UP Bureaucrats in Politics: उत्तर प्रदेश में एक बार फिर नौकरशाही और सत्ता के गलियारों के बीच का फासला मिटता दिख रहा है. 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही प्रशासनिक कुर्सी वाले चुनावी दंगल में उतरने की तैयारी में हैं. चर्चा है कि 2 IAS और 2 PCS अधिकारी पहली बार 2027 के विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि जब एक आईएएस या आईपीएस अधिकारी अपनी नौकरी, रुतबा और लालबत्ती छोड़कर खादी का दामन थामता है, तो जनता की अदालत में उसका सक्सेस रेट क्या रहता है?
बीते 12 वर्षों के आंकड़ों को देखें तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में पूर्व नौकरशाहों का ट्रैक रिकॉर्ड बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाला रहा है. इस दौरान 14 वरिष्ठ आईएएस और आईपीएस अधिकारियों ने राजनीति का रुख किया, लेकिन चुनावी कामयाबी केवल उन्हीं के हिस्से आई जिन्होंने सत्ताधारी दलों का झंडा थामा. वहीं नई पार्टी बनाने वाले एक अदद जीत के लिए तरसते रह गए.
गुजरात कैडर के 1988 बैच के आईएएस अधिकारी अरविंद कुमार शर्मा प्रशासनिक गलियारों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे भरोसेमंद अधिकारियों में गिने जाते रहे हैं. 2001 से 2014 तक गुजरात सीएमओ और फिर 2014 से पीएमओ में शीर्ष जिम्मेदारियां संभालने के बाद उन्होंने 2021 में वीआरएस ले लिया. 2022 में बीजेपी ने उन्हें यूपी विधान परिषद (MLC) भेजा और सीधे ऊर्जा एवं नगर विकास जैसे भारी-भरकम विभागों का कैबिनेट मंत्री बना दिया.
1994 बैच के आईपीएस अधिकारी असीम अरुण का राजनीति में आना किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं रहा. वे प्रधानमंत्री की सुरक्षा वाली एसपीजी (SPG) क्लोज प्रोटेक्शन टीम में रहे, यूपी डायल-112 के एडीजी रहे और कानपुर के पहले पुलिस कमिश्नर बने. जनवरी 2022 में उन्होंने वीआरएस लिया और महज दो महीने के भीतर मार्च 2022 में कन्नौज सदर सीट से भाजपा विधायक बनकर समाज कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) की कुर्सी संभाल ली.
आईआईटी धनबाद से पढ़े राजेश्वर सिंह का नाम देश के सबसे हाई-प्रोफाइल जांच अधिकारियों में शामिल रहा है. प्रवर्तन निदेशालय (ED) के संयुक्त निदेशक के पद पर रहते हुए उन्होंने 2G स्पेक्ट्रम, अगस्ता वेस्टलैंड, आम्रपाली और गोमती रिवरफ्रंट जैसे चर्चित घोटालों की जांच की. नौकरी के 11 साल बाकी रहते हुए फरवरी 2022 में उन्होंने वीआरएस लिया और भाजपा के टिकट पर लखनऊ की सरोजनीनगर सीट से भारी मतों से जीतकर विधायक बने.
बागपत के रहने वाले सत्यपाल सिंह मुंबई के पुलिस कमिश्नर पद पर तैनात थे, जब उन्होंने 59 साल की उम्र में इस्तीफा देकर राजनीति का रुख किया. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें गृह क्षेत्र बागपत से पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह के खिलाफ उतारा, जहां उन्होंने बड़ी जीत दर्ज की. 2017 में वे केंद्र सरकार में मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री बने और 2019 में दोबारा सांसद चुने गए.
मायावती सरकार के सबसे ताकतवर पुलिस अधिकारी रहे 1977 बैच के आईपीएस बृजलाल 2011 में यूपी के पुलिस महानिदेशक (DGP) बने. 2015 में रिटायरमेंट के बाद उन्होंने भाजपा की सदस्यता ली. पार्टी ने पहले उन्हें यूपी अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग का अध्यक्ष बनाया और फिर 2020 में राज्यसभा सांसद बनाकर संसद के उच्च सदन भेज दिया.
