शादीशुदा पुरुष का लिव-इन में रहना अब गुनाह नहीं!
Allahabad High Court Order: शादीशुदा पुरुष का किसी महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहना कोई अपराध नहीं है. यह बात कही है इलाहाबाद हाईकोर्ट ने, कोर्ट की डिवीजन बेंच (जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना) ने शुक्रवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा- सहमति से किसी वयस्क महिला के साथ रिलेशनशिप में रहना अपराध नहीं है.
बेंच ने साफ कहा कि कानून और नैतिकता को अलग रखना चाहिए. अगर कोई काम कानून के अनुसार अपराध नहीं है तो सामाजिक राय या नैतिकता के आधार पर कोर्ट फैसला नहीं बदल सकता.
शाहजहांपुर के रहने वाले नेत्रपाल (शादीशुदा) और अनामिका (वयस्क महिला) लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे थे. अनामिका के परिवार ने विरोध किया और उन्हें जान से मारने की धमकी दी. परिवार ने अपहरण का केस भी दर्ज कराया. पुलिस ने बीएनएस की धारा 87 के तहत एफआईआर दर्ज की. कपल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सुरक्षा मांगी.
कोर्ट ने कहा कि दोनों वयस्क हैं और सहमति से साथ रह रहे हैं. इसलिए उन्हें कोई सजा नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने एसएसपी शाहजहांपुर को आदेश दिया कि वे कपल की सुरक्षा सुनिश्चित करें. कोई गिरफ्तारी न हो. एसएसपी खुद इसकी जिम्मेदारी लें. परिवार को चेतावनी दी गई कि वे कपल को नुकसान न पहुंचाएं, उनके घर न आएं और संपर्क न करें. राज्य सरकार को 8 अप्रैल तक जवाब देने को कहा गया.
कोर्ट ने कहा, “कोई ऐसा अपराध नहीं है जिसमें शादीशुदा पुरुष किसी वयस्क के साथ सहमति से लिव-इन में रहने पर मुकदमा चलाया जा सके. नैतिकता और कानून को अलग रखना चाहिए.”
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप कानूनी रूप से वैध मानी जाती है अगर दोनों वयस्क हों और सहमति से साथ रहें. सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में इसे मौलिक अधिकार माना गया है. यह शादी के बराबर अधिकार नहीं देती लेकिन सुरक्षा और जीवन का अधिकार जरूर देती है. परिवार या समाज हस्तक्षेप नहीं कर सकता. कुछ राज्यों में लिव-इन जोड़ों को सुरक्षा मिल सकती है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उन प्रेमी जोड़ों के लिए राहत है जो परिवार के विरोध का सामना कर रहे हैं. कोर्ट ने साफ किया कि पुलिस का कर्तव्य है कि सहमति से प्रेम संबंध में रह रहे दो वयस्कों की रक्षा करे.
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