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टाइम बम पर बैठा है उत्तराखंड! तेजी से पिघल रहे हैं ग्लेशियर, 34 साल में गायब हुई 25 KM बर्फ

Uttarakhand Glacier Melting: उत्तराखंड से ऐसी खबर सामने आई है जो पूरे उत्तर भारत में भयंकर सूखा और अकाल का कारण बन सकती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय में मौजूद ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं. हालत ये है कि आने वाले कुछ ही सालों में कई ग्लेशियर खत्म हो सकते हैं. अगर ये होता है तो हिमालय से निकलने वाली नदियां सूख जाएंगी. जिसकी वजह से पूरा उत्तर भारत भयंकर अकाल से जूझने लगेगा.

हिमालयी ग्लेशियरों को लेकर वैज्ञानिकों ने रिसर्च किया है. जिसके मुताबिक भारतीय मध्य हिमालय के 23 प्रमुख ग्लेशियर पिछले तीन दशक में तेजी से सिकुड़े हैं. वर्ष 1990 से 2024 के बीच इन ग्लेशियरों ने कुल मिलाकर 25.6 किलोमीटर से अधिक बर्फ खो दी है.

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी और यूपीईएस (UPES) के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार यह समीक्षा 15 सितंबर 2026 को वैज्ञानिक जर्नल Discover Geoscience में प्रकाशित हुई है. शोध में पिछले कई दशकों के फील्ड सर्वे, सैटेलाइट तस्वीरों, डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) और विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों का विश्लेषण किया गया.

खत्म हो जाएगा टिहरी गढ़वाल का खातलिंग ग्लेशियर

अध्ययन में सामने आया है कि हिमालय के कई प्रमुख ग्लेशियर लगातार पीछे खिसक रहे हैं. इनमें टिहरी गढ़वाल का खातलिंग ग्लेशियर सबसे ज्यादा चिंता का विषय बनकर उभरा है. वर्ष 1965 से 2014 के बीच यह ग्लेशियर औसतन 88 मीटर प्रति वर्ष की दर से पीछे हटा और करीब 4.34 किलोमीटर तक सिमट गया. वैज्ञानिकों के अनुसार इसके कई हिस्से टूटकर अलग भी हो चुके हैं.

पिंडारी ग्लेशियर की हालत गंभीर

इसमें सबसे ज्यादा खराब हालत पिंडारी ग्लेशियर का है. पिंडारी ग्लेशियर 2000 से 2018 के बीच 45.8 मीटर प्रति वर्ष की दर से सिकुड़ा. इसके अलावा मिलम ग्लेशियर में 37.8 मीटर प्रति वर्ष और गंगोत्री ग्लेशियर में करीब 22 मीटर प्रति वर्ष की दर से पीछे हटने का रिकॉर्ड दर्ज किया गया है. वहीं चोराबाड़ी और भागीरथी ग्लेशियरों में भी लगातार सिकुड़न देखी गई है.

रिपोर्ट के अनुसार ग्लेशियरों के पिघलने की वजह केवल बढ़ता तापमान नहीं है. उनकी ऊंचाई, ढलान, दिशा और सतह पर जमा मलबा भी इस प्रक्रिया को प्रभावित करता है. दक्षिण दिशा की ओर स्थित ग्लेशियरों में लगभग 18 प्रतिशत तक अधिक सिकुड़न दर्ज की गई है.

तेजी से बन रही हैं ग्लेशियल झीलें

शोध में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है. मिलम ग्लेशियर के सामने 47 नई हिमनदीय झीलों (Glacial Lakes) के बनने की जानकारी मिली है. वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसी झीलों की संख्या बढ़ना भविष्य में बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को बढ़ा सकता है.

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वाडिया इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता के अनुसार, उत्तराखंड के अपर अलकनंदा बेसिन में 1994 से 2020 के बीच ग्लेशियर क्षेत्रफल में 4.2 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है. इसके साथ ही बर्फ की सीमा (Snowline) भी करीब 100 मीटर ऊपर खिसक गई है. शोधकर्ताओं का कहना है कि वर्ष 2000 के बाद ग्लेशियरों के सिकुड़ने की रफ्तार और तेज हुई है, जो हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर चेतावनी मानी जा रही है.

-भारत एक्सप्रेस

Govind Kumar Singh

मैं गोविंद सिंह हूं और मूल रूप से बिहार के कैमूर की पहाड़ियों वाले इलाके से आता हूं। मेरी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज से हुई। इसके बाद मैंने पटना कॉलेज, पटना से मास कम्यूनिकेशन में ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की और अलग-अलग संस्थानों में काम करते हुए खबरों की दुनिया को करीब से समझा। अपने पेशेवर सफर में मुझे ईटीवी भारत, इनशॉर्ट्स और श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन जैसे संस्थानों के साथ काम करने का अवसर मिला। इन जगहों पर काम करते हुए मैंने रिपोर्टिंग, कंटेंट लेखन, रिसर्च और समाचारों की प्रस्तुति से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें सीखीं। फिलहाल मैं भारत एक्सप्रेस में सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हूं। यहां मेरी मुख्य रुचि विदेश, राजनीति और बिहार से जुड़ी खबरों को कवर करने में है।

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