शूलटंकेश्वर महादेव मंदिर
शुक्रवार से सावन के महीने की शुरुआत हो चुकी है. हिंदू धर्म में सावन मास का खास महत्व है और हो भी क्यों न, ये विश्व के नाथ बाबा विश्वनाथ (Baba Vishwanath) का सबसे प्रिय मास जो है. काशी के साथ ही देश भर के मंदिरों में भक्तों की भीड़ जुटनी शुरू हो चुकी है. काशी में भी बाबा का एक ऐसा मंदिर है, जहां बाबा भक्तों के शूल को काटते हैं और दर्शन करने मात्र से कई मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं. यह मंदिर है, शूलटंकेश्वर महादेव का मंदिर (Shultankeshwar Mahadev Temple).
वाराणसी (Varanasi) के रोहनिया विधानसभा क्षेत्र में गंगा तट पर स्थित शूलटंकेश्वर महादेव मंदिर आस्था और पौराणिक महत्व के प्रमुख केंद्रों में से एक है. कैंट स्टेशन से लगभग 15 किलोमीटर और अखरी बाईपास से चार किलोमीटर दूर माधोपुर गांव में यह मंदिर स्थित है. चुनार रोड पर खनांव के पास बना इसका भव्य द्वार श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. सामान्य दिनों में भी यहां भक्तों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन सावन और शिवरात्रि के दौरान भारी भीड़ उमड़ती है. आज से सावन मास शुरू होने के साथ ही इस मंदिर में भक्तों का तांता लगने लगा है.
शिव पुराण (Shiva Puran) और काशी खंड में इस मंदिर का विशेष उल्लेख है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, माधव ऋषि ने गंगा के अवतरण से पहले इस स्थान पर शिवलिंग की स्थापना कर भगवान शिव की आराधना की थी. जब गंगा अपने रौद्र रूप में काशी में प्रवेश करने लगीं, तो भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से उनके वेग को रोक दिया. इससे गंगा को पीड़ा हुई और उन्होंने क्षमा मांगी.
पुराणों में उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव ने गंगा से दो वचन लिए थे. इनमें पहला, गंगा काशी को स्पर्श करते हुए प्रवाहित होंगी और दूसरा, काशी में स्नान करने वाले भक्तों को जलीय जीवों से कोई हानि नहीं होगी. गंगा के वचन देने के बाद शिव ने अपना त्रिशूल हटाया. इसीलिए यह मंदिर काशी का दक्षिण द्वार कहलाता है. मंदिर में शूलटंकेश्वर महादेव का स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है. साथ ही प्रांगण में श्रीराम भक्त हनुमान, माता पार्वती, भगवान गणेश, कार्तिकेय और नंदी की मूर्तियां भी विराजमान हैं. मान्यता है कि यहां दर्शन-पूजन करने से भक्तों के सभी कष्ट और दुख दूर हो जाते हैं, जैसे गंगा के शूल (कष्ट) समाप्त हुए थे.
उत्तर प्रदेश सरकार की ऑफिशियल वेबसाइट पर मंदिर के बारे में जानकारी मिलती है. मंदिर के पुजारी बताते हैं कि इस मंदिर का नाम पहले ऋषि माधव के नाम पर माधवेश्वर महादेव था. उन्होंने भगवान शिव की आराधना के लिए इस लिंग की स्थापना की थी. पुजारी बताते हैं कि शूलटंकेश्वर महादेव के दर्शन से न केवल आध्यात्मिक शांति मिलती है, बल्कि जीवन की बाधाएं भी दूर होती हैं. यह मंदिर काशी के बारह द्वारों में से एक है, जो दक्षिण दिशा की रक्षा करता है. सावन के महीने में यहां जलाभिषेक और रुद्राभिषेक के लिए भक्तों की भीड़ रहती है. मंदिर का शांत वातावरण और गंगा का निकटवर्ती प्रवाह इसे ध्यान और भक्ति के लिए आदर्श बनाता है.
-भारत एक्सप्रेस
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