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कैसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार के बहाने भारत पर जमाया कब्जा? जानिए गवर्नरों की पूरी कहानी

भारत में अंग्रेजों का शासन अचानक शुरू नहीं हुआ था. इसके पीछे कई दशकों तक चली व्यापारिक चालें, राजनीतिक दांव-पेच, सैन्य ताकत और सत्ता हासिल करने की महत्वाकांक्षा की लंबी कहानी है. शुरुआत में भारत आए अंग्रेज व्यापार करने की बात करते थे, लेकिन धीरे-धीरे उनका मकसद बदलता गया. व्यापारिक समझौतों से शुरू हुआ यह सफर आखिरकार भारतीय रियासतों पर कब्जे और पूरे देश पर ब्रिटिश हुकूमत कायम करने तक पहुंच गया.

इतिहासकार अमर फारूकी की किताब Governors of Empire: The East India Company’s Chief Functionaries in India इसी बदलाव को समझने का मौका देती है. इसमें उन प्रमुख अधिकारियों की भूमिका पर रोशनी डाली गई है, जिन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को एक व्यापारिक संस्था से एक बड़ी राजनीतिक और सैन्य ताकत बनाने में अहम भूमिका निभाई. इन अधिकारियों के फैसलों ने न सिर्फ भारत की राजनीति बदली, बल्कि देश के इतिहास पर भी गहरा असर डाला. कहानी की शुरुआत 1608 में होती है, जब अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का जहाज ‘हेक्टर’ गुजरात के सूरत तट पर पहुंचा.

उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि व्यापार के लिए भारत आने वाले अंग्रेज आगे चलकर यहां की सत्ता पर अपना अधिकार जमा लेंगे.

शुरुआत में कंपनी का मुख्य उद्देश्य व्यापार करना और मुनाफा कमाना था. लेकिन समय के साथ उसने भारतीय शासकों के आपसी मतभेदों और राजनीतिक परिस्थितियों का फायदा उठाना शुरू कर दिया. जहां मौका मिला, वहां समझौते किए गए. जरूरत पड़ने पर सैन्य ताकत का इस्तेमाल हुआ और कई जगहों पर राजनीतिक चालों के जरिए इलाकों पर नियंत्रण हासिल किया गया.

किताब में बताया गया है कि कंपनी के गवर्नरों और दूसरे बड़े अधिकारियों ने इस विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. भारत आने वाले कई अधिकारी जब वापस ब्रिटेन लौटे, तो उनके पास पहले से कहीं ज्यादा दौलत और प्रभाव था.

रॉबर्ट क्लाइव से शुरू हुई सत्ता की बड़ी कहानी

ईस्ट इंडिया कंपनी के विस्तार की चर्चा रॉबर्ट क्लाइव के बिना पूरी नहीं हो सकती. उन्होंने बंगाल में कंपनी की राजनीतिक और सैन्य ताकत बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई. बंगाल पर कंपनी का नियंत्रण मजबूत होने के बाद अंग्रेजों के लिए भारत के दूसरे हिस्सों में अपना प्रभाव फैलाने का रास्ता भी आसान हुआ.

क्लाइव के बाद वारेन हेस्टिंग्स का दौर आया. उन्होंने बंगाल में कंपनी के प्रशासन को मजबूत किया और उसके शासन का दायरा बढ़ाने में भूमिका निभाई. बंगाल और बिहार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कंपनी का प्रभाव लगातार बढ़ता गया. इस दौरान व्यापार करने वाली संस्था धीरे-धीरे शासन चलाने वाली ताकत बनती जा रही थी.

इसके बाद चार्ल्स कॉर्नवालिस ने जिम्मेदारी संभाली. औपनिवेशिक इतिहास में उनके कार्यकाल को कई बार ब्रिटिश शासन के सुधारवादी दौर के रूप में पेश किया गया है. हालांकि, अमर फारूकी की किताब ऐसे दौर को केवल प्रशासनिक सुधारों के नजरिए से देखने के बजाय उसके पीछे मौजूद औपनिवेशिक हितों पर भी ध्यान देने की जरूरत बताती है.

सहायक संधियों से बढ़ता गया अंग्रेजों का प्रभाव

कंपनी के विस्तार की कहानी में रिचर्ड वेलेजली का नाम भी बेहद अहम है. उनके कार्यकाल में सहायक संधियों यानी ‘सब्सिडियरी अलायंस’ की नीति का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया.

इस व्यवस्था के तहत भारतीय रियासतों को अंग्रेजों की सैन्य सहायता लेने के बदले कंपनी की शर्तें माननी पड़ती थीं. कई मामलों में उन्हें अपने यहां अंग्रेजी सेना रखने और उसका खर्च उठाने की जिम्मेदारी भी दी जाती थी. इससे रियासतों की स्वतंत्रता सीमित होती गई और कंपनी का राजनीतिक प्रभाव मजबूत होता गया.

