दिल्ली की शान लाल किला को 1639 में शाहजहां ने बनवाना शुरू किया था, जो 1648 में पूरा हुआ. लेकिन अब दिल्ली के लाल किला की दीवारें जहरीली हवा के कारण काली हो रही हैं. स्टडी के मुताबिक बढ़ते प्रदूषण की वजह से विश्व की इस धरोहर को काफी नुकसान पहुंच रहा है.
दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर बढ़ते वायु प्रदूषण का कहर जारी है. 15 सितंबर 2025 को जारी एक वैज्ञानिक अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि शहर की जहरीली हवा के कारण लाल किले की दीवारें काली पड़ रही हैं. इस शोध में पाया गया कि गाड़ियों के धुएं, निर्माण कार्य की धूल और अन्य प्रदूषक कण लाल बलुआ पत्थर की सतह पर जमा हो रहे हैं, जिससे न केवल किले का रंग फीका पड़ रहा है. बल्कि उसकी संरचना को भी नुकसान पहुंच रहा है.
भारतीय वैज्ञानिकों और इटली के विदेश मंत्रालय के सहयोग से की गई स्टडी में यह खुलासा हुआ है कि PM2.5, PM10 और NO2 का स्तर राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक (National Ambient Air Quality Standards – NAAQS) से 2.5 गुणा ज्यादा है, जिससे किले की दीवारों पर काली क्रस्ट बन रही है और दीवार काली पड़ रही है. इस स्टडी में आईआईटी रुड़की, आईआईटी कानपुर, फोस्कारी यूनिवर्सिटी (वेनिस) और ASI के वैज्ञानिक भी शामिल थे.
रेड सैंडस्टोन जो की सिलिका और आयरन ऑक्साइड से बनी होती हैं और इसका लाल रंग आयरन ऑक्साइड से आता है, लेकिन दिल्ली की हवा में मौजूद पार्टिकल PM2.5 और PM10, NO2 और SO2 जैसे हानिकारक गैस दीवारों पर जम जाती हैं. ये हानिकारक पदार्थ वाहनों से निकलने वाला धुएं, धूल के कण, सीमेंट फैक्ट्रियों और औद्योगिक प्रदूषण से आता है.
हवा में प्रदूषण सल्फर डाइऑकिसाइड (SO2 ), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx ) सल्फ्यूरिक एसिड (H2SO4) और नाइट्रिक एसिड (HNO3) से बनाता है, जो कि एसिड रेन या सूखे पार्टिकल के साथ पत्थर पर गिरते हैं और सैंडस्टोन में कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO3) होता है जो आपस में रिएक्ट करके कैल्शियम सल्फेट (gypsum या CaSO4) बनाते हैं. जिप्सम सफेद होता है लेकिन प्रदूषण कणों से मिलकर यह काली क्रस्ट बन जाता है.
नए शोध में सामने आया है कि टाइटेनियम, निकल, कॉपर, जिंक, बेरियम और लेड जैसी भारी धातुएँ ब्लैक क्रस्ट में बड़ी मात्रा में पाई जाती हैं. ये धातुएं निर्माण कार्य, सड़क की धूल और फैक्ट्री के धुएं से आती हैं और पत्थरों की सतह पर जमकर काली परत बना देती हैं. नतीजा यह होता है की दीवारें धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं. खासकर लेड और कॉपर का ऑक्सीडेशन काली चमक पैदा करता है.
दिल्ली की जहरीली हवा ऐतिहासिक धरोहरों के लिए भी खतरा बन गई है. स्टडी में सामने आया है कि प्रदूषण की वजह से लाल किले की दीवारें काली पड़ रही हैं और उस पर बनी नक्काशी मिट रही है. लगातार प्रदूषण के चलते इसकी संरचना कमजोर हो रही है, जिससे गिरने का खतरा बढ़ सकता है और ASI को बार-बार सफाई करनी पड़ रही है. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह समस्या सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं बल्कि इतिहास को भी प्रभावित कर रही है.
रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में दिल्ली का औसत AQI 300 से ऊपर रहा. इसका असर पर्यटन पर भी पड़ रहा है क्योंकि लाखों पर्यटक यहां आते हैं, लेकिन प्रदूषण से स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहा है.
स्टडी के मुताबिक, शुरुआती परतें आसानी से हटाई जा सकती हैं और प्रदूषण पर काबू पाकर क्रस्ट को रोका जा सकता है. इसके लिए वाहनों पर सख्त नियम, निर्माण धूल पर रोक, फैक्ट्रियों पर फिल्टर, ASI द्वारा नियमित सफाई और कोटिंग, साथ ही ग्रीन बेल्ट और मॉनिटरिंग बढ़ाने जैसे कदम उठाने की जरूरत है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार, वैज्ञानिक और नागरिक मिलकर प्रयास नहीं करेंगे तो हमारी धरोहरें हमेशा के लिए खो सकती हैं.
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– भारत एक्सप्रेस
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