पन्ना लाल पुनिया (पीएल पुनिया) ने 1970 बैच के आईएएस के रूप में यूपी में मुलायम सिंह यादव और मायावती दोनों के कार्यकाल में प्रमुख सचिव के अहम पद संभाले. रिटायरमेंट के बाद उन्होंने कांग्रेस का हाथ थामा और 2009 में बाराबंकी सुरक्षित सीट से लोकसभा सांसद बने. 2014 में हार के बाद कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भेजा. अब उनके बेटे तनुज पुनिया बाराबंकी से कांग्रेस सांसद हैं.
जिन्होंने अपनी पार्टी तो बनाई, पर खुद चुनावी समर से रहे दूर
लगातार शासन-प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाने और 2015 में मुलायम सिंह यादव से फोन पर विवाद के बाद चर्चा में आए अमिताभ ठाकुर को 2021 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी थी. इसके बाद उन्होंने ‘आजाद अधिकार सेना’ नाम से राजनीतिक पार्टी का गठन किया और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान किया, लेकिन अंततः वे चुनावी मैदान में नहीं उतरे.
2017 में योगी सरकार के पहले डीजीपी बने सुलखान सिंह अपनी साफ-सुथरी छवि के लिए जाने जाते हैं. रिटायरमेंट के 6 साल बाद 2023 में उन्होंने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 15 जिलों को मिलाकर अलग राज्य बनाने की मांग के साथ ‘बुंदेलखंड लोकतांत्रिक पार्टी’ बनाई. 2024 के चुनाव में प्रत्याशी उतारने का दावा करने के बावजूद पार्टी ने कोई उम्मीदवार नहीं उतारा और वे खुद भी चुनावी दौड़ से दूर रहे.
जिन्होंने अलग रास्ता चुना और चुनावी दंगल में खा गए मात
केंद्र में प्रमुख सचिव पद से 2008 में रिटायर होने के बाद डॉ. चंद्रपाल ने 2009 में ‘आदर्श समाज पार्टी’ बनाई. उन्होंने आगरा की सुरक्षित सीट से तीन बार लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन उनका प्रदर्शन लगातार गिरता गया. 2009 में उन्हें मात्र 1,093 वोट (0.17%), 2019 में 2,802 वोट और 2024 में सिमटकर महज 643 वोट मिले.
गोंडा के डीएम और एलडीए उपाध्यक्ष रहे राम बहादुर ने रिटायरमेंट के बाद 2014 और 2017 में बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार हार गए. इसके बाद उन्होंने ‘नागरिक एकता पार्टी’ बनाई और 2019 में फिर चुनाव हारे. लगातार विफलता के बाद उन्होंने अपनी पार्टी छोड़कर 2022 में भाजपा का दामन थाम लिया.
2003 में आईजी पद से रिटायर होने के बाद एसआर दारापुरी ने दलित, आदिवासी और मानवाधिकार आंदोलनों का नेतृत्व किया. उन्होंने 2009, 2014 और 2019 में सोनभद्र की रॉबर्ट्सगंज सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हर बार करारी हार का सामना करना पड़ा. 2019 में उन्हें केवल 11,032 वोट मिले, जिसके बाद उन्होंने सक्रिय चुनावी राजनीति छोड़ दी.
1992 में बाबरी विध्वंस के समय अयोध्या के डीएम रहे विजय शंकर पांडेय मायावती सरकार में प्रमुख सचिव रहे और यूपी के भ्रष्ट आईएएस अफसरों की लिस्ट जारी कर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए थे. 2015 में रिटायर होकर उन्होंने ‘लोक गठबंधन पार्टी’ बनाई और 2019 में अयोध्या लोकसभा सीट से खुद चुनाव लड़ा, जहां उन्हें मात्र 2,056 वोट मिले और वे 10वें नंबर पर रहे.
अखिलेश यादव की सरकार में मुख्य सचिव रहे आलोक रंजन ने लखनऊ मेट्रो और आगरा एक्सप्रेस-वे जैसे ड्रीम प्रोजेक्ट्स को जमीन पर उतारा. रिटायरमेंट के बाद वे सपा के मुख्य सलाहकार बने. 2024 में समाजवादी पार्टी ने उन्हें राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया, लेकिन पार्टी विधायकों की क्रॉस वोटिंग के चलते वे चुनाव हार गए.
