Parliament Monsoon Session 2026: दिल्ली/कोमल शर्मा: ‘हंगामा, नारेबाजी और गतिरोध’..संसद का मानसून सत्र आखिरकार उसी तर्ज पर खत्म हुआ, जैसी इसकी शुरुआत हुई थी. सत्र के आखिरी दिन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की मौजूदगी में सदन ‘वंदे मातरम’ से गूंजा जरूर, लेकिन कुछ ही देर में विपक्ष के शोर-शराबे के चलते लोकसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करना पड़ा. राम मंदिर के चढ़ावे से लेकर NEET पेपर लीक जैसे मुद्दों पर सरकार बनाम विपक्ष की यह तनातनी पूरे सत्र भर जारी रही. लेकिन इस सियासी ड्रामे में सबसे बड़ा नुकसान किसका हुआ? जवाब है देश की जनता और लोकतंत्र का.
आंकड़े इस मानसून सत्र की नाकामी की गवाही चीख-चीख कर दे रहे हैं. पूरे सत्र में कुल 12 अहम विधेयक पारित हुए, लेकिन क्या आप जानते हैं कि सिर्फ एक बिल (‘लोक परीक्षा रोकथाम अधिनियम’) को छोड़कर किसी भी बिल पर लोकसभा या राज्यसभा में विस्तृत चर्चा नहीं हुई! समय के लिहाज से लोकसभा की उत्पादकता मात्र 19% और राज्यसभा की 39% रही. जब हंगामे से समय ही नहीं बचता, तो बिल बिना गहन चर्चा के जल्दबाज़ी में पास कर दिए जाते हैं, और इस बार भी ठीक ऐसा ही हुआ.
बार-बार के गतिरोध का सबसे बड़ा खमियाजा जनता के पैसों को भुगतना पड़ा है. साल 2012 के एक आंकड़े के मुताबिक, संसद चलाने में हर मिनट करीब 2.5 लाख रुपये खर्च होते हैं. अगर आज की महंगाई जोड़ दें तो यह आंकड़ा कहीं ज्यादा होगा. PRS की रिपोर्ट के मुताबिक, सत्र के पहले 3 दिन में ही लोकसभा और राज्यसभा के लगभग 1842 मिनट बर्बाद हुए, जिसका सीधा मतलब है कि शुरुआती तीन दिनों में ही देश के करीब 23 करोड़ रुपये स्वाहा हो गए.
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने गतिरोध तोड़ने की बार-बार पहल की, लेकिन विपक्ष अपनी शर्तों पर अड़ा रहा. बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद ने इसे ‘राजनीति का रंगमंच’ तक करार दिया. इस पूरे ड्रामे का सबसे बुरा असर ‘प्रश्नकाल’ पर पड़ा, जो पूरी तरह ठप रहा.
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यह वह समय होता है जब सांसद जनता के मुद्दे (बेरोजगारी, स्वास्थ्य, महंगाई) सीधे सरकार से पूछते हैं, लेकिन इस बार सांसदों को यह मौका ही नहीं मिला. ऐसे में यह बड़ा सवाल उठता है कि क्या विपक्ष ने अपनी रचनात्मक भूमिका निभाने के बजाय सिर्फ सदन को ठप करने का ही एजेंडा सेट कर रखा था?
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