आज वीर सावरकर की जयंती पर एक बार फिर उनका नाम चर्चा में है. भारतीय राजनीति, इतिहास और विचारधारा की बात हो और सावरकर का जिक्र न आए, ऐसा शायद ही कभी होता है. कोई उन्हें महान क्रांतिकारी मानता है, तो कोई उनकी विचारधारा पर सवाल उठाता है. विनायक दामोदर सावरकर इतिहास के उन चेहरों में से हैं जिन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं है.
हाल ही में लेखक विक्रम संपत की दो-खंडों में आई जीवनी ने सावरकर के जीवन को नए तरीके से सामने रखा है. इस किताब में सिर्फ घटनाओं का जिक्र नहीं है, बल्कि उस दौर की राजनीति, संघर्ष और वैचारिक टकराव को भी गहराई से समझाने की कोशिश की गई है.
1883 में महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर गांव में जन्मे सावरकर बचपन से ही तेज दिमाग और विद्रोही स्वभाव के माने जाते थे. उस समय देश अंग्रेजों की गुलामी में था और 1857 की क्रांति की कहानियां युवा सावरकर को बेहद प्रभावित करती थीं. उन्होंने 1857 की लड़ाई को “भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम” बताया, जबकि अंग्रेज इसे सिर्फ ‘सिपाही विद्रोह’ कहते थे.
पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उनकी राष्ट्रवादी सोच और मजबूत हुई. बाद में वे कानून की पढ़ाई के लिए लंदन पहुंचे, लेकिन वहां जाकर भी उनका असली मकसद आजादी की लड़ाई को आगे बढ़ाना ही रहा.
लंदन का इंडिया हाउस उस समय भारतीय क्रांतिकारियों का बड़ा केंद्र बन चुका था. सावरकर वहां कई युवा क्रांतिकारियों के संपर्क में आए. उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ साहित्य लिखा, युवाओं को संगठित किया और गुप्त गतिविधियों में भी हिस्सा लिया.
किताब में बताया गया है कि सावरकर सिर्फ भाषण देने वाले नेता नहीं थे, बल्कि वे क्रांतिकारी गतिविधियों की रणनीति बनाने में भी सक्रिय रहते थे. हथियार जुटाने से लेकर युवाओं को प्रशिक्षण देने तक, वे कई कामों में शामिल रहे.
नासिक षड्यंत्र केस में गिरफ्तारी के बाद सावरकर को दो-दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. उन्हें अंडमान की सेलुलर जेल भेजा गया, जिसे उस दौर में “काला पानी” कहा जाता था.
जेल की जिंदगी बेहद दर्दनाक थी. कैदियों से कठोर मजदूरी करवाई जाती थी, मारपीट होती थी और कई बार भूखा भी रखा जाता था. विक्रम संपत की किताब जेल के अंदर की जिंदगी का ऐसा चित्र खींचती है जो पाठकों को झकझोर देता है.
कई लोग सावरकर की दया याचिकाओं को लेकर सवाल उठाते हैं, लेकिन लेखक का कहना है कि इसे सिर्फ “माफी मांगना” कहकर देखना अधूरा नजरिया होगा. किताब के मुताबिक, सावरकर जेल से बाहर आकर आंदोलन को नए तरीके से आगे बढ़ाना चाहते थे.
1924 में रिहा होने के बाद सावरकर का एक अलग रूप सामने आया. रत्नागिरी में रहते हुए उन्होंने जातिवाद और छुआछूत के खिलाफ अभियान चलाया. मंदिरों में दलितों के प्रवेश का समर्थन किया और अंतरजातीय विवाह जैसी सामाजिक सुधारों की खुलकर वकालत की.
दिलचस्प बात यह है कि सावरकर धार्मिक रूढ़ियों के आलोचक थे. वे तर्क और विज्ञान को महत्व देते थे और खुद को नास्तिक मानते थे.
सावरकर का नाम सबसे ज्यादा “हिंदुत्व” की विचारधारा को लेकर चर्चा में रहता है. अपनी किताब ‘Essentials of Hindutva’ में उन्होंने हिंदुत्व को सिर्फ धर्म नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान के रूप में पेश किया.
बाद में हिंदू महासभा के जरिए उन्होंने हिंदू एकता पर जोर दिया. यहीं से उनके राजनीतिक विचार ज्यादा विवादों में आने लगे. समर्थक उन्हें हिंदू समाज को संगठित करने वाला नेता मानते हैं, जबकि आलोचक उन पर विभाजनकारी राजनीति का आरोप लगाते हैं.
1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद सावरकर को भी गिरफ्तार किया गया था. हालांकि अदालत में पर्याप्त सबूत न मिलने के कारण वे बरी हो गए. इसके बावजूद यह विवाद आज तक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.
विक्रम संपत की किताब इस पूरे मामले को दस्तावेजों और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर समझाने की कोशिश करती है, बिना किसी एकतरफा निष्कर्ष के.
1966 में सावरकर का निधन हो गया, लेकिन उनके विचार आज भी राजनीति और समाज में बहस का हिस्सा बने हुए हैं. कोई उन्हें महान देशभक्त कहता है, तो कोई उनकी विचारधारा से असहमति जताता है.
विक्रम संपत की यह जीवनी सावरकर को सिर्फ एक राजनीतिक चेहरे के रूप में नहीं, बल्कि एक जटिल इंसान के रूप में देखने की कोशिश करती है. एक ऐसा व्यक्ति जिसने क्रांति भी की, समाज सुधार की बात भी की और ऐसी विचारधारा भी दी जिस पर आज तक तीखी बहस जारी है.
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-भारत एक्सप्रेस
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