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भीषण गर्मी से बचाएंगे पारम्परिक उपाय! AC-कूलर नहीं, मिट्टी का घड़ा और पेड़ों की छांव ही असली समाधान?

देश में बढ़ती भीषण गर्मी, जल संकट और फसल नुकसान ने किसानों से लेकर शहरों तक चिंता बढ़ा दी है. विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक जल संरक्षण, वृक्षारोपण और प्राकृतिक जीवनशैली ही भविष्य के पर्यावरण संकट का सबसे बड़ा इलाज हैं…

पिछले कुछ समय से, मौसम वैज्ञानिकों के हवाले से, ये खबर आ रही है कि इस साल भीषण गर्मी पड़ने वाली है. इस खबर से सबसे ज़्यादा चिंता कृषि वैज्ञानिकों और किसानों को है. ऐसी भविष्यवाणियाँ की जा रही हैं कि इस साल भी गर्मी विकराल रूप ले लेगी. जिससे सूखे जैसे हालत पैदा हो सकते हैं.

ख़रीब की फसल पर तो इसका बुरा असर पड़ेगा ही पर रवि की उपज पर भी विपरीत प्रभाव पड़ सकता है. अमरीका और ईरान युद्ध के चलते पहले ही ऊर्जा संसाधनों पर महंगाई का असर दिखने लगा है और यदि गर्मी ने भी अपना असर दिखाया तो हालत बेकाबू हो सकते हैं.

वहीं इसको लेकर वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बढ़ती गर्मी के कारण गेहूं का उत्पादन काफ़ी कम रहेगा. इसके साथ ही फल और सब्ज़ियों के उत्पादन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा. नतीजतन खाद्य पदार्थों के दामों में काफ़ी बढ़ौतरी कि संभावना है.

शहरी इलाकों में समस्या और भी बड़ी विकराल

ये तो रही कृषि उत्पादनों की बात, लेकिन अगर शहरी जीवन को देखें तो ये समस्या और भी बड़ा विकराल रूप धारण करने जा रही है. हमारा अनुभव है कि गर्मियों में जब ताल-तलैये सूख जाते हैं और नदियों में भी जल की आवक घट जाती है तो सिंचाई के अलावा सामान्य जन-जीवन में भी पानी का संकट गहरा जाता है. नगर पालिकाएँ आवश्यकता के अनुरूप जल की आपूर्ति नहीं कर पाती. इसलिए निर्बल वर्ग की बस्तियों में अक्सर सार्वजनिक नलों पर संग्राम छिड़ते हुए देखे जाते हैं. नलों में पानी बहुत कम देर के लिए आता है.

मध्यम वर्गीय परिवारों को भी अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप पानी एकत्र करने के लिए काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ती है. राजनेताओं, अधिकारियों और संपन्न लोगों को इन विपरीत परिस्थितियों में भी जल संकट का सामना नहीं करना पड़ता. क्योंकि ये लोग आवश्यकता से कई गुना ज़्यादा जल जमा कर लेते हैं. असली मार तो आम लोगों पर पड़ती है.

शहरों से गावं की दुनिया कैसे अलग?

भीषण गर्मी पड़ने के साथ लोग कूलर या एयर कंडीशनर की तरफ़ भागते हैं. इससे जल और विद्युत दोनों का संकट बड़ जाता है. हाइड्रो पावर प्लांट में जल आपूर्ति की मात्रा घटने से विद्युत उत्पादन गिरने लगता है. जैसे-जैसे समाज पारंपरिक तरीक़ों को छोड़ कर बिजली से चलने वाले उपकरणों की तरफ़ बढ़ रहा है वैसे-वैसे वातावरण और भी गर्म होता जा रहा है. एयर कंडीशनरों से निकलने वाली गर्म हवा भी वातावरण को प्रदूषित करने और गर्मी बढ़ाने का काम कर रही है.

1974-76 के बीच मैं एक स्वयंसेवक के रूप में मुरादाबाद के निकट अमरपुरकाशी गाँव में समाज सेवा की भावना से काफ़ी समय तक रहा. इस दौरान हर मौसम में गाँव के जीवन को जिया. मुझे याद है कि मई जून की तपती गर्मी और लू के बावजूद हम सब स्वयंसेवक दोपहर में खुले दालान पर नीम के पेड़ की छाया में सोया करते थे. तब वो छाया ही काफ़ी ठण्डी लगती थी. गर्म लू जब पसीना सुखाती थी तो शरीर में ठंडक महसूस होती थी.

इसी तरह रात में छत पर पानी छिड़क कर सब सो जाते थे. रात के ग्यारह-बारह बजे तक तो गर्म हवा चलती थी, फिर धरती की तपिश ख़त्म होने के बाद ठण्डी हवा चलने लगती थी. सूर्योदय के समय की बयार तो इतनी स्फूर्तिदायक होती थी कि पूरा शरीर नई ऊर्जा से संचालित होता था. वहाँ न तो फ्रिज का ठण्डा पानी था, न कोई और इंतज़ाम. लेकिन हैंडपम्प का पानी या मिट्टी के घड़े का पानी शीतलता के साथ सौंधापन लिये शरीर के लिए भी गुणकारी होता था.

जबकि आज आरओ के पानी ने हम सबको बीमार बना दिया है. क्योंकि आरओ की मशीन जल के सभी प्राकृतिक गुणों को नष्ट कर देती है. कुएँ से एक डोल पानी खींच कर सिर पर उड़ेलते ही सारे बदन में फुरफुरी आ जाती थी. जिस से दिन भर के श्रमदान की सारी थकावट क्षणों में काफ़ूर हो जाती थी.

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समस्या का क्या हो उपाय?

दूसरी तरफ़ हर पर्यावरणविद् मानता है कि पारंपरिक जलाशयों को सुधार कर उनकी जल संचय क्षमता को बढ़ा कर और सघन वृक्षावली तैयार करके मौसम के मिज़ाज को कुछ हद तक बदला भी जा सकता है. प्रधानमंत्री मोदी का जल शक्ति अभियान और बरसों से चले आ रहे वृक्षारोपण के सरकारी अभियान अगर ईमानदारी से चलाए जाते तो देश के पर्यावरण की हालत आज इतनी दयनीय न होती. सभी जानते हैं कि सरकार द्वारा जहां एक ओर तो वृक्षारोपण व तालाब खोदने को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं जमीनी स्तर पर कथनी और करनी में काफ़ी अंतर है.

मिसाल के तौर पर जालौन क्षेत्र में 400 छोटे बांध बनाए गए थे. इनमें से आधे से ज्यादा तबाह हो चुके हैं. ललितपुर जिले में जल संरक्षण के लिए तीन करोड़ रुपये से चल रहा काम निरर्थक हो चुका है. इसी इलाके में बादहा और रसिन बांध के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन इनका भी नतीजा शून्य ही रहा. इसलिए यदि हम पारंपरिक तरीकों पर ध्यान नहीं देंगे तो ऐसे संकट आते रहेंगे.

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-भारत एक्सप्रेस



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