दबथुवा में जबरन चकबंदी और लेखपाल पर धांधली का आरोप लगा कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन करते किसान.
Meerut News:हरिश शर्मा/ मेरठ: उत्तर प्रदेश के मेरठ के दबथुवा गांव में चकबंदी प्रक्रिया के नाम पर जारी कथित भ्रष्टाचार और जालसाजी ने भारी बवाल खड़ा कर दिया है. भारतीय किसान यूनियन के नेतृत्व में गुस्साए किसान कलेक्ट्रेट में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए हैं और लेखपाल को तत्काल निलंबित करने की मांग कर रहे हैं.
मेरठ के दबथुवा गांव में चकबंदी प्रक्रिया के नाम पर धांधली का मामला सामने आया है. लेखपाल अनिल कुमार पर 30 लाख रुपये रिश्वत मांगने और मृत किसानों के नाम पर फर्जी दस्तखत कर चकबंदी लागू करने का आरोप लगा है. इसके विरोध में भाकियू के नेतृत्व में किसानों ने कलेक्ट्रेट पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है. किसानों की मांग है कि आरोपी लेखपाल को निलंबित किया जाए और गांव की चकबंदी तुरंत निरस्त की जाए.
मेरठ जनपद के दबथुवा गांव में जबरन चकबंदी थोपने और चकबंदी विभाग में जारी भ्रष्टाचार के खिलाफ किसानों का गुस्सा फूट पड़ा है. भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के बैनर तले दर्जनों किसान कलेक्ट्रेट परिसर में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए. धरने के दौरान किसानों ने बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी को ज्ञापन सौंपा और प्रशासनिक अधिकारियों को जमीन पर अपने पास बैठाकर अपनी समस्याएं सुनाईं. ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि जब तक मांगें पूरी नहीं होंगी, वे पीछे नहीं हटेंगे.
ग्रामीणों का आरोप है कि गांव के 90 प्रतिशत किसान चकबंदी के सख्त खिलाफ हैं, फिर भी चकबंदी लेखपाल अनिल कुमार और विभागीय अधिकारी इसे जबरन लागू करने पर अड़े हैं. लेखपाल पर फर्द, नाम चढ़ाने और नक्शा-5 में ट्यूबवेल दर्ज करने के एवज में लाखों की रिश्वतखोरी का आरोप है. आरोप तो यह भी है कि उसने चकबंदी रोकने और किसानों के पक्ष में रिपोर्ट लगाने के नाम पर ₹30 लाख की मांग की थी.
जालसाजी की हद तब पार हो गई जब 9 सितंबर को चकबंदी के समर्थन में कुछ फॉर्म तैयार किए गए. इन फॉर्मों पर गांव के उन बुजुर्गों और ग्रामीणों के हस्ताक्षर दिखाए गए, जिनकी मृत्यु काफी समय पहले हो चुकी है. जब ग्रामीणों ने लेखपाल को रंगे हाथों पकड़ा, तो वह बुजुर्गों को गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी देते हुए मौके से फरार हो गया.
भाकियू नेता अनिल चौधरी (दबथुवा) ने कहा कि गांव में सड़कें और पानी की कोई कमी नहीं है. मेरठ-करनाल हाईवे पर स्थित इस गांव की अधिकांश जमीन (5,000 से 5,500 बीघा) 1970 के दशक में सेना के लिए अधिग्रहित हो चुकी है और अब मात्र 2,000-2,200 बीघा जमीन बची है. किसानों का कहना है कि यह चकबंदी सिर्फ किसानों को लूटने और आपस में विवाद कराने की साजिश है.
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-भारत एक्सप्रेस
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