विशेष

‘नमक के व्यापारी से लेकर…’, जानिए इतिहास के सबसे बड़े योद्धा हेमचन्द्र विक्रमादित्य की अनसुनी कहानी

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी कहानी जितनी छोटी दिखाई देती है, उसका असर उतना ही बड़ा रहा है. हेमचन्द्र विक्रमादित्य, जिन्हें इतिहास में अक्सर हेमू के नाम से जाना जाता है, ऐसा ही एक नाम हैं. 7 अक्टूबर 1556 का दिन उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है, जब वे दिल्ली के सिंहासन पर बैठे और उन्होंने स्वयं को ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि दी.

हेमू का जन्म 2 अक्टूबर 1501 को विजयादशमी के दिन राजस्थान के अलवर क्षेत्र के मछेरी गांव में हुआ था. उनके पिता राय पूरणमल शुरुआत में पुरोहित थे, लेकिन बाद में परिवार रेवाड़ी आ गया. यहां उन्होंने नमक और बारूद बनाने में इस्तेमाल होने वाले शोरे का व्यापार शुरू किया. इसी माहौल में हेमू ने शिक्षा हासिल की. उन्हें संस्कृत और हिन्दी के साथ फारसी, अरबी तथा गणित का भी ज्ञान था. साथ ही उन्होंने युद्ध और प्रशासन की बारीकियां भी सीखीं.

व्यापार से दरबार तक का सफर

युवावस्था में हेमू आगरा पहुंचे और उस समय के अफगान शासन में बाजार निरीक्षक के तौर पर काम करने लगे. उनकी योग्यता और सूझबूझ ने जल्द ही उन्हें सामान्य अधिकारी से बड़े पदों तक पहुंचा दिया.

जब मुहम्मद आदिल शाह सत्ता में आया, तब हेमू का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा. वे कोतवाल से लेकर सामन्त, सेनापति और फिर प्रधानमंत्री तक पहुंचे. एक मौके पर दरबार में सिकंदर खां लोहानी ने आदिल शाह पर हमला करने की कोशिश की. हेमू ने तत्काल हस्तक्षेप कर सुल्तान की जान बचाई. इसके बाद उनका भरोसा दरबार में और मजबूत हो गया.

हेमू सिर्फ प्रशासनिक क्षमता के लिए नहीं, बल्कि अपनी सैन्य रणनीति के लिए भी प्रसिद्ध हुए. उन्होंने कई विद्रोहों को दबाया और लगातार युद्धों में सफलता हासिल की. इब्राहीम खां, मुहम्मद खां गोरिया, ताज कर्रानी और रुख खां नूरानी जैसे विरोधियों के खिलाफ अभियानों में उन्होंने अपनी सैन्य क्षमता साबित की. उनके अभियानों का प्रभाव बिहार और बंगाल से लेकर पंजाब तक दिखाई देने लगा.

हालांकि उस समय वे आदिल शाह के लिए लड़ रहे थे, लेकिन उनके मन में अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने की इच्छा धीरे-धीरे मजबूत होती जा रही थी.

हुमायूं की मृत्यु के बाद बदली तस्वीर

1556 में हुमायूं की मृत्यु के बाद उत्तर भारत की राजनीति अचानक बदल गई. हेमू ने तेजी से कदम उठाए और आगरा की ओर बढ़े. वहां तैनात मुगल अधिकारी इस्कंदर खान उजबेक उनके सामने टिक नहीं सका और दिल्ली की ओर चला गया.

इसके बाद हेमू ने दिल्ली का रुख किया. दिल्ली में मुगल सेनापति तर्दी बेग के साथ संघर्ष हुआ, लेकिन आखिरकार मुगल सेना को पीछे हटना पड़ा. यह हेमू के लिए निर्णायक सफलता थी.

7 अक्टूबर 1556 को हेमू ने दिल्ली के सिंहासन पर बैठकर ‘हेमचन्द्र विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की. इस तरह एक ऐसे व्यक्ति ने दिल्ली की सत्ता अपने हाथ में ली, जिसकी शुरुआत किसी शाही परिवार से नहीं, बल्कि एक सामान्य परिवार से हुई थी.

उस समय भारत की राजनीतिक तस्वीर

उस दौर का भारत किसी एक केंद्रीकृत सत्ता के अधीन नहीं था. बंगाल, बिहार और उड़ीसा में अलग-अलग अफगान अधिकारी प्रभावी थे. राजस्थान की रियासतें अपने-अपने संघर्षों में उलझी हुई थीं. मध्य भारत में रानी दुर्गावती का प्रभाव था, जबकि दक्षिण में विजयनगर साम्राज्य एक बड़ी शक्ति था.

