Year Ender 2025: साल 2025 अब खत्म होने को है. कैलेंडर के पन्ने पलटने में बस कुछ ही दिन बचे हैं, लेकिन जाते-जाते इस साल ने अपराध और रिश्तों की जो तस्वीर पेश की है, उसने रूह कंपा दी है. अभी कुछ ही दिन पहले यूपी के संभल से एक खबर आई ‘मुस्कान कांड’. एक पत्नी ने ना सिर्फ अपने पति की बेरहमी से हत्या की, बल्कि सबूत मिटाने के लिए उसके टुकड़े किए और उन्हें मिक्सर में पीस डाला. यह खबर पढ़कर ऐसा लगा जैसे 2025 ने अपना पूरा रिपोर्ट कार्ड एक ही झटके में सामने रख दिया हो.
कहानी की शुरुआत असल में पिछले साल के आखिर में हुई थी, जब आईटी इंजीनियर अतुल सुभाष ने 24 पन्नों का सुसाइड नोट और एक लंबा वीडियो छोड़कर जान दे दी थी. उनका वह वाक्य “This ATM has been closed permanently” आज भी सोशल मीडिया पर गूँजता है. अतुल ने ससुराल वालों के दबाव और झूठे मुकदमों की जो दास्तां सुनाई, उसने पुरुषों के भीतर दबे उस गुबार को बाहर निकाल दिया जिसे समाज अक्सर ‘मर्दानगी’ के नाम पर दबा देता था.
इसके बाद जैसे घटनाओं की बाढ़ आ गई. फरवरी में टीसीएस कर्मचारी मानव शर्मा का वीडियो सामने आया, जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी निकिता पर प्रताड़ना के आरोप लगाए. फिर मार्च में मेरठ का वह खौफनाक ‘नीला ड्रम’ केस आया, जहां मुस्कान नाम की महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति के टुकड़े कर सीमेंट के ड्रम में जमा दिए थे. इन घटनाओं ने उस छवि को पूरी तरह तोड़ दिया जिसमें महिलाओं को हमेशा सिर्फ ‘पीड़ित’ के तौर पर देखा जाता था.
जुर्म के बदलते पैटर्न ने सबको चौंका दिया. औरैया की प्रगति यादव ने शादी के महज 15 दिन बाद अपने पति की हत्या सिर्फ इसलिए करवा दी क्योंकि वह अपने प्रेमी के साथ रहना चाहती थी. इसके बाद इंदौर का ‘हनीमून मर्डर’ केस सामने आया, जहां शिलॉन्ग घूमने गई सोनम रघुवंशी ने अपने पति राजा की हत्या की साजिश रची.
इन खबरों ने इंटरनेट पर #MenToo और #MenLivesMatter जैसे आंदोलनों को जन्म दिया. लोग अब खुलेआम पूछने लगे हैं कि क्या 498A जैसे कानूनों का गलत इस्तेमाल हो रहा है? क्या अब वक्त आ गया है कि कानूनों को जेंडर-न्यूट्रल (लिंग-निरपेक्ष) बनाया जाए?
सिक्के का दूसरा पहलू देखें तो NCRB के आंकड़े अब भी डरावने हैं. महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा और दहेज के मामले अब भी लाखों में हैं. समस्या तब खड़ी होती है जब एक जेंडर को दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है. साल 2025 में हमने देखा कि कैसे कई जगहों पर महिलाओं को सामूहिक रूप से ‘विलेन’ की तरह पेश किया जाने लगा. लड़कों के परिवार अब शादी से पहले लड़कियों की जासूसी कराने लगे हैं और युवाओं में शादी का खौफ बढ़ रहा है.
2025 ने हमें एक बड़ी सीख दी है कि दर्द का कोई जेंडर नहीं होता. इस साल ने पुरुषों को एक ऐसा मंच दिया जहां वे बिना झिझक अपनी मेंटल हेल्थ और प्रताड़ना पर बात कर सके. अदालतों ने भी कई मामलों में ‘झूठे दहेज केस’ पर सख्त टिप्पणियां कीं, जो एक सकारात्मक बदलाव है.
हमें ऐसे कानूनी सुधारों की जरूरत है जहां गुनहगार को सजा मिले, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष. झूठे केस करने वालों पर सख्त कार्रवाई और शादी जैसे रिश्तों में परिवार के जबरन दबाव को कम करना ही ‘अतुल सुभाष’ जैसे युवाओं को बचाने का एकमात्र रास्ता है. 2025 ने बहस की मशाल जला दी है, अब उम्मीद है कि 2026 न्याय और समानता का नया सवेरा लेकर आएगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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