बिल गेट्स की पोर्श 959 कार की कहानी
Bill Gates Porsche 959 Car Story: बिल गेट्स का नाम तो आपने सुना होगा. दुनिया के अरबपतियों में से एक है. उसने जुड़ी एक कहानी भी है जो कम ही लोगों को पता है. वो कहानी है उनके कार से जुड़े लगाव की जिसने अमेरिका के नियमों को बदल दिया. हालांकि, इस दौरान उन्हें 13 साल का इंतजार करना पड़ा. इस इंतजार में वक्त के साथ पैसे भी खर्च हुए. वो भी इतने पैसे की वह कार की कीमत के बराबर पहुंच गए. हालांकि, इसका गेट्स को कोई पछतावा नहीं है. साल 2018 में एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने इसके बारे में बताया था. आइये जानें बिल गेट्स ने आखिर क्यों 13 साल तक चुपचाप रोजाना 28 डॉलर चुकाया और कैसे इससे अमेरिका के नियम बदल गए?
साल 1988 में बिल गेट्स ने पोर्श 959 कोम्फोर्ट के लिए ऑर्डर दिया था. यह कार उस समय की सबसे उन्नत कार हुआ करती थी और दुनिया भर में केलस इसकी 337 यूनिट ही थीं. इस ट्विन-टर्बो, ऑल-व्हील-ड्राइव कूप वाली गाड़ी की स्पीड 200 मील प्रति घंटे से अधिक थी. गेट्स ने लगभग 400,000 डॉलर का भुगतान किया था. हालांकि, उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने कभी भी 959 को सुरक्षा या उत्सर्जन के लिए प्रमाणित नहीं किया था. इसी कारण उन्हें समस्या का सामना करना पड़ा.
रिपोर्ट बताती हैं कि जब कार पोर्ट ऑफ सिएटल पहुंची तो इसे पंजीकरण या ड्राइव करने के लिए अवैध घोषित कर दिया गया. हालांकि, अमेरिका के अधिकारियों ने इसके लिए एक समझौते का विकल्प दिया. अधिकारियों ने कहा कि अगर गाड़ी का मालिक हर दिन बॉन्ड के रूप में 28 डॉलर का भुगतान करता है तो इस पोर्श को एक गोदाम में रखेंगे. गेट्स ने सहमति दे दी. क्योंकि उन्हें भरासा दिलाया गया था कि नियामक जल्द ही 1960 के दशक के आयात कोड का आधुनिकीकरण करने वाला है.
अगले 13 वर्षों तक बिल गेट्स की पोर्शे 959 प्लास्टिक में लिपटी रही. इसके लिए माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक चुपचाप चेक पर हस्ताक्षर करते रहे. आखिरकार वह जुर्माना 132,000 डॉलर से अधिक हो गया. सबसे बड़ी बात की इसे लेकर किसी रिपोर्टर को कोई जानकारी नहीं थी और न ही इसे लेकर कोई मीडिया रिलीज आई. एक आदमी उसका सपना और धीमी गति से चलने वाली नौकरशाही चलती रही.
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बिल गेट्स और एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव वोज़नियाक ने कांग्रेस को लॉबिंग करना शुरू किया ताकि वैकल्पिक मार्ग मिल सके. पर्दे के पीछे वर्षों की कोशिशों ने रंग लाई और साल 1999 में नेशनल हाईवे ट्रैफिक सेफ्टी एडमिनिस्ट्रेशन ने ‘शो ऑर डिस्प्ले’ का इजाजत दे दी. इसके तहत मालिकों को ऐतिहासिक या तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण वाहनों को आयात करने की अनुमति मिल गई. शर्त बस इतनी थी कि उसका माइलेज 2,500 मील से कम हो और कारें लगभग मूल स्थिति में रहें.
पोर्श 959 प्रकरण ने अमेरिकी ऑटोमोटिव नीति को बदल दिया. विदेशी प्रोटोटाइप के लिए दरवाजे खोल दिए और स्वायत्त-वाहन आयात के आसपास के बहसों का पूर्वावलोकन किया. इसने यह भी दिखाया कि व्यक्तिगत जुनून नीति परिवर्तन कैसे चला सकता है. एक अरबपति एक इंजीनियरिंग इतिहास का आनंद लेना चाहता था और उन्होंने जिस समाधान की वकालत की वह अब मिसाल बन गया है.
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