लॉर्ड हेस्टिंग्स के कार्यकाल में भी कंपनी ने अपनी सैन्य और राजनीतिक ताकत का विस्तार किया. पेशवा की सत्ता के पतन और मराठों की राजनीतिक शक्ति कमजोर होने के बाद पश्चिमी भारत में अंग्रेजों का दबदबा बढ़ा. इस तरह कंपनी का प्रभाव केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में फैलने लगा.

इस दौर में जॉन शोर और रॉबर्ट होबार्ट जैसे अधिकारियों का भी जिक्र आता है. भले ही उनके नाम रॉबर्ट क्लाइव या लॉर्ड डलहौजी जितने चर्चित न हों, लेकिन कंपनी के प्रशासन और शासन के विकास की कहानी में उनकी भूमिका को भी समझना जरूरी है.

लॉर्ड डलहौजी के दौर में तेजी से बढ़ा अंग्रेजी शासन

कंपनी के विस्तार के इतिहास में लॉर्ड डलहौजी का कार्यकाल खास महत्व रखता है. उनके समय में पंजाब और अवध जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को अंग्रेजी शासन के अधीन लाया गया. इससे कंपनी का नियंत्रण उत्तर भारत के बड़े हिस्से तक फैल गया.

डलहौजी की नीतियों ने भारतीय रियासतों और अंग्रेजी शासन के बीच तनाव को और बढ़ाया. कंपनी की विस्तारवादी नीति के कारण कई शासकों और उनके समर्थकों में असंतोष पैदा हुआ. यही असंतोष उन व्यापक राजनीतिक परिस्थितियों का हिस्सा बना, जिनके बीच 1857 का विद्रोह सामने आया.

चार्ल्स कैनिंग ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नियुक्त अंतिम गवर्नर-जनरल बने. 1857 के विद्रोह के समय वही इस पद पर थे. विद्रोह के बाद भारत में शासन व्यवस्था बदल गई और कंपनी की जगह ब्रिटिश ताज ने सीधे सत्ता संभाल ली. जॉन लॉरेंस भी कंपनी के पुराने अधिकारियों में शामिल थे, जिन्होंने उसके शासनकाल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं.

क्या अंग्रेज सच में भारत में सुधार करने आए थे?

अमर फारूकी की किताब का एक अहम पहलू यह है कि वह अंग्रेज अधिकारियों की भूमिका को केवल सुधारों, प्रशासनिक बदलावों या कानून-व्यवस्था तक सीमित करके नहीं देखती. इसके बजाय यह समझने की कोशिश करती है कि उनके फैसलों के पीछे व्यापारिक फायदे, राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और निजी संपत्ति बढ़ाने की इच्छा किस तरह काम करती थी.

कंपनी के अधिकारियों ने कई बार प्रशासनिक सुधारों की बात की, लेकिन साथ ही भारत के संसाधनों और क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण भी बढ़ाया. व्यापार से होने वाला मुनाफा और सत्ता से मिलने वाले फायदे एक-दूसरे से जुड़ते चले गए. नतीजा यह हुआ कि एक विदेशी व्यापारिक संस्था भारतीय राजनीति की सबसे ताकतवर शक्तियों में शामिल हो गई.

यह किताब उन औपनिवेशिक कहानियों पर भी सवाल उठाती है, जिनमें अंग्रेज गवर्नरों को केवल न्यायप्रिय शासक या सुधारक के रूप में दिखाया जाता रहा है. इतिहास को समझने के लिए उनके फैसलों के पीछे मौजूद हितों और उन फैसलों का भारतीय समाज पर पड़े असर को देखना भी जरूरी है.

भारत के इतिहास को समझने के लिए क्यों अहम है यह किताब?

Governors of Empire सिर्फ अंग्रेज गवर्नरों की जीवनियों का संग्रह नहीं है. यह उस पूरी प्रक्रिया को समझने की कोशिश है, जिसके जरिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार से शुरुआत करके भारत के बड़े हिस्से पर अपना शासन कायम किया.

रॉबर्ट क्लाइव से लेकर लॉर्ड डलहौजी और चार्ल्स कैनिंग तक के कार्यकाल को जोड़कर देखने पर साफ होता है कि ब्रिटिश सत्ता का विस्तार किसी एक व्यक्ति या एक घटना का परिणाम नहीं था. इसके पीछे कई अधिकारियों की नीतियां, युद्ध, संधियां और भारतीय राज्यों की बदलती राजनीतिक परिस्थितियां थीं.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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