लीगल

‘नागरिकों की सुरक्षा की बलि नहीं चढ़ा सकती सरकार’, न्यूक्लियर पावर प्लांट मुआवजा कानून 2025 पर SC में तीखी बहस

परमाणु न्यूक्लियर पावर प्लांट में किसी अप्रिय घटना होने की स्थिति में मुआवजे की अधिकतम सीमा 3000 करोड़ रुपए तय करने वाले 2025 के नए कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे एक बेहद संवेदनशील विधायी नीति का मुद्दा करार दिया है. कोर्ट ने कहा कि अप्रत्याशित न्यूक्लियर पावर प्लांट दुर्घटना की स्थिति में नागरिकों के प्रति सरकार की अतिरिक्त देयता निर्धारित करने से अदालतों को नहीं रोका जा सकता है, भले ही नए कानून के तहत इसे सीमित क्यों न कर दिया गया हो.

सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने इस पर चिंता व्यक्त करते हुए यह टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले में विस्तृत सुनवाई करेगा. कोर्ट ई एस शर्मा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है.

मुआवजे की सीमा पर प्रशांत भूषण की दलीलें

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि मुआवजे को कानून के जरिए सीमित कर दिया गया है. जबकि दुर्घटना की स्थिति में नागरिकों को दिया जाने वाला मुआवजा हजारों करोड़ रुपए तक हो सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि यह सीमा संभावित नुकसान के मुकाबले बेहद मामूली और खतरनाक है.

याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने इसको लेकर तीन आपत्ति जताई हैं. भूषण ने कहा कि हालांकि सरकार के पास आर्थिक और ऊर्जा नीतियां बनाने का पूरा अधिकार है, लेकिन वह नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और उनकी सुरक्षा की कीमत पर ऐसा नहीं कर सकती है.

फुकुशिमा दुर्घटना का दिया हवाला

भूषण ने 2011 में जापान में हुई फुकुशिमा दाइची परमाणु ऊर्जा संयंत्र दुर्घटना का हवाला देते हुए दलील दी कि यदि कोई परमाणु दुर्घटना होती है तो उससे होने वाला नुकसान इससे सैकड़ों गुना अधिक होगा. उन्होंने कहा कि सरकार नीति के माध्यम से जो चाहे कर सकती है, लेकिन वह नागरिकों के अधिकारों की बलि नहीं चढ़ा सकती.

ये भी पढ़ें: मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टर के हत्यारों को सुनाई उम्रकैद की सजा

कोर्ट ने कहा यह एक अत्यंत संवेदनशील विधायी नीतिगत मुद्दा है. कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि प्रौद्योगिकी बाहर से ही लानी होगी और आश्चर्य व्यक्त किया कि यदि दायित्व की सीमा तय नहीं की गई तो यहां संचालन करने कौन आएगा. भूषण ने तर्क दिया कि शांति अधिनियम 2025 ने वर्ष 2010 के पुराने सिविल न्यूक्लियर डैमेज लायबिलिटी एक्ट को निरस्त कर दिया है, जिससे नागरिकों को मिलने वाली सुरक्षा कमजोर हुई है.

गोपाल कृष्ण

Recent Posts

बंगाल के अकाल के बीच कैसी थी दुर्गा पूजा? कहीं भोग की थाली सजी, तो कहीं एक मुट्ठी चावल के लिए तरसे लोग

1943 के बंगाल अकाल में लाखों लोगों ने भूख और कुपोषण के कारण अपनी जान…

57 minutes ago

झारखंड में 108 एंबुलेंस कर्मियों का NHM दफ्तर पर प्रदर्शन: 21 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल का अल्टीमेट

Jharkhand 108 ambulance workers protest Ranchi: रांची में 108 एंबुलेंस कर्मियों ने बकाया वेतन और…

1 hour ago

‘पहले वैकल्पिक व्यवस्था, फिर विस्थापन!’ ओंकारेश्वर में 19 अक्टूबर से चक्का जाम का ऐलान, संतों और व्यापारियों ने खोला मोर्चा

मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग तीर्थ ओंकारेश्वर में सिंहस्थ 2028 के तहत प्रस्तावित विकास परियोजनाओं…

1 hour ago

उन्नाव में चलती AC बस में लगी भीषण आग, वाटर पार्क से लौट रहे थे बच्चे

उन्नाव में लखनऊ-कानपुर हाईवे पर स्कूली बच्चों से भरी एसी बस में अचानक आग लग…

2 hours ago

ताहिर हुसैन की बढ़ेंगी मुश्किलें! दंगा भड़काने के मामले में कोर्ट ने सुनाई 2 साल की कैद और जुर्माना

दिल्ली दंगों से जुड़े दयालपुर मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने आम आदमी पार्टी के पूर्व…

2 hours ago