डीजी भर्ती बोर्ड रहे डॉ. सूर्य कुमार शुक्ला ने रिटायरमेंट से ठीक पहले मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर भाजपा के लिए प्रचार करने की इच्छा जताई थी. 2019 में वे भाजपा में शामिल तो हो गए, लेकिन पार्टी ने उन्हें अब तक किसी भी चुनाव में टिकट नहीं दिया है.
2027 के रण में उतरने की तैयारी कर रहे 2 IAS और 2 PCS अधिकारी
मिर्जापुर की डीएम रहते हुए आजादी के बाद पहली बार लहुरियादह गांव में पाइपलाइन से पीने का पानी पहुंचाकर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरने वाली दिव्या मित्तल ने अगस्त 2026 में प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दे दिया. 29 सितंबर को उन्होंने राजनीति में आने का खुला ऐलान किया. माना जा रहा है कि वे मिर्जापुर जिले की किसी प्रमुख विधानसभा सीट से 2027 का चुनाव लड़ सकती हैं.
जौनपुर निवासी पूर्व आईएएस अभिषेक सिंह अक्सर चर्चाओं में रहे हैं. 2022 चुनाव में प्रेक्षक ड्यूटी के दौरान सोशल मीडिया पोस्ट और बाद में बिना सूचना अनुपस्थित रहने के चलते वे विवादों में रहे और अंततः इस्तीफा दे दिया. 2024 से वे जौनपुर में सामाजिक कार्यक्रमों के जरिए युवाओं के बीच सक्रिय हैं और 2027 में विधानसभा चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी कर चुके हैं.
बस्ती निवासी डॉ. राकेश वर्मा 1997 बैच के पीसीएस और बाद में प्रमोटेड आईएएस रहे. 2020 में वीआरएस लेने के बाद वे पहले चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी में रहे, लेकिन हाल ही में सितंबर 2026 में वे कांग्रेस में शामिल हो गए. वे 2027 में बस्ती या आसपास की सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं.
बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट रहे अलंकार अग्निहोत्री ने जनवरी 2026 में प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद उन्होंने ‘राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा’ (RAM) नाम से अपना राजनीतिक संगठन खड़ा किया है और 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में प्रदेश की सभी 403 सीटों पर प्रत्याशी उतारने का ऐलान कर दिया है.
उत्तर प्रदेश के पिछले 12 सालों का राजनीतिक इतिहास यह साफ साबित करता है कि जनता किसी पूर्व आईएएस या आईपीएस को सिर्फ उसकी प्रशासनिक डिग्री या पूर्व रुतबे के आधार पर वोट नहीं देती. चुनावी राजनीति की अपनी अलग अंकगणितीय और सामाजिक वास्तविकताएं हैं. जो अधिकारी सत्ताधारी कैडर के स्थापित सांगठनिक ढांचे के साथ जुड़े, वे तुरंत मंत्री बन गए; लेकिन जिन्होंने अपने बलबूते ‘सिस्टम बदलने’ के लिए नई पार्टियां बनाईं, उन्हें जनता ने नकार दिया. अब देखना होगा 2027 के चुनाव में जनता क्या गुल खिलाती है.
Poompuhar Archaeology: तमिलनाडु के तट से करीब 2 किलोमीटर दूर समुद्र के भीतर ऐसी खोज…
MAHARASHTRA'S QUANTUM AMBITIONS IN LONDON: महाराष्ट्र को देश की क्वांटम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) राजधानी…
मुजफ्फरनगर में पुरानी रंजिश के चलते एक व्यक्ति को लाठी-डंडों से बेरहमी से पीटने का…
Manipur Violence: मणिपुर के पहाड़ी जिलों में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है.…
UP Congress Clash: लखनऊ स्थित कांग्रेस मुख्यालय में अजय राय और ममता चौधरी के समर्थकों…
शारदीय नवरात्रि के पहले दिन अयोध्या में श्रीराम की कुलदेवी मां बड़ी देवकाली मंदिर में…