मुगल सत्ता भी उस समय पूरी तरह मजबूत नहीं हुई थी. अकबर अभी युवा थे और उनके शासन की वास्तविक बागडोर उनके संरक्षक बैरम खां के हाथों में थी. ऐसे समय में दिल्ली और आगरा पर नियंत्रण हासिल करना हेमू की ताकत को बेहद महत्वपूर्ण बना देता था.

मुगलों के लिए अब हेमू सबसे बड़ी चुनौती बन चुके थे. जवाब में बैरम खां ने मुगल सेना को उनके खिलाफ संगठित किया.

पानीपत में हुआ निर्णायक मुकाबला

5 नवंबर 1556 को पानीपत के मैदान में दोनों सेनाओं के बीच दूसरा बड़ा युद्ध हुआ. शुरुआत में हेमू की सेना ने जोरदार हमला किया और मुगल सेना पर भारी दबाव बना दिया. युद्ध का रुख काफी हद तक उनके पक्ष में जाता दिखाई दे रहा था.

लेकिन तभी एक तीर हेमू की आंख को भेदता हुआ उनके मस्तिष्क तक जा पहुंचा. गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने तीर निकालकर आंख पर कपड़ा बांधा और कुछ समय तक युद्ध जारी रखने की कोशिश की. मगर भारी रक्तस्राव के कारण वे बेहोश होकर अपने हाथी के हौदे में गिर पड़े.

उनके घायल होने की खबर फैलते ही उनकी सेना का मनोबल कमजोर पड़ गया और युद्ध का पलड़ा मुगलों की ओर झुक गया. इसके बाद हेमू को बंदी बना लिया गया और उनकी हत्या कर दी गई.

इस युद्ध ने न केवल हेमू के शासन का अंत किया, बल्कि उत्तर भारत में मुगल सत्ता को दोबारा मजबूत होने का रास्ता भी दिया.

इतिहास में हेमू की जगह

हेमचन्द्र विक्रमादित्य का शासन बहुत लंबा नहीं चला, लेकिन उनका राजनीतिक और सैन्य सफर आज भी इतिहास में चर्चा का विषय है. सामान्य पृष्ठभूमि से निकलकर सत्ता के सर्वोच्च स्तर तक पहुंचना और दिल्ली के सिंहासन पर बैठना उनके जीवन की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में गिना जाता है.

उनके समर्थक उन्हें एक ऐसे योद्धा के रूप में याद करते हैं, जिसने बेहद कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में अपनी शक्ति के बल पर दिल्ली पर अधिकार किया. कुछ इतिहासकारों ने उनकी तुलना यूरोप के प्रसिद्ध सैन्य शासक नेपोलियन से भी की है.

7 अक्टूबर का दिन इसलिए खास माना जाता है क्योंकि इसी दिन 1556 में हेमू ने दिल्ली के सिंहासन पर बैठकर ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की थी. उनका जीवन यह दिखाता है कि मध्यकालीन भारत की राजनीति सिर्फ राजवंशों की कहानी नहीं थी. उस दौर में योग्यता, सैन्य क्षमता, रणनीति और अवसर का इस्तेमाल करके एक सामान्य परिवार से निकला व्यक्ति भी सत्ता के केंद्र तक पहुंच सकता था.

यह भी पढ़ें: गाड़ी के पीछे लिखा ‘भारत सरकार’ और उसके अंदर से मिला ड्राइवर का शव

-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

Recent Posts

3 मजबूरियों का यू-टर्न! न..न.. करते पाकिस्तान ने क्यों एक्टिवेट किया मक्का पैक्ट?

Why Makkah Pact Activated: सऊदी अरब पर हूती हमलों के बाद पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी…

3 minutes ago

राष्ट्र सेवा के 25 साल पूरे होने पर पीएम मोदी को बधाई, स्वामी अवधेशानंद गिरि बोले- उनकी राह किसी तपस्या से कम नहीं

जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की…

12 minutes ago

नंदीग्राम उपचुनाव मामले में सुप्रीम कोर्ट से कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को राहत

सुप्रीम कोर्ट ने नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान की अंतरिम जमानत के खिलाफ…

13 minutes ago

आसीम मुनीर Vs शहबाज शरीफ! ट्रॉफी ‘चोरी’ के बाद अब कुर्सी पर नजर, क्या बड़ा खेल खेल रहे मोहसिन नकवी?

Pakistan Political Crisis: पाकिस्तान में शहबाज शरीफ, असीम मुनीर और मोहसिन नकवी के बीच बढ़ती…

20 minutes ago

पीएम मोदी के नेतृत्व में बदला यूपी, माफिया मिट्टी में मिल गए- मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी ने बुधवार को कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन और…

26 minutes ago

‘वाह क्या एनर्जी है’ का दूसरा सीजन पेश: GAIL ने लॉन्च किया ‘नए भारत की नई एनर्जी’ एंथम, जानिए क्या है खास

गेल (इंडिया) लिमिटेड ने स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए 'वाह क्या एनर्जी है'…

28 minutes ago