिकल’ तकनीक की क्यों हो रही तारीफ?

Ganesh Visarjan murti Recycling: हर साल गणेशोत्सव के बाद समुद्र तटों पर POP यानी प्लास्टर ऑफ पेरिस की खंडित और लावारिस मूर्तियों का बिखरना पर्यावरण और श्रद्धालुओं दोनों के लिए बेहद कष्टदायक होता था. लेकिन जब युवाओं का जुनून, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक सरोकार एक साथ मिलते हैं, तो बदलाव की एक ऐतिहासिक इबारत लिखी जाती है.

पर्यावरण कार्यकर्ता मल्हार कलांबे और ‘रीसायकल मैन ऑफ इंडिया’ डॉ. बिनीश देसाई ने मिलकर एक ऐसा क्रांतिकारी प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिसने समुद्र तटों के प्रदूषण को गरीब और जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई के सुनहरे अवसर में बदल दिया है. इस अनोखी पहल का नाम रखा गया है-‘मूर्तिकल’ (Murticycle).

जब आस्था बनती थी समुद्र का बोझ

हर साल गणेश विसर्जन के बाद मुंबई और गुजरात के समुद्र तटों पर पानी में न घुलने वाली पीओपी मूर्तियों के अवशेष बिखरे रहते थे. ‘बीच प्लीज इंडिया’ (Beach Please India) संस्था के संस्थापक मल्हार कलांबे पिछले कई सालों से अपनी टीम के साथ इन तटों की सफाई कर रहे थे.

मल्हार के सामने सबसे बड़ा धर्मसंकट यह था कि जिन बप्पा की मूर्तियों को कुछ दिन पहले तक भक्तिभाव से पूजा गया, उनके मलबे को कचरे के ढेर या लैंडफिल में कैसे फेंका जाए? इस समस्या का स्थायी और वैज्ञानिक समाधान तलाशना बेहद जरूरी हो गया था.

दो ‘चेंजमेकर्स’ ने ईजाद किया नया फार्मूला(Ganesh Visarjan murti Recycling)

मल्हार कलांबे ने इस चुनौती के समाधान के लिए ‘रीसायकल मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से मशहूर डॉ. बिनीश देसाई (संस्थापक, पुशपम व इको-इलेक्ट्रिक) से संपर्क किया. कचरे से अनूठी वस्तुएं बनाने में महारत हासिल कर चुके डॉ. बिनीश ने तुरंत इस चुनौती को स्वीकार किया. दोनों युवा चेंजमेकर्स ने संकल्प लिया कि वे बप्पा की मूर्तियों को न तो समुद्र को प्रदूषित करने देंगे और न ही कचरे के ढेर में सड़ने देंगे. इसी सोच के साथ जन्म हुआ ‘मूर्तिकल’ प्रोजेक्ट का.

‘मूर्तिकल’ की जादुई टेक्नोलॉजी

डॉ. बिनीश देसाई की लैब में पीओपी कचरे को रीसायकल करने के लिए एक विशेष और पर्यावरण-अनुकूल (Eco-friendly) तकनीक तैयार की गई.

पहला चरण: विसर्जन स्थलों से मूर्तियों के अवशेषों को पूरे सम्मान के साथ इकट्ठा किया जाता है.

दूसरा चरण: इन्हें क्रश करके एक रिफाइंड पाउडर तैयार किया जाता है.

तीसरा चरण: इस पाउडर में एक विशेष ऑर्गेनिक बाइंडिंग मटेरियल मिलाया जाता है. इसके बाद तैयार कंपोजिट मटेरियल को सांचों (Molds) में ढाला जाता है. नतीजे के तौर पर जो मटेरियल बनता है, वह वाटरप्रूफ, वजन में हल्का और असली लकड़ी जितना मजबूत होता है. इससे स्टडी टेबल, क्लासरूम बेंच और पेन होल्डर जैसी 12 से ज्यादा वस्तुएं बनाई जा रही हैं.

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3,000 किलो कचरे से संवरा 760 बच्चों का भविष्य

इस प्रोजेक्ट के आंकड़े किसी का भी दिल जीत लेने वाले हैं. अब तक समुद्र तटों से 3,000 किलोग्राम (3 टन) से अधिक पीओपी कचरे को रीसायकल किया जा चुका है. इस रिसाइकल्ड मटेरियल से अब तक 760 से अधिक टिकाऊ और खूबसूरत स्टडी टेबल्स बनाई जा चुकी हैं.

बता दें इन टेबल्स को महाराष्ट्र और गुजरात की स्लम बस्तियों और आर्थिक रूप से बेहद कमजोर परिवारों के बच्चों को मुफ्त में बांटा गया है. जिन बच्चों के पास घर में फर्श पर बैठकर पढ़ने के सिवा कोई चारा नहीं था, आज वे बप्पा के इस ‘आशीर्वाद’ रूपी मेज पर अपना बेहतर भविष्य लिख रहे हैं.

दुनिया के लिए ‘सस्टेनेबल सेलिब्रेशन’ का नया मॉडल

मल्हार कलांबे और डॉ. बिनीश देसाई का ‘मूर्तिकल’ प्रोजेक्ट सिर्फ एक रीसाइक्लिंग ड्राइव नहीं है, बल्कि यह पूरे देश और दुनिया के सामने ‘सर्कुलर इकॉनमी’ (Circular Economy) का एक अनूठा मॉडल पेश करता है. यह पहल साबित करती है कि हमारी धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक बन सकते हैं. जो मूर्तियां कल तक जल प्रदूषण का कारण बनती थीं, वे आज देश की नई पीढ़ी को शिक्षित और सशक्त बनाने का जरिया बन चुकी हैं.

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-भारत एक्सप्रेस

Rohit Agrawal

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