Sathya Sai Baba centenary: एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने आध्यात्मिकता को मानव-सेवा का पर्याय बना दिया. 23 नवंबर 1926 को आंध्र प्रदेश के पुट्टपर्थी गांव में एक साधारण रत्नाकर घर में जो बालक जन्मा, उसका नाम रखा गया सत्यनारायण राजू. मात्र 14 वर्ष की आयु में उस बालक ने घोषणा की, “मैं साईं बाबा हूं. मैंने शिरडी के साईं बाबा के रूप में अवतार लिया था, अब सत्य साईं के रूप में आया हूं और आगे शिरडी और सत्य के संयोजन से प्रेम साईं के रूप में भी आऊंगा.” आज जब हम उनकी जन्म शताब्दी मना रहे हैं, दुनिया ने एक ऐसे व्यक्तित्व को देखा जिसने आध्यात्मिकता को मानव-सेवा का पर्याय बना दिया.
सत्य साईं बाबा का मूल मंत्र था – “Love All, Serve All; Help Ever, Hurt Never”. उन्होंने कभी किसी धर्म को अपना नहीं कहा; हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध सबके लिए वे “सबका मालिक एक” के जीवंत प्रमाण थे. उनके दर्शन में ईश्वर एक है, केवल नाम और रूप अलग-अलग हैं. “मैं तुम्हारे अंदर हूं, तुम मेरे अंदर हो” यह उनका बार-बार दिया गया संदेश आज भी लाखों भक्तों के हृदय में गूंजता है.
शायद ही दुनिया में कोई दूसरा आध्यात्मिक गुरु हो जिसने अपनी शिक्षाओं को इतने विशाल स्तर पर मूर्त रूप दिया हो.
श्री सत्य साईं जल योजना : आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और चेन्नई तक को पीने का पानी पहुंचाया, जिससे सूखाग्रस्त इलाकों में जीवन संभव हुआ.
सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल : पुट्टपर्थी और बेंगलुरु (व्हाइटफील्ड) में विश्व-स्तरीय हृदय, किडनी, नेत्र चिकित्सा पूरी तरह निःशुल्क. ये अस्पताल मुख्यधारा की चिकित्सा से आगे की सुविधाएं प्रदान करते हैं.
शिक्षा : “शिक्षा निःशुल्क होनी चाहिए” इस सिद्धांत पर श्री सत्य साईं विश्वविद्यालय (प्रशांति निलयम), अनंतपुर महिला कैंपस, मुद्डेनहल्ली कैंपस और सैकड़ों सत्य साईं स्कूल आज भी लाखों बच्चों को मूल्य-आधारित शिक्षा दे रहे हैं.
ये प्रयास इतने प्रभावी रहे कि उनकी एसोसिएशन ने 126 देशों में 1,200 से अधिक केंद्र स्थापित किए, और आपदा राहत से लेकर विकास कार्यों तक में योगदान दिया.
विभूति उत्पन्न करना, आकाश से मेडल-रिंग निकालना, दूर बैठे भक्तों की बीमारी ठीक करना, उनके चमत्कारों की कहानियां अनगिनत हैं. लेकिन स्वयं बाबा कहते थे, “ये चमत्कार मेरी विजिटिंग कार्ड है, असली चमत्कार है मनुष्य का मनुष्य में परिवर्तन.” उनका जोर हमेशा आंतरिक परिवर्तन पर रहा जैसे अहंकार छोड़ना, प्रेम बढ़ाना, सेवा करना.
11 अप्रैल 2011 को जब उन्होंने शरीर त्याग किया, तब भी उन्होंने वचन दिया था – “मैं कभी अपने भक्तों को नहीं छोड़ता.” सत्य साईं ट्रस्ट, सैकड़ों सेवा संगठन, युवा विंग, बाल विकास – सब आज भी उसी गति से चल रहे हैं.
सत्य साईं बाबा की दिव्य छवि के साथ-साथ उनके जीवनकाल और उसके बाद कई विवाद जुड़े रहे, जो आज भी बहस का विषय बने हुए हैं. ये विवाद न केवल उनकी व्यक्तिगत छवि पर सवाल उठाते हैं, बल्कि आध्यात्मिक गुरुओं की भूमिका, राजनीतिक संरक्षण और संस्थागत पारदर्शिता पर भी.
बाबा के ‘मटेरियलाइजेशन’ (हवा से वस्तुएँ उत्पन्न करना) जैसे विभूति, घड़ियाँ, सोने की चेन आदि को तर्कवादी संगठनों ने जादू के टोटके बताया. मशहूर जादूगर पी.सी. सरकार ने 1970 के दशक में आश्रम जाकर बाबा को चुनौती दी और रसगुल्ला को संदेश में बदलकर विवाद पैदा किया, जिसके बाद उन्हें आश्रम से निकाल दिया गया. आलोचक कहते हैं कि ये ‘स्लीव ट्रिक्स’ (लंबी आस्तीनों से वस्तुएं छिपाना) थे. बाबा के समर्थक इन्हें दिव्य लीला मानते हैं.
सबसे विवादास्पद मुद्दा युवा पुरुष भक्तों (विशेषकर विदेशी) पर यौन शोषण के आरोप थे. 2001 में स्वीडिश थेरेपिस्ट और 2004 में अमेरिकी मार्क रोश ने निजी साक्षात्कारों में अनुचित स्पर्श का दावा किया. अन्य पूर्व भक्तों ने भी इसी तरह की शिकायतें कीं, जिससे ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप में विरोध प्रदर्शन हुए. बाबा ने इन्हें ‘प्रचार’ कहा, लेकिन कोई कानूनी जांच पूरी नहीं हुई. ये आरोप उनकी छवि पर स्थायी दाग छोड़ गए, और कुछ ने उन्हें ‘फेक गुरु’ या ‘राम रहीम जैसा’ कहा.
बाबा ने दावा किया था कि वे 96 वर्ष जीवित रहेंगे, लेकिन 2011 में 84-85 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई. कुछ भक्तों ने इसे ‘पूर्वनिर्धारित लीला’ कहा, जबकि आलोचकों ने इसे झूठा दावा माना.
कुछ ने बाबा को ‘सेल्फ-प्रोक्लेम्ड गॉड-मैन’ कहा, जो सेलिब्रिटी समर्थन से फैले.
श्री सत्य साईं सेंट्रल ट्रस्ट की संपत्ति (लगभग 5 बिलियन पाउंड) पर सवाल उठे. मृत्यु के बाद टैक्स, पारदर्शिता और उत्तराधिकार के मुद्दे पर बहस हुई.
ये विवाद बाबा की विरासत को जटिल बनाते हैं, लेकिन उनके समर्थक इन्हें ‘ईर्ष्या का परिणाम’ मानते हैं. तर्कवादी संगठन और पूर्व भक्तों के अनुसार, ये सच्चाई की खोज हैं.
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जब दुनिया उपभोक्तावाद, तनाव और अलगाव से जूझ रही है, सत्य साईं बाबा का सौ साल पुराना जन्म हमें याद दिलाता है कि समाधान बाहर नहीं, भीतर है. विवाद चाहे जितने हों, उनकी विरासत सेवा में है, जो करोड़ों को प्रेरित करती है. लेकिन सच्चाई यही है कि कोई भी महान व्यक्तित्व विवादों से अछूता नहीं रहता; महत्वपूर्ण है कि हम तथ्यों से सीखें.
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-भारत एक्सप्रेस
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