नेपाल को क्यों चाहिए मुआवजा?
Nepal Flood 2026: नेपाल इन दिनों आधुनिक इतिहास की सबसे खौफनाक जल-त्रासदी से जूझ रहा है. 26 अगस्त 2026 को आई भीषण फ्लैश फ्लड ने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी घाटियों में भारी तबाही मचाई है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इस आपदा में अब तक 1,204 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 4,200 से ज्यादा नागरिक लापता हैं. मलबे के बीच 39 देशों के 590 विदेशी नागरिक अब भी जिंदगी और मौत के बीच लापता बताए जा रहे हैं. सर्वाधिक प्रभावित नुवाकोट जैसे जिलों में अपनों को खो चुके लोग अब कुश (घास) के पुतले बनाकर त्रिशूली नदी तट पर प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार करने को मजबूर हैं.
इस मानवीय हाहाकार के बीच काठमांडू से एक अजीबोगरीब कूटनीतिक विरोधाभास सामने आया है. एक तरफ प्रधानमंत्री संसद में भारत की त्वरित मदद पर सिर झुकाकर आभार जता रहे हैं तो दूसरी तरफ उनके मंत्री भारत, चीन और अमेरिका जैसे बड़े देशों से ‘मुआवजे’ और ‘क्लाइमेट बजट’ की वसूली का दावा ठोक रहे हैं.
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने संसद में आधिकारिक तौर पर भारत का आभार जताया. 26 अगस्त की आपदा के तुरंत बाद नई दिल्ली ने ‘ऑपरेशन मैत्री’ की तर्ज पर नेपाल को 70 टन से अधिक आवश्यक राहत सामग्री (कंबल, तिरपाल, हाइजीन किट) और एनडीआरएफ के विशेष बचाव दल भेजे. भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों ने हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और संकरी सुरंगों में फंसे दर्जनों श्रमिकों और नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकाला. आलोचकों को दो टूक जवाब देते हुए नेपाली पीएम ने कहा कि इतने बड़े संकट में मित्र देशों से मदद लेने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए.
लेकिन पीएम के इस ‘शुक्रिया’ के महज 48 घंटे के भीतर नेपाल सरकार का रुख अचानक पलट गया. नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल और वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले ने बयान जारी कर साफ कहा कि नेपाल अब पारंपरिक ‘दान या सहायता’ की गुहार नहीं लगाएगा, बल्कि इसे ‘क्लाइमेट जस्टिस’ और कानूनी जिम्मेदारी मानते हुए मुआवजे की मांग करेगा.
नेपाल सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ के तहत भारत, चीन और अमेरिका से आपातकालीन वित्तीय सहायता और मुआवजे का दावा ठोका है. विदेश मंत्री शिशिर खनाल का तर्क है कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में नेपाल की हिस्सेदारी 0.1% से भी कम है, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के चलते हिमालयी ग्लेशियर पिघलने का सबसे बड़ा खामियाजा नेपाल भुगत रहा है.
उन्होंने दावा है कि भारत, चीन और अमेरिका जैसे बड़े औद्योगिक उत्सर्जक देश पर्यावरण को गर्म कर रहे हैं. लिहाजा, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों (COP) के नियमों के तहत हुए नुकसान की भरपाई इन देशों के बजट से सीधे नेपाल को दी जानी चाहिए. वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले और वन मंत्री गीता चौधरी ने भोटेकोशी नदी बेसिन में टूटे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और सड़कों का हवाला देकर कहा कि यह कोई ‘खैरात’ नहीं बल्कि प्रभावित राष्ट्र का वैध अधिकार है.
भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने नेपाल के इस ‘क्लाइमेट कंपनसेशन’ के दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया है. नई दिल्ली का साफ मानना है कि भारत पड़ोसी धर्म और ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के तहत हर मानवीय संकट में सबसे पहले मदद पहुंचाता है, लेकिन किसी प्राकृतिक या क्षेत्रीय आपदा को द्विपक्षीय कानूनी मुआवजे का रूप देकर बजट वसूलने की कोशिश अस्वीकार्य है.
वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी नेपाल के दावे को एकतरफा बताता है. इंदौर के वरिष्ठ पर्यावरण वैज्ञानिक राम श्रीवास्तव के अनुसार-
“ग्लेशियर का टूटना केवल क्षेत्रीय उत्सर्जन से नहीं, बल्कि दशकों के वैश्विक तापमान बदलाव का नतीजा है. भारत खुद हिमालयी पारिस्थितिकी में ग्लेशियर झीलों (GLOF) के जोखिम से जूझ रहा है. इसे सीधे तौर पर पड़ोसी देश की ‘लायबिलिटी’ बनाकर बजट की मांग करना कूटनीतिक और वैज्ञानिक दोनों स्तरों पर अव्यावहारिक है.”
हरीश रावत (वरिष्ठ कांग्रेस नेता): “भारत ने हमेशा एक बड़े भाई की तरह संकट में हाथ बढ़ाया है. जब हमारे जवान वहां जिंदगी बचा रहे हैं, तब इस तरह की कानूनी भाषा बोलना संबंधों की मिठास को ठेस पहुंचाता है.”
दानिश अली (कांग्रेस नेता): “सहायता और मुआवजे में फर्क होता है. नेपाल हमारा अभिन्न मित्र है, लेकिन कूटनीति में मर्यादा का ध्यान रखा जाना चाहिए.”
हरीश वीरान (राज्यसभा सांसद, मुस्लिम लीग): “प्राकृतिक आपदाओं में राजनीति के बजाय जिंदगियां बचाने पर जोर होना चाहिए. क्लाइमेट फंड का मंच संयुक्त राष्ट्र है, द्विपक्षीय संबंधों में ऐसी बयानबाजी ठीक नहीं.”
इस सियासी खींचतान के बीच काठमांडू घाटी और पहाड़ी इलाकों में रेस्क्यू ऑपरेशन लगातार जारी है. विदेश मंत्रालय के ताजा अपडेट के मुताबिक, अब तक 324 विदेशी पर्यटकों को एयरलिफ्ट कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा चुका है. ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने पुष्टि की है कि उनके 5 नागरिक सुरक्षित मिल गए हैं, जिससे लापता ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों का आंकड़ा घटकर 38 रह गया है. हालांकि, हजारों नेपाली नागरिकों के लिए पुनर्वास की राह अभी भी मलबे और टूटे पुलों के बीच बेहद कठिन बनी हुई है.
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