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1..2..लगातार हार से 10वीं बार: नीतीश कुमार कैसे बने लालू के हनुमान से उनके धुर-विरोधी? ‘मुन्ना’ से मुख्यमंत्री का सफर

Nitish Kumar Untold Story: बिहार विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत मिलने के बाद नीतीश कुमार 10वीं बार मुख्यमंत्री बन गए हैं. हालांकि, क्या आपको पता है उन्हें शुरुआत में लगातार हार का सामने करना पड़ा था. इससे निराश होकर उन्हें चुनाव न लड़ने की शपथ खा ली थी. हालांकि, उन्हें अपने 2 चुनाव के बाद एक जीत मिली. इसके ठीक 5 साल बाद दिल्ली पहुंच गए. एक जमाना था कि वो लालू यादव के हनुमान कहा जाने लगा था. हालांकि, साथ छूटा और नीतीश कुमार ने उन दिनों पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. तब से लेकर अब तक उन्होंने 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है.

नीतीश कुमार बिहार के एक ऐसे नेता हैं जिनकी सरकार पर भले तमाम नेता घेरे में लेते रहे हों लेकिन कभी नीतीश कुमार निजी हमले के शिकार नहीं हुए. यही कारण है कि उनका लालू यादव से मोह भंग हो गया था. आइये इतिहास के पन्ने पलटकर देखते हैं पहली हार से लेकर 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ तक नीतीश कुमार कैसे पहुंचे?

कॉलेज से शुरू हुई ‘मुन्ना’ की राजनीति

बिहार के बख्तियारपुर में मार्च 1951 को जन्मे नीतीश कुमार का बचपन साधारण था, जहां उन्हें घर में ‘मुन्ना’ कहकर पुकारा जाता था. उनके पिता रामलखन सिंह एक आयुर्वेदिक डॉक्टर होने के साथ-साथ कांग्रेस के एक बड़े नेता थे, जबकि मां परमेश्वरी देवी घर और खेती संभालती थीं. दसवीं में अच्छे अंक लाने के बाद, नीतीश को उनके परिवार ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पटना भेज दिया, लेकिन यह सफर सिर्फ़ इंजीनियरिंग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यहीं से उनके राजनीतिक भविष्य की नींव पड़ी.

इंजीनियरिंग कॉलेज से आंदोलन तक नीतीश कुमार

कॉलेज के दिनों में ही नीतीश यूनाइटेड स्टूडेंट्स फ्रंट से जुड़ गए, जो उस समय कांग्रेस के खिलाफ विभिन्न छात्र आंदोलन चला रहा था। कभी कॉलेज तक बस चलाने के लिए, तो कभी छात्रों की समस्याओं पर नीतीश ने जल्दी ही छात्रों के बीच अपनी पहचान एक नेता के रूप में बना ली. 1972 में उन्होंने बिहार अभियंत्रण महाविद्यालय स्टूडेंट्स यूनियन बनाई और उसके अध्यक्ष चुने गए.

कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के करीब ही 22 फरवरी 1973 को उनकी शादी नालंदा की मंजू कुमारी सिन्हा से हुई. पढ़ाई के बाद उन्हें बिजली विभाग में ट्रेनी इंजीनियर की नौकरी मिली, लेकिन उन्होंने जल्द ही वह नौकरी छोड़कर पटना लौटकर जेपी आंदोलन से जुड़ने का फैसला किया.

लगातार हार के बाद पहली जीत (Nitish Kumar First Election)

जेपी आंदोलन के दौरान जेल से बाहर निकलने के बाद, नीतीश कुमार ने अपनी चुनावी पारी की शुरुआत की. 1977 में मात्र 26 साल की उम्र में उन्हें जनता पार्टी ने नालंदा की हरनौत सीट से टिकट दिया, लेकिन उन्हें हार (Nitish Kumar First Defeats) का सामना करना पड़ा. 1980 में भी उन्होंने इसी सीट से चुनाव लड़ा और दोबारा असफल रहे.

दो हार के बाद 1985 में नीतीश कुमार ने कसम खाई कि अगर इस बार भी हार गए तो चुनाव नहीं लड़ेंगे. पत्नी द्वारा दिए गए 20,000 की मदद से, उन्होंने तीसरा चुनाव लड़ा और इस बार वह 22,000 वोटों के बड़े अंतर से जीत गए. 1989 में लोकसभा चुनाव जीतकर वह दिल्ली चले गए, जहां उन्होंने केंद्र की राजनीति में कदम रखा.

लालू से मोहभंग और पहली बार मुख्यमंत्री

1989 में लालू यादव जब बिहार में विपक्ष के नेता बने तो नीतीश कुमार बिना शर्त उनके साथ खड़े थे. 1990 में जब जनता दल ने जीत हासिल की और लालू प्रसाद यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने तो नीतीश उनके सबसे भरोसेमंद सहयोगी गिने जाते थे. हालांकि, लालू की लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही उनके शासन पर भ्रष्टाचार और दबंगई के आरोप लगने लगे, जिससे नीतीश का मोह भंग हो गया.

1995 का विधानसभा चुनाव आते-आते, नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी बनाकर लालू के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. हालांकि, उस चुनाव में लालू का जादू बरकरार रहा और वह पूर्ण बहुमत से लौटे, जबकि नीतीश सात सीटों पर सिमट गए.

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बराबरी के बने लालू के हनुमान नीतीश कुमार

साल 2000 के बिहार चुनाव में नीतीश कुमार ने अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे दिग्गजों के साथ गठबंधन कर लालू यादव को कड़ी चुनौती दी. NDA को 122 सीटें मिलीं और नीतीश कुमार सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री (Nitish Kumar first term as CM) बने. उन्होंने राज्यपाल को 146 विधायकों की सूची सौंपी और शपथ ले ली लेकिन यह शासन केवल सात दिन ही चल सका. बहुमत साबित न कर पाने के कारण नीतीश कुमार को इस्तीफा देना पड़ा और लालू यादव ने कांग्रेस का बाहरी समर्थन हासिल कर राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनवा दिया. इसी समय से नीतीश कुमार को बिहार की सियासत में लालू यादव के बराबर खड़े हो गए.

Shyamdatt Chaturvedi

श्यामदत्त चतुर्वेदी एक अनुभवी मीडिया पेशेवर हैं. वर्तमान में नोएडा 'भारत एक्सप्रेस' में पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में सात वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले श्यामदत्त ने हिंदी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए कंटेंट राइटिंग, रिपोर्टिंग, एडिटिंग और डेटा एनालिसिस में गहरी विशेषज्ञता हासिल की है. इससे पहले उन्होंने जी न्यूज, ईटीवी भारत, टीएफआई मीडिया, वे2न्यूज और सैफायर मीडिया लिमिटेड (इंडिया डेली लाइव) जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं. उन्होंने स्थानीय पंचायत से लेकर विधानसभा, लोकसभा तक की व्यापक कवरेज की. उन्होंने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (IGNTU), अमरकंटक से पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातक (BJMC) करने के बाद, प्रतिष्ठित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर डिग्री (M.A.) हासिल की है.

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