Great Nicobar Project: हिंद महासागर की लहरों के बीच बसे ‘ग्रेट निकोबार’ द्वीप को लेकर आजकल दिल्ली के सियासी गलियारों से लेकर सोशल मीडिया के टाइमलाइन तक पर जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है. केंद्र सरकार का दावा है कि करीब 72,000 से 92,000 करोड़ रुपये का यह प्रोजेक्ट भारत की तकदीर और तस्वीर बदल देगा, वहीं विपक्ष और पर्यावरण प्रेमी इसे एक ‘विनाशकारी कदम’ बता रहे हैं. आइए समझते हैं कि आखिर इस पूरे विवाद की जड़ क्या है और क्यों यह प्रोजेक्ट भारत के लिए इतना खास है.
नीति आयोग की देखरेख में शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट असल में एक बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर हब है. इसके तहत ग्रेट निकोबार के गलाथिया बे में एक विशाल अंतरराष्ट्रीय कंटेनर पोर्ट, एक आधुनिक इंटरनेशनल एयरपोर्ट, एक नया शहर और एक बड़ा पावर प्लांट बनाया जाना है.
सरकार इसे ‘सागरमाला कार्यक्रम’ का सबसे अहम हिस्सा मानती है. यह इलाका मलक्का स्ट्रेट के बेहद करीब है, जहां से दुनिया का लगभग 30% व्यापार गुजरता है. अगर यहां पोर्ट बनता है, तो भारत को कोलंबो या सिंगापुर जैसे विदेशी पोर्ट्स पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. 2040 तक इससे सालाना 30,000 करोड़ रुपये की कमाई और हज़ारों नौकरियों की उम्मीद है.
विपक्ष, खासकर राहुल गांधी और कई पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इस प्रोजेक्ट की कीमत प्रकृति को चुकानी पड़ेगी. दावा है कि इससे करीब 160 वर्ग किलोमीटर का घना जंगल खत्म हो जाएगा और लाखों पेड़ काट दिए जाएंगे. इसके अलावा, समुद्री जीवों और वहां रहने वाली शोम्पेन व निकोबरी जैसी प्राचीन जनजातियों के अस्तित्व पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं.
हालांकि, सरकार इन दलीलों को सिरे से खारिज करती है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कुल जंगल का सिर्फ 1.82% हिस्सा ही प्रभावित होगा और पेड़ों की कटाई भी चरणों में की जाएगी. पेड़ों के नुकसान की भरपाई के लिए हरियाणा और मध्य प्रदेश में हज़ारों हेक्टेयर पर जंगल लगाए जाने की योजना है. सरकार का साफ़ कहना है कि किसी भी आदिवासी को उनके घर से विस्थापित नहीं किया जाएगा.
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सिर्फ व्यापार ही नहीं, यह प्रोजेक्ट देश की सुरक्षा के लिए भी मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है. चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति (भारत को समुद्र में घेरने की कोशिश) को मात देने के लिए अंडमान सागर में भारत की पकड़ मजबूत होना जरूरी है. यहां एयरपोर्ट और पोर्ट बनने से भारतीय नौसेना और वायुसेना की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी.
रोचक बात यह है कि आज जब विपक्ष इसका विरोध कर रहा है, तब सरकार के समर्थक याद दिलाते हैं कि 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने खुद अंडमान-निकोबार को ‘हांगकांग या सिंगापुर’ जैसा बनाने का सपना देखा था.
आपको बताते चलें कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट विकास की भूख और पर्यावरण की सुरक्षा के बीच एक महीन संतुलन की परीक्षा है. जहां एक तरफ देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था का सवाल है, वहीं दूसरी तरफ हमारी प्राकृतिक विरासत.
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-भारत एक्सप्रेस
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