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भारतीय मौसम विभाग (IMD) की 1920 के दशक की एक महत्वपूर्ण खोज ने न केवल भारतीय मॉनसून के पूर्वानुमान को बदल दिया, बल्कि वैश्विक मौसम विज्ञान की समझ को भी नई दिशा प्रदान की. ब्रिटिश गणितज्ञ और मौसम वैज्ञानिक सर गिल्बर्ट वॉकर (Sir Gilbert Walker) ने दक्षिणी आक्सिलेशन (Southern Oscillation) की खोज की, जो आज एल नीनो-सदर्न आक्सिलेशन (ENSO) के नाम से जानी जाती है. इस खोज ने मॉनसून की भविष्यवाणी को सांख्यिकीय सहसंबंधों से आगे ले जाकर वैज्ञानिक आधार प्रदान किया.
सर गिल्बर्ट वॉकर, जिन्होंने IMD के प्रमुख के रूप में कार्य किया, ने 1920 के शुरुआती वर्षों में महासागरीय-वायुमंडलीय अंतर्क्रिया का अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि प्रशांत महासागर के पूर्वी और पश्चिमी भागों के बीच वायुमंडलीय दबाव में एक नियमित उतार-चढ़ाव होता है. इस घटना को उन्होंने दक्षिणी आक्सिलेशन (SO) नाम दिया.
यह खोज इसलिए क्रांतिकारी थी क्योंकि:
उन्होंने तीन प्रमुख महासागरीय क्षेत्रों (प्रशांत, अटलांटिक और हिंद महासागर) में वायुमंडलीय दबाव के आंकड़ों का विश्लेषण किया और पाया कि जब दबाव पूर्वी ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया के आसपास कम होता है, तो भारत में मॉनसून कमजोर पड़ सकता है.
आज हम जानते हैं कि:
सर गिल्बर्ट वॉकर की खोज ने इन दोनों चरणों (El Niño और La Niña) को समझने की नींव रखी. बाद में नॉर्वेजियन मौसम वैज्ञानिक जैकब ब्जर्कनेस (Jacob Bjerknes) ने 1960 के दशक में इसे और विस्तार दिया, जब उन्होंने दिखाया कि महासागर और वायुमंडल एक-दूसरे को कैसे प्रभावित करते हैं.
वॉकर की खोज से पहले IMD मुख्य रूप से सांख्यिकीय मॉडलों पर निर्भर था. 1988 तक IMD ने पूरे देश के लिए मॉनसून पूर्वानुमान देना बंद कर दिया था क्योंकि सटीकता कम थी.
1988 में IMD ने फिर से मात्रात्मक पूर्वानुमान शुरू किए. आज IMD उन्नत कंप्यूटेशनल मॉडल, उपग्रह डेटा और ENSO जैसी घटनाओं को ध्यान में रखकर लंबी अवधि के पूर्वानुमान देता है. इससे चरम मौसम घटनाओं (जैसे सूखा या बाढ़) से निपटने में मदद मिलती है.
सर गिल्बर्ट वॉकर की खोज ने साबित किया कि मौसम कोई स्थानीय घटना नहीं, बल्कि वैश्विक प्रणाली का हिस्सा है. आज ENSO भारतीय कृषि, जल संसाधन प्रबंधन और आपदा प्रबंधन के केंद्र में है.
1920 के दशक की यह खोज भारतीय मौसम विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है. सर गिल्बर्ट वॉकर ने न केवल मॉनसून की समझ बदली, बल्कि दुनिया भर के वैज्ञानिकों को प्रेरित किया. आज जब हम जलवायु परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं, तब उनकी खोज और भी प्रासंगिक हो गई है.
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-भारत एक्सप्रेस
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