दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला देते हुए कहा है कि 17 साल का नाबालिग अपने पिता को लिवर दान कर सकता है. यह याचिका नाबालिग बेटे प्रतीक शॉ ने मां वंदना शॉ के माध्यम से दायर की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस मिनी पुष्करणा और जस्टिस विनोद कुमार की पीठ ने यह फैसला दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बेटे के प्यार और फर्ज को देखते हुए लिवर ट्रांसप्लांट की अनुमति देना पूरी तरह न्यायसंगत है.
अदालत ने कहा कि इस मामले में बेटे के अलावा कोई अन्य डोनर नहीं था; यदि ट्रांसप्लांट की अनुमति नहीं दी गई तो पिता की जान को गंभीर खतरा हो सकता था. कोर्ट ने रेखांकित किया कि नाबालिग पूरी तरह अपनी इच्छा, प्रेम और पारिवारिक दायित्व की भावना से अंगदान करना चाहता है; इसमें कोई दबाव या व्यावसायिक लाभ का उद्देश्य नहीं है. अदालत ने वसंत कुंज स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (ILBS) को याचिकाकर्ता के संदर्भ में सभी कानूनी व क्लिनिकल प्रोटोकॉल का पालन करने का निर्देश दिया है.
वही मामले की सुनवाई के दौरान आईएलबीएस (ILBS) ने कोर्ट को बताया कि अस्पताल अदालत के आदेश का इंतजार कर रहा है और अब ऑपरेशन के लिए जल्द ही तारीख तय की जाएगी.
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सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार ने कोर्ट को बताया कि दिल्ली के उपराज्यपाल (LG) और सक्षम अथॉरिटी ने 29 जून 2026 को ही नाबालिग को अपने पिता को लिवर दान करने की औपचारिक अनुमति दे दी थी. यह केंद्र सरकार का एक महत्वपूर्ण कानून है, जिसका मुख्य उद्देश्य इंसानी अंगों के व्यापार को रोकना और जरूरतमंद मरीजों के लिए अंगों के सही और कानूनी ट्रांसप्लांट को बढ़ावा देना है.
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