Datia-Bankipur Bypoll Analysis: मध्य प्रदेश की दतिया और बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में बीजेपी की हार ने पार्टी की चुनावी रणनीति, उम्मीदवार चयन और संगठनात्मक मजबूती पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं. दोनों राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन हार के पीछे कुछ समान कारण साफ नजर आए. कहीं टिकट बदलने का फैसला भारी पड़ा तो कहीं स्थानीय मुद्दों और संगठन के भीतर असंतोष ने चुनावी समीकरण बदल दिए.
दतिया में कांग्रेस उम्मीदवार कुंवर घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हराया. इस सीट पर सबसे बड़ी चर्चा पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने की रही. लंबे समय तक दतिया की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे नरोत्तम मिश्रा की जगह नए उम्मीदवार को उतारने के बाद स्थानीय स्तर पर नाराजगी सामने आई. कई कार्यकर्ताओं ने विरोध किया और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी पूरी तरह एकजुट नहीं दिखी. हालांकि नरोत्तम मिश्रा ने प्रचार किया, लेकिन उनके समर्थकों का उत्साह पहले जैसा नहीं माना गया.
इसके अलावा किसानों की समस्याएं, खाद-बीज की उपलब्धता, डीजल की बढ़ती कीमतें, छात्रों के विरोध प्रदर्शन और सरकार से जुड़े कुछ स्थानीय मुद्दे भी चुनाव में असर डालते दिखे. दूसरी ओर, कांग्रेस अंदरूनी विवाद और पूर्व विधायक राजेंद्र भारती के निलंबन के बावजूद अपना पारंपरिक वोट बैंक संभालने में सफल रही.
वहीं, पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर सीट पर जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को 19,324 वोटों से हराकर बड़ा उलटफेर कर दिया. यहां बीजेपी की शुरुआत से ही उम्मीदवार चयन को लेकर असमंजस दिखाई दिया. पहले घोषित प्रत्याशी का टिकट वापस लेकर नया चेहरा उतारने से कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच भ्रम की स्थिति बनी. इसके साथ ही संगठन के भीतर असंतोष की चर्चाएं भी रहीं.
प्रशांत किशोर ने बड़ी रैलियों के बजाय डोर-टू-डोर अभियान, नुक्कड़ सभाओं और छोटे संवाद कार्यक्रमों के जरिए ‘हाइपर-लोकल’ प्रचार मॉडल अपनाया. उन्होंने बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था, छात्रों के आंदोलन और स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाया. कम मतदान प्रतिशत और राजद के कमजोर प्रदर्शन का फायदा भी जन सुराज को मिला, जिससे बीजेपी विरोधी वोट काफी हद तक एकजुट हो गए.
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दोनों उपचुनावों से एक समान संदेश निकलकर सामने आया कि सिर्फ चुनावी प्रबंधन या बड़े नेताओं का प्रचार जीत की गारंटी नहीं है. उम्मीदवार चयन, संगठन की एकजुटता, स्थानीय मुद्दों की समझ और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता आज भी चुनावी जीत के सबसे अहम आधार हैं. हालांकि ये दोनों उपचुनाव हैं और इनके आधार पर बड़े राजनीतिक निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना जरूर है कि इन नतीजों ने बीजेपी के लिए आत्ममंथन और विपक्ष के लिए नए राजनीतिक अवसरों की चर्चा तेज कर दी है.
-भारत एक्सप्रेस
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