दिल्ली हाई कोर्ट की कार्यवाही के वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किए जाने के मामले में सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सौरभ भारद्वाज, पत्रकार सौरभ दास और गोपाल राय ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ सोशल मीडिया से पोस्ट को हटा दिया गया है. जिसपर इनलोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दायर करने वाले वकील अशोक चैतन्य ने कहा कि आपत्तिजनक सोशल मीडिया पोस्ट हटा दिए गए हैं.
याचिकाकर्ता ने यह जानकारी जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच को दिया है. उन्होंने कोर्ट को बताया कि भले ही सामग्री हटाई गई प्रतीत हो रही हो, लेकिन उनके पास डिजिटल रिकॉर्ड मैजुद है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता की मांग पर इसे रिकॉर्ड पर ले लिया है. कोर्ट 21 सितंबर को मामले में अगली सुनवाई करेगा.
अदालत ने हाई कोर्ट के रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह सभी संबंधित सामग्री प्रतिवादियों को उपलब्ध कराए. साथ ही कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल सहित सभी को चार सप्ताह में अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. इससे पहले गूगल ने अपना जवाब दाखिल कर कहा था कि उसके लिए यूट्यूब पर कोर्ट की कार्यवाही की अनाधिकृत रिकॉर्डिंग की पहचान करना या उन्हें दोबारा अपलोड होने से रोकना तकनीकी और व्यवहारिक रूप से संभव नही है. गूगल ने कोर्ट को स्पष्ट किया था कि वह केवल उन्हीं वीडियो को हटा सकता है, जिनके यूआरएल या वेबलिंक उपलब्ध कराए जाएं.
सर्च इंजन गूगल ने दायर हलफनामे में यह भी कहा था कि उसके लिए ये संभव नही कि यूट्यूब पर वो कोर्ट की कार्यवाही के अनाधिकृत रेकॉर्डिंग और उसके अपलोड या शेयर करने पर नजर रख सके. गूगल ने यह भी कहा था कि ऐसे रेकॉर्डिंग यूट्यूब से बाहर किए जाते हैं और उसके लिए ये पता करना असंभव है कि वीडियो में कोर्ट की कार्यवाही है या नही. सर्च इंजन ने कहा था कि वे ये भी पता नहीं लगा पाएगी कि रेकॉर्डिंग अनाधिकृत है या नहीं. इसको लेकर देश भर की अदालतों का अलग-अलग फैसला है. गूगल ने अपने हलफनामे में कहा था कि वो उन्हीं वीडियो को हटा सकता है जिनके यूआरएल या वेबलिंक बताए जाए.
दरअसल जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अवमानना की कार्रवाई करने का आदेश जारी करते हुए दोनों मामलों से अपने आप को अलग कर लिया था केजरीवाल सहित अन्य ने स्वर्णकांता शर्मा को पत्र लिखकर केस से हटने की मांग की थी. जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ सोशल मीडिया पर आरोप लगाने के चलते अवमानना की कार्रवाई शुरू करने को कहा था.
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि एक जज सत्ता के सामने झुक नहीं सकता. उन्होंने कहा था कि जब संस्था दांव पर हो, तब अदालत को सुविधा नहीं बल्कि साहस चुनना होता है. यह अदालत सुविधा के बजाय साहस का रास्ता चुनेगी. हाईकोर्ट ने कहा था कि अवमानना करने वालों ने गलतफहमी पाल ली है कि उनके बयानों और सामग्री को ‘जनमत’ का रूप देकर बचाया जा सकता है.
कोर्ट ने कहा था कि अवमानना कानून सिर्फ किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी न्यायिक संस्था की रक्षा करता है. हाईकोर्ट ने कहा था कि एक जज सत्ता के सामने झुक नहीं सकता. जब संस्था दांव पर हो, तब अदालत को सुविधा नहीं बल्कि साहस चुनना होता है. यह अदालत सुविधा के बजाय साहस का रास्ता चुनेगी.
ये भी पढ़ें: डिजिटल अरेस्ट स्कैम पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, आरबीआई को म्यूल अकाउंट्स पर एसओपी बनाने का निर्देश
-भारत एक्सप्रेस
दक्षिणी ध्रुव की बर्फ में छिपे ब्रह्मांड के रहस्यमयी कणों को पकड़ने की दिशा में…
फॉर्म-6 में बदलाव पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद CEC ज्ञानेश कुमार घिर गए…
मोकामा विधायक पर अनंत सिंह का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, इससे…
Hair Conditioner Mistakes: काले और घने बालों के लिए सिर्फ शैंपू ही नहीं, कंडीशनर लगाने…
महाराष्ट्र में भीषण सूखे की स्थिति को लेकर शिवसेना के मुख्य नेता और राज्य के…
सलमान खान की फिल्म मातृभूमि को सूचना प्रसारण मंत्रालय से NOC मिल गई है. अब…