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अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर रोक; कोर्ट ने केंद्र सरकार सहित राज्यों को नोटिस जारी कर मांगा जवाब

अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का लगातार विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दिया है. साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार, सहित चार राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. कोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया है.  सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जे के.महेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह आदेश दिया है. कोर्ट 21 जनवरी को इस मामले में अगली सुनवाई करेगा.

पर्यावरणविदों का कहना है कि इस एकरूप मानदंड के कारण हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैली प्राचीन अरावली श्रृंखला के लगभग 90 फीसदी हिस्से को अरावली की श्रेणी से बाहर किया जा सकता है, जिससे वहां खनन गतिविधियों का रास्ता साफ हो जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से की गई सिफारिशों को स्वीकार करते हुए कहा था कि दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली की रक्षा के लिए स्पष्ट और वैज्ञानिक परिभाषा बेहद जरूरी है. समिति के अनुसार अरावली जिले में स्थित कोई भी भू -आकृति, जिसकी ऊंचाई जमीन से ही00 मीटर या उससे अधिक हो उसे अरावली पहाड़ी माना जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट ने तय किया अरावली का दायरा

वहीं, 500 मीटर के दायरे में स्थितदो या उससे अधिक ऐसी पहाड़ियों को मिलाकर अरावली रेंज की श्रेणी में रखा जाएगा. समिति ने यह भी सुझाव दिया था कि पहाड़ी के साथ उसकी सहायक ढलानें, आसपास की भूमि और संबंधित भू-आकृतियां, चाहे उनका ढाल कितना भी हो, अरावली का हिस्सा मानी जाएंगी. इसी तरह दो पहाड़ियों के बीच का क्षेत्र भी निर्धारित मापदंडों के अनुसार अरावली रेंज में शामिल होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को दिए अपने फैसले में कहा है कि ऐसी कोई भी जमीन जिसकी ऊंचाई स्थानीय भू-भाग (जमीन) से 100 मीटर या उससे अधिक हो, यदि दो या उससे अधिक ऐसी पहाड़ियां 500 मीटर के दायरे में है, तो उन्हें एक ही पहाड़ियों का समूह माना जाएगा. इन पहाड़ियों और रेंज के भीतर आने वाले सभी लैंडफॉर्म, उनकी ऊंचाई या ढलान चाहे जो हो, खनन से बाहर रहेंगे.

बता दें कि अरावली पर्वत श्रृंखला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जो समय के.साथ काफी हद तक घिस चुकी है. अधिवक्ता गांधी ने कहा है कि इसकी पारिस्थितिक भूमिका केवल ऊंची चोटियों तक सीमित नही है. कम ऊँचाई वाली पहाड़ियां, चट्टानी उभार, ढलान, जल पुनभरण क्षेत्र और आपसी संपर्क वाले भू भाग भी भूजल संरक्षण, धूल और मरुस्थलीकरण को रोकने, जैव विविधता को बनाए रखने और दिल्ली एनसीआर के सूक्ष्म जलवायु संतुलन में अहम भूमिका निभाते है.

ये भी पढ़ें: उन्नाव रेप केस मामले में सेंगर की जमानत रद्द की मांग वाली सीबीआई की याचिका पर 29 दिसंबर को होगी सुनवाई

-भारत एक्सप्रेस

गोपाल कृष्ण

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