Bangladesh Politics: चुनाव से ठीक पहले बांग्लादेश की राजनीति में एक ऐसा भूचाल आया है जिसने अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस की नींद उड़ा दी है. करीब 17 साल के लंबे निर्वासन के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के कार्यकारी अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान स्वदेश लौट आए हैं. उनके स्वागत में ढाका की सड़कों पर जो जनसैलाब उमड़ा, उसने साफ संकेत दे दिया है कि देश की सत्ता का समीकरण अब बदलने वाला है.
तारिक रहमान की वतन वापसी किसी फिल्मी सीन से कम नहीं थी. गुरुवार को जब वे ढाका एयरपोर्ट पहुंचे, तो पूरा शहर थम गया. बीएनपी ने दावा किया है कि अपने नेता के स्वागत के लिए करीब 50 लाख कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए.
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश के कोने-कोने से समर्थकों को लाने के लिए 10 विशेष ट्रेनें चलाई गई थीं. एयरपोर्ट से उनके आवास तक निकाले गए रोड शो को बीएनपी ने ‘ऐतिहासिक’ बताया. यह भीड़ सिर्फ स्वागत के लिए नहीं थी, बल्कि यह मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार और कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के लिए एक खुली चुनौती और शक्ति प्रदर्शन था.
तारिक रहमान के तेवरों से साफ है कि मोहम्मद यूनुस के लिए आगे की राह आसान नहीं होगी. तारिक रहमान ने आते ही यूनुस सरकार की दीर्घकालिक विदेश नीतियों पर सवाल उठा दिए हैं. उन्होंने साफ कर दिया है कि अंतरिम सरकार को अपनी हद में रहना चाहिए. तारिक ने अमेरिकी तर्ज पर ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ का नारा दिया है. उनका कहना है कि बीएनपी पाकिस्तान (रावलपिंडी) के दबाव में काम नहीं करेगी.
शेख हसीना के तख्तापलट के बाद भारत के लिए बांग्लादेश में विकल्प सीमित हो गए हैं. ऐसे में ‘डार्क प्रिंस’ की वापसी भारत के लिए एक मिली-जुली खबर है. भारत की सबसे बड़ी चिंता जमात-ए-इस्लामी है, जो पाकिस्तान की ISI की समर्थक मानी जाती है और जिसका प्रभाव यूनुस सरकार में बढ़ रहा है.
भले ही ऐतिहासिक रूप से बीएनपी और भारत के रिश्ते तनावपूर्ण रहे हों लेकिन जमात के मुकाबले बीएनपी को भारत एक ‘उदार और लोकतांत्रिक’ विकल्प मान रहा है. हाल ही में पीएम मोदी ने खालिदा जिया के स्वास्थ्य पर चिंता जताई थी, जिसके जवाब में बीएनपी ने आभार व्यक्त किया. यह रिश्तों में जमी बर्फ पिघलने का संकेत हो सकता है.
तारिक रहमान पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान और पूर्व पीएम खालिदा जिया के बेटे हैं. 2001-06 के बीएनपी शासनकाल के दौरान भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोपों के चलते उन्हें ‘डार्क प्रिंस’ कहा जाने लगा. 2008 में ढाका ट्रिब्यून ने उन्हें इसी नाम से संबोधित किया था. उन्हें 2004 के ग्रेनेड हमले (जिसमें 24 लोग मारे गए थे) में उम्रकैद और भ्रष्टाचार के मामलों में सजा हुई थी. 2008 में वे इलाज के लिए लंदन गए और वहीं बस गए. हालांकि, शेख हसीना के हटते ही बीते एक साल में अदालतों ने उन्हें सभी बड़े मामलों से बरी कर दिया है.
तारिक रहमान के लौटने से यह तय माना जा रहा है कि वे अपनी पारंपरिक सीट बोगुरा-6 और उनकी मां खालिदा जिया बोगुरा-7 से चुनाव लड़ेंगी. सबसे अहम बात यह है कि तारिक ने जमात-ए-इस्लामी से गठबंधन करने से इनकार कर दिया है. यह फैसला कट्टरपंथियों को रास नहीं आ रहा है, जिससे चुनाव से पहले बीएनपी और जमात के बीच खूनी टकराव की आशंका भी जताई जा रही है. तारिक रहमान की वापसी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बांग्लादेश अब चौराहे पर नहीं खड़ा है, बल्कि एक नई राजनीतिक दिशा की ओर बढ़ चला है.
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