Premanand Maharaj News: वृंदावन के विख्यात संत प्रेमानंद महाराज के आश्रम में एक नौजवान साधक रसिक दुलारी शरण की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु ने समाज और पुलिस प्रशासन के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है. इस घटना की जांच जारी है, लेकिन इसी बीच कुछ असामाजिक और विरोधी तत्व संत प्रेमानंद महाराज पर कीचड़ उछालने का प्रयास कर रहे हैं. हालांकि, इस घटना ने केवल विरोधियों को ही नहीं, बल्कि महाराज के निष्ठावान भक्तों को भी उन व्यावहारिक बदलावों पर मंथन करने के लिए मजबूर किया है जो पिछले कुछ वर्षों में आश्रम के इर्द-गिर्द देखने को मिले हैं.
वृंदावन आश्रम में हुई साधक की मृत्यु की जांच जारी है, परंतु इस दुर्घटना की आड़ में प्रेमानंद महाराज की तपस्या पर सवाल उठाना अनुचित है. मुख्य समस्या महाराज की साधना नहीं, बल्कि उनके शिष्यों द्वारा खड़ा किया गया सोशल मीडिया ग्लैमर, संपत्ति का विस्तार और आडंबर है. ब्रज की भक्ति परंपरा को बनाए रखने के लिए शिष्यों को आत्मअवलोकन करने और भौतिकता के इस खेल से दूर रहने की तत्काल आवश्यकता है.
प्रेमानंद महाराज एक लंबे अरसे से वृंदावन में अत्यंत साधारण और तपस्वी जीवन व्यतीत करते रहे हैं. भीषण गर्मी में यमुना जी की तपती रेत में भजन करना हो या कंटीली झाड़ियों के बीच साधना, उनकी निष्ठा पर कभी कोई सवाल नहीं उठा. सालों तक वृंदावन की गलियों में भिक्षा (माधुकरी) मांगकर भोजन करने वाले इस संत की तपस्या और दैन्य भाव की प्रशंसा हर ब्रजवासी करता आया है. कुछ वर्ष पहले तक वे चंद शिष्यों के बीच यमुना किनारे बगीची में साधारण रूप से प्रवचन दिया करते थे.
धीरे-धीरे उनकी आध्यात्मिक धारा से प्रभावित होकर आईआईटी और आईआईएम जैसे शीर्ष संस्थानों से शिक्षित युवा अपनी लाखों की नौकरियां छोड़कर उनके शिष्य बनने लगे. इन्हीं में से कुछ शिष्यों ने महाराज के प्रति अपने अनुराग को सोशल मीडिया पर पूरी ताकत से प्रचारित करना शुरू कर दिया. देखते ही देखते विराट कोहली जैसी अंतरराष्ट्रीय हस्तियों से लेकर आम जनता तक आधी रात से ही उनके दर्शन के लिए एकत्र होने लगी. देखते ही देखते वृंदावन की शांत गलियां भारी भीड़ और यातायात जाम का केंद्र बन गईं.
अत्यधिक लोकप्रियता के साथ ही आश्रम और उसके तंत्र में बड़ा बदलाव आया. संपत्तियां खरीदने, भव्य आश्रम बनाने और यमुना के खादर क्षेत्र में अवैध कॉलोनियां काटने तक के आरोप शिष्यों पर लगे. दर्शन के लिए एडवांस टोकन और सुनियोजित प्रबंधों का आडंबर रचा जाने लगा. ब्रज की जिस प्राचीन ‘माधुकरी’ (मांगकर खाना) परंपरा को संत कभी गुप्त रखते थे, उसे भी सोशल मीडिया का कंटेंट बनाकर ग्लैमरस प्रस्तुत किया जाने लगा. इसके परिणामस्वरूप, केलि कुंज के आंतरिक वृत्त में सत्ता और संपत्ति को लेकर गुटबाजी भी शुरू हो गई.
शिष्यों के इस चकाचौंध भरे व्यवहार और संपत्ति के खेल से विचलित होकर प्रेमानंद महाराज वृंदावन के नए भव्य आश्रमों को छोड़कर यमुना पार बेल वन चले गए. हालांकि, वहां भी भक्तों की लगातार भीड़ और कॉलोनियां बनाने के प्रयास जारी रहे, जिससे स्थानीय ग्रामीण और ब्रजवासी बच्चे प्रभावित होने लगे. भक्तों का मानना है कि महाराज के वास्तविक आभामंडल को बनाए रखने के लिए अब समय आ गया है कि वे शिष्यों द्वारा बुने गए इस आडंबरपूर्ण जाल से बाहर निकलकर अपने मूल सहज रूप में लौटें.
जहां तक साधक रसिक दुलारी शरण की मृत्यु का सवाल है, उसकी असली वजह पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट होगी. साधना की शुरुआती अवस्था में मन पर नियंत्रण न होने पर उत्साह के अतिरेक या नासमझी में शारीरिक नुकसान पहुंचाने के उदाहरण नए नहीं हैं. वास्तव में, भगवद्-भक्ति में मन रमने से ही इंद्रियां शांत होती हैं, जबरन किए गए प्रयासों से नहीं. इस दुखद घटना से प्रेमानंद महाराज की व्यक्तिगत निष्ठा और प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आती, लेकिन उनके इर्द-गिर्द मौजूद शिष्यों को इस त्रासदी से सबक लेते हुए गंभीर आत्मअवलोकन करने की आवश्यकता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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