उत्तर प्रदेश एक बार फिर बीजेपी की चुनावी तैयारियों के केंद्र में है. 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए लखनऊ में पार्टी ने संगठन को जमीन पर मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है. इस बार फोकस सिर्फ बड़े नेताओं की रैलियों या चुनावी नारों पर नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे संगठनात्मक हिस्सों पर है, जहां से चुनावी तस्वीर बनती है.
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के नतीजों ने बीजेपी को अपने संगठन और चुनावी रणनीति पर नए सिरे से सोचने का मौका दिया. राज्य की 80 लोकसभा सीटों में बीजेपी को 33 सीटें मिलीं, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटों पर जीत दर्ज की. यह नतीजा बीजेपी के लिए इसलिए भी अहम था क्योंकि उत्तर प्रदेश लंबे समय से उसकी राष्ट्रीय चुनावी रणनीति का एक बड़ा आधार रहा है.
लोकसभा में उत्तर प्रदेश की सबसे ज्यादा 80 सीटें हैं. ऐसे में यहां का चुनावी प्रदर्शन सीधे तौर पर राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ जाता है. यही वजह है कि 2024 के नतीजों के बाद बीजेपी ने राज्य में संगठन की स्थिति, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और अलग-अलग इलाकों में पार्टी के प्रदर्शन की समीक्षा शुरू की.
पार्टी के सामने चुनौती सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ाने की नहीं है. उसे यह भी देखना है कि जिन इलाकों में संगठन कमजोर पड़ा, वहां कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय कैसे किया जाए और स्थानीय स्तर पर मतदाताओं से संपर्क किस तरह मजबूत किया जाए.
बीजेपी की मौजूदा रणनीति में बूथ प्रबंधन को खास जगह दी जा रही है. पार्टी ने उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों में बूथ स्तर पर सम्मेलन और संगठनात्मक गतिविधियां बढ़ाने की योजना बनाई है. स्थानीय समितियों और कार्यकर्ताओं के जरिए यह समझने की कोशिश की जा रही है कि किस क्षेत्र में संगठन मजबूत है और कहां अभी काम की जरूरत है.
वरिष्ठ नेताओं की बैठकों का दौर भी जारी है. इनमें सांसदों, विधायकों, जिलास्तरीय पदाधिकारियों और जमीनी कार्यकर्ताओं से फीडबैक लिया जा रहा है. मकसद संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बनाने के साथ-साथ स्थानीय समस्याओं और चुनावी माहौल की जानकारी सीधे नीचे से ऊपर तक पहुंचाना है.
बीजेपी की मौजूदा कवायद के पीछे 2024 के लोकसभा चुनाव का अनुभव एक बड़ा कारण माना जा रहा है. पार्टी की समीक्षा में ऐसे कई बूथ सामने आए जहां 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को बढ़त मिली थी, लेकिन दो साल बाद लोकसभा चुनाव में तस्वीर बदल गई.
खास तौर पर ग्रामीण इलाकों, अवध और पूर्वांचल के कुछ हिस्सों में पार्टी के प्रदर्शन को लेकर समीक्षा की गई. यही वजह है कि अब बूथ स्तर से मिलने वाले फीडबैक को काफी अहम माना जा रहा है. पार्टी यह समझने की कोशिश कर रही है कि मतदाताओं के बीच किन मुद्दों का असर है, संगठन कहां कमजोर हुआ और किन सामाजिक समूहों के साथ संपर्क बढ़ाने की जरूरत है.
चुनावी तैयारी का एक बड़ा हिस्सा उन कार्यकर्ताओं को दोबारा सक्रिय करने से जुड़ा है जो पिछले चुनावों के बाद उतने सक्रिय नहीं रहे. इसके साथ ही कमजोर और करीबी मुकाबले वाली सीटों पर बूथ कमेटियों को मजबूत करने, स्थानीय फीडबैक जुटाने और सरकारी योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुंचाने पर भी जोर दिया जा रहा है.
डिजिटल माध्यमों के साथ-साथ सीधे मतदाता संपर्क को भी रणनीति का हिस्सा बनाया जा रहा है. यानी पार्टी की कोशिश ऊपर से नीचे तक एक ऐसा नेटवर्क तैयार करने की है, जिसमें लखनऊ में लिए गए फैसलों की जानकारी बूथ तक पहुंचे और बूथ से मिलने वाली प्रतिक्रिया वापस नेतृत्व तक आए.
बीजेपी की यूपी रणनीति में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राज्य स्तर की भूमिका, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय प्रभाव, सहयोगी दलों के साथ तालमेल और बूथ स्तर का संगठन—इन सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश दिखाई दे रही है.
हालांकि बैठकों, समीक्षा और संगठनात्मक तैयारियों का असर आखिरकार चुनाव के दौरान जमीन पर ही दिखाई देगा. 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन लखनऊ में चल रही गतिविधियों से इतना साफ है कि बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में अपनी तैयारी को शुरुआती दौर में ही गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है.
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-भारत एक्सप्रेस
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