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UN में पास हुआ ‘Correct the Map’ प्रस्ताव, 450 साल पुराने मर्केटर मैप से क्या है अफ्रीका की नाराजगी?

दुनिया का नक्शा हम बचपन से जैसा देखते आए हैं, जरूरी नहीं कि धरती के देशों और महाद्वीपों का असली आकार भी वैसा ही हो. इसी मुद्दे को लेकर संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक अहम प्रस्ताव को भारी बहुमत मिला है. ‘करेक्ट द मैप’ यानी ‘नक्शे को सही करो’ नाम के इस प्रस्ताव का मकसद ऐसे विश्व मानचित्रों को बढ़ावा देना है, जिनमें खास तौर पर अफ्रीका और दक्षिणी गोलार्ध के दूसरे क्षेत्रों का आकार ज्यादा वास्तविक नजर आए.

प्रस्ताव को 164 देशों ने समर्थन दिया. इसके खिलाफ सिर्फ अमेरिका ने वोट किया, जबकि सर्बिया, एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा और यूक्रेन मतदान से दूर रहे. हालांकि यह फैसला कानूनी रूप से देशों के लिए बाध्यकारी नहीं है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने सरकारों, स्कूलों, मीडिया संस्थानों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से अपील की है कि जहां देशों के आपसी क्षेत्रफल की तुलना मायने रखती हो, वहां ज्यादा सटीक मानचित्रों का इस्तेमाल किया जाए.

आखिर पुराने नक्शे में दिक्कत क्या है?

इस बहस की जड़ करीब 450 साल पुराने एक नक्शे से जुड़ी है. 1569 में फ्लेमिश मानचित्रकार जेरार्डस मर्केटर ने एक ऐसा प्रोजेक्शन तैयार किया था, जो समुद्री यात्राओं और नेविगेशन के लिए बेहद उपयोगी साबित हुआ. इसमें दिशा और समुद्री रास्तों को समझना आसान था.

लेकिन इसकी एक बड़ी कमी थी धरती के अलग-अलग हिस्सों का वास्तविक क्षेत्रफल दिखाने में यह काफी विकृति पैदा करता है. भूमध्य रेखा से जितना दूर कोई इलाका होता है, नक्शे पर उसका आकार उतना ही ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है.

इसका सबसे चर्चित उदाहरण ग्रीनलैंड है. पारंपरिक मर्केटर नक्शे में ग्रीनलैंड कई बार अफ्रीका के लगभग बराबर दिखाई देता है. जबकि हकीकत बिल्कुल अलग है. अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना ज्यादा है. ग्रीनलैंड का वास्तविक आकार लगभग कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य के बराबर है.

यही वजह है कि मर्केटर नक्शे पर यूरोप, रूस और उत्तरी अमेरिका अपेक्षाकृत ज्यादा बड़े नजर आते हैं, जबकि अफ्रीका, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका अपने वास्तविक आकार की तुलना में छोटे दिखाई देते हैं.

मामला सिर्फ नक्शे तक सीमित नहीं

अफ्रीकी देशों का कहना है कि यह सिर्फ एक तकनीकी समस्या नहीं है. नक्शे जिस तरह दुनिया को दिखाते हैं, उसका असर लोगों की सोच पर भी पड़ सकता है. बच्चे स्कूलों में इन्हीं नक्शों से दुनिया को समझना शुरू करते हैं. मीडिया, किताबों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी लंबे समय से इन्हीं मानचित्रों का इस्तेमाल होता रहा है.

अफ्रीकी संघ का तर्क है कि जब किसी महाद्वीप को लगातार उसके वास्तविक आकार से छोटा दिखाया जाता है, तो अनजाने में उसकी आर्थिक क्षमता, संसाधनों और वैश्विक महत्व को लेकर भी एक गलत धारणा बन सकती है. इसे अफ्रीका की ‘प्रतीकात्मक लघुता’ से जोड़कर देखा जा रहा है.

क्या है Equal Earth प्रोजेक्शन?

इसी समस्या को दूर करने के लिए ‘Equal Earth’ प्रोजेक्शन को सामने रखा गया है. इसे 2018 में विकसित किया गया था. इसकी खासियत यह है कि यह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के क्षेत्रफल को मर्केटर प्रोजेक्शन की तुलना में कहीं ज्यादा सही अनुपात में दिखाता है.

इस नक्शे में अफ्रीका का आकार देखकर उसकी विशालता ज्यादा स्पष्ट नजर आती है. दूसरी ओर ग्रीनलैंड और यूरोप पहले की तुलना में छोटे दिखाई देते हैं. अफ्रीकी संघ पहले ही Equal Earth प्रोजेक्शन को अपनाने की दिशा में कदम उठा चुका है. इस अभियान में टोगो ने भी अहम भूमिका निभाई है.

टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट ड्यूसी ने मतदान से पहले इस पहल का समर्थन करते हुए कहा था कि एक न्यायसंगत दुनिया की शुरुआत एक न्यायसंगत नक्शे से होनी चाहिए. उनके मुताबिक नक्शे सिर्फ भौगोलिक जानकारी नहीं देते, बल्कि हमारी शिक्षा और दुनिया को देखने के नजरिए को भी प्रभावित करते हैं.

फ्रांस ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया है और मर्केटर प्रोजेक्शन से हटने की बात कही है.

फिर क्या मर्केटर नक्शा पूरी तरह खत्म हो जाएगा?

ऐसा फिलहाल नहीं कहा जा सकता. मर्केटर प्रोजेक्शन की अपनी उपयोगिता है. खासकर समुद्री और हवाई नेविगेशन जैसे क्षेत्रों में दिशाओं को समझने के लिए इसका इस्तेमाल अब भी उपयोगी माना जाता है.

संयुक्त राष्ट्र का मौजूदा प्रस्ताव भी हर जगह मर्केटर नक्शे पर रोक लगाने की बात नहीं करता. जोर इस बात पर है कि जब देशों या महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना की जा रही हो, तब ऐसा मानचित्र इस्तेमाल किया जाए जो आकार को ज्यादा सटीक तरीके से पेश करता हो.

इस प्रस्ताव को पारित होना एक बड़ा प्रतीकात्मक कदम जरूर है, लेकिन असली बदलाव अब इसके बाद दिखाई देगा. स्कूलों की किताबों, सरकारी दस्तावेजों, समाचार संस्थानों और ऑनलाइन मैपिंग प्लेटफॉर्म्स में किस तरह के नक्शे इस्तेमाल किए जाते हैं, यह काफी मायने रखेगा.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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