Narottam Mishra
Narottam Mishra: मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के सबसे विवादित और चर्चित चेहरे के रूप में पहचान रखने वाले नरोत्तम मिश्रा की सत्ता में वापसी की उम्मीदों को करारा झटका लगा है. दतिया विधानसभा में होने वाले उपचुनाव में पार्टी ने उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया. जिसके बाद उनके समर्थक बेहद नाराज हो गए और हिंसा पर उतर आए. उन्होंने शनिवार को नेशनल हाइवे-44 को जाम कर दिया. जब पुलिस जाम छुड़ाने और समर्थकों को समझाने की कोशिश करने पहुंची तो वो पुलिस पर ही पथराव करने लगे.
नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों के इस तांडव में पुलिस अधीक्षक सहित कई पुलिसकर्मियों को चोटें आई है. बताया जा रहा है कि मिश्रा के समर्थकों ने करीब 12 घंटे तक सड़क जाम रखा. जब प्रदर्शनकारी पथराव करने लगे तो पुलिस को उन्हें हटाने के लिए आंसू गैस के गोले तक छोड़ने पड़े. इस मामले में कई समर्थकों को हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया है.
मध्य प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा सूबे की राजनीति के प्रमुख चेहरे के तौर पर गिने जाते हैं. जब मध्य प्रदेश में शिवराज की सरकार थी, तो उनकी हैसियत नंबर दो की थी. आज उन्हें पार्टी ने विधानसभा उपचुनाव में टिकट देने से मना कर दिया. आखिर शिवराज कैबिनेट में सबसे ताकतवर शख्स के रूप में पहचान रखने वाले नरोत्तम मिश्रा कैसे अर्श से फर्श तक पहुंच गए. और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वो बीजेपी को नुकसान पहुंचाने की हैसियत रखते हैं, और अब आगे क्या होगा?
इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमें उनके अतीत में जाना होगा. नरोत्तम मिश्रा ने 1970 के दशक में छात्र राजनीति में एंट्री की. वो जिवाजी विश्वविद्यालय में छात्र संघ के सचिव चुने गए थे. इसी दौरान वो भाजपा युवा मोर्चा से जुड़े. मध्य प्रदेश में उस समय ब्राह्मण नेताओं का जबरदस्त वर्चस्व हुआ करता था. अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर श्यामा चरण शुक्ल तक ब्राह्मण राजनीति के धुरी थे. इसी समय साल 1990 में नरोत्तम मिश्रा को डाबरा विधानसभा सीट से चुनाव में उतारा गया. इस चुनाव में उन्होंने जीत दर्ज की. इसके बाद साल 1998 और 2003 में भी वो डाबरा सीट से जीते.
नरोत्तम मिश्रा धीरे-धीरे राजनीतिक सीढ़ी चढ़ते जा रहे थे. वो मध्य प्रदेश में खुद को एक बड़े ब्राह्मण चेहरे को तौर पर स्थापित कर रहे थे. उनकी इस राजनीतिक उड़ान को पहली बार पंख साल 2005 में लगा. जब बाबूलाल गौर को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से हटाकर शिवराज सिंह चौहान को कमान सौंपी गई. शिवराज मंत्रीमंडल में उन्हें जगह मिली. इसके बाद वो साल 2008, 2013 और 2018 विधानसभा चुनाव में दतिया से लगातार जीत दर्ज की.
इस दौरान उन्होंने शहरी विकास, स्वास्थ्य, कानून आदि कई मंत्री पद संभाले. साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की, लेकिन वो अपनी सरकार बचा नहीं पाई और एक बार फिर शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने. जिसके बाद नरोत्तम मिश्रा शिवराज सिंह चौहान कैबिनेट में नंबर दो की हैसियत रखने लगे और इसका फल भी उन्हें मिला. शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें गृहमंत्री का पद सौंप दिया.
मध्य प्रदेश के इस ब्राह्मण नेता को सबसे बड़ा डेंट साल 2023 के विधानसभा चुनाव में लगा. जब दतिया से वो एक बार फिर चुनावी मैदान में उतरे. दूसरी तरफ कांग्रेस ने राजेंद्र भारती को टिकट दिया. नरोत्तम मिश्रा इससे पहले भी राजेंद्र भारती को चुनावी पटखनी दे चुके थे, इसलिए वो आश्वस्त थे कि इस बार भी राजेंद्र भारती को चारों खाने चित्त कर देंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. दतिया विधानसभा सीट से राजेंद्र भारती ने नरोत्तम मिश्रा को 7742 वोटों से हरा दिया. हालांकि इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने बंपर जीत दर्ज की. यहीं से नरोत्तम मिश्रा का डाउनफाल शुरू हो गया.
राजेंद्र भारती से हारने के बाद नरोत्तम मिश्रा पार्टी में हासिये पर चले गए. मध्य प्रदेश में जब मोहन यादव की सरकार बनी तब भी उन्हें पार्टी ने ना तो कैबिनेट में लाने की कोशिश की और ना ही किसी और तरीके से उनके कद को तरजीह दी. धीरे-धीरे पार्टी से साइडलाइन होते नरोत्तम मिश्रा को इस बार दतिया विधानसभा उपचुनाव में भी पार्टी ने टिकट नहीं दिया.
अपने विवादित बयानों, फिल्मों पर दिये गए अपने उटपटांग तर्कों से लगातार चर्चा का केंद्र बने रहने वाले नरोत्तम मिश्रा पर पीएम मोदी तक को बयान देने पड़ गए. एक बार पीएम मोदी ने उन्हें सोच समझकर बोलने की नसीहत दी थी.
सूत्रों के मुताबिक नरोत्तम मिश्रा शिवराज सिंह चौहान टीम का हिस्सा थे. जब मोहन यादव ने अपनी टीम बनाई तो उसमें उन्हें जगह नहीं मिली. जब दतिया के विधायक राजेंद्र भारती को धोखाधड़ी के एक केस में जब 2 साल की सजा सुनाई गई तो उनकी विधानसभा की सदस्यता चली गई.
इसके बाद जब दतिया में विधानसभा उपचुनाव का ऐलान हुआ तो वो एक बार फिर अपने क्षेत्र में सक्रिय हो गए थे. बताया जा रहा है कि वो नामांकन पत्र तक खरीद चुके थे. चुनाव में उनकी जीत हो इसके लिए पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें तक की, लेकिन अचानक से उनका पत्ता कट गया और उनकी जगह आशुतोष तिवारी को टिकट मिल गया.
नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने की खबर सुनते ही उनके समर्थकों का पारा चढ़ गया. वो हाइवे पर उतरकर प्रदर्शन करने लगे. उन्हें रोकने के लिए पुलिस को हल्का बल तक प्रयोग करना पड़ा.
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मध्य प्रदेश से आ रही खबरों के मुताबिक नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं मिलने से नाराज उनके समर्थक बीजेपी में मिले अपने पदों से इस्तीफा दे रहे हैं. बताया जा रहा है कि इस्तीफा देने वालों में जिला इकाइयों के अध्यक्ष और पार्षद भी शामिल हैं. अब देखना ये होगा कि क्या मोहन सरकार इस उपचुनाव में जीत दर्ज कर पाती है या फिर यहां नरोत्तम मिश्रा के नाराज समर्थक पार्टी की नैया डूबा देंगे.
-भारत एक्सप्रेस
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