दिल्ली के राऊज एवेन्यु कोर्ट ने पाकिस्तानी फंडिंग से जुड़े बहुचर्चित मनी लॉन्ड्रिंग (धन शोधन) मामले में कश्मीरी अलगाववादी नेता यासीन मलिक समेत कुल सात आरोपियों के खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय (Framing of Charges) कर दिए हैं.
स्पेशल जज प्रशांत शर्मा ने मामले में पेश किए गए दस्तावेजी और फॉरेंसिक साक्ष्यों का संज्ञान लेते हुए यह आदेश दिया. अदालत ने माना कि इन आरोपियों के खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं.
जांच एजेंसी (ED) के अनुसार, यासीन मलिक सहित अन्य आरोपियों पर यह गंभीर आरोप है कि उन्होंने हवाला चैनलों के जरिए पाकिस्तानी प्रतिष्ठान से विदेशी फंडिंग प्राप्त की थी. आरोप है कि इस अवैध नेटवर्क के जरिए कुल 8,94,87,639 रुपये (लगभग 8.94 करोड़ रुपये) की रकम जुटाई गई, जो बाद में विभिन्न माध्यमों से आरोपियों तक पहुंची.
ईडी का कहना है कि इस गैरकानूनी तरीके से प्राप्त पैसों को आरोपियों द्वारा स्थानांतरित किया गया, छिपाया गया, अपने कब्जे में रखा गया और अलग-अलग राष्ट्र-विरोधी व गैरकानूनी गतिविधियों में इस्तेमाल किया गया.
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अपराध से अर्जित इस अवैध संपत्ति और रकम की जांच के सिलसिले में 14 जून 2017 को अपनी शिकायत दर्ज की थी.
25 मई 2022 को पटियाला हाउस कोर्ट ने हत्या और टेरर फंडिंग के एक अन्य मामले में यासीन मलिक को आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा सुनाई थी. कोर्ट ने यूएपीए (UAPA) की धारा 17 के तहत उसे आजीवन कारावास और 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था. 10 मई 2022 को यासीन मलिक ने अपना गुनाह कबूल कर लिया था.
हाल ही में एनआईए (NIA) ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों की तर्ज पर यासीन मलिक को फांसी की सजा दी जानी चाहिए. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पिछली सुनवाई में दलील दी थी कि यासीन मलिक ने फांसी की सजा से बचने के लिए बेहद चालाकी से अदालत में अपना गुनाह कबूल कर लिया था, जबकि उसके द्वारा किए गए अपराध ऐसे हैं जिनके लिए मौत की सजा का प्रावधान है.
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यदि कोई आतंकवादी इस तरह से गुनाह कबूल करके फांसी से बच जाएगा, तो यह न्याय प्रणाली के लिए सही नहीं होगा. (बता दें कि इस मामले की सुनवाई के दौरान 11 जुलाई को हाईकोर्ट के जज जस्टिस अमित शर्मा ने खुद को अलग कर लिया था, क्योंकि वह 2010 में एनआईए की तरफ से बतौर अभियोजक पेश हो चुके थे, जिसके बाद मामला मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया था.)
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