ayatollah ali khamenei funeral
Ayatollah ali khamenei funeral: इतिहास कई बार ऐसे मोड़ लेता है, जिनकी कल्पना करना भी मुश्किल होता है. कभी जिन दो देशों के बीच भीषण युद्ध हुआ, जहां लाखों लोगों की जान गई और दशकों तक रिश्तों में कड़वाहट बनी रही, आज उन्हीं देशों के बीच एक ऐसा दृश्य देखने को मिल रहा है जो पूरी दुनिया का ध्यान खींच रहा है. ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर को धार्मिक रस्मों के लिए इराक ले जाने की तैयारी की जा रही है. यह वही इराक है, जिसके साथ ईरान ने 1980 से 1988 तक इतिहास के सबसे खूनी युद्धों में से एक लड़ा था.
ईरान-इराक युद्ध आधुनिक पश्चिम एशिया के सबसे लंबे और सबसे घातक संघर्षों में गिना जाता है. इस युद्ध की शुरुआत 1980 में तब हुई, जब इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला कर दिया. इसके पीछे कई वजहें थीं. सबसे बड़ी वजह 1979 की इस्लामी क्रांति थी, जिसने पूरे क्षेत्र की राजनीति को बदल दिया था.
सद्दाम हुसैन को आशंका थी कि ईरान में आई इस्लामी क्रांति का असर इराक के शिया बहुल इलाकों तक पहुंच सकता है. इसके अलावा दोनों देशों के बीच शत्त-अल-अरब जलमार्ग और सीमा को लेकर पुराने विवाद भी लंबे समय से चले आ रहे थे. इन सभी कारणों ने मिलकर दोनों देशों को एक ऐसे युद्ध में धकेल दिया, जिसकी कीमत दोनों तरफ की जनता ने चुकाई.
करीब आठ साल तक चले इस संघर्ष में दोनों देशों की सेनाएं लगातार आमने-सामने रहीं. इस दौरान बड़े पैमाने पर शहर तबाह हुए, भारी आर्थिक नुकसान हुआ और रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल के भी आरोप लगे. विभिन्न आकलनों के मुताबिक इस युद्ध में लगभग दस लाख लोगों की जान गई या वे गंभीर रूप से प्रभावित हुए. आखिरकार 1988 में युद्धविराम हुआ, लेकिन दोनों देशों के बीच अविश्वास और दुश्मनी की गहरी लकीर लंबे समय तक बनी रही.
चार दशक बाद पश्चिम एशिया की राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है. सद्दाम हुसैन का शासन बहुत पहले समाप्त हो चुका है और आज इराक की राजनीति में ईरान का प्रभाव पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत माना जाता है. खासतौर पर इराक के कई शिया धार्मिक और राजनीतिक समूहों के साथ ईरान के करीबी संबंध हैं. यही वजह है कि आज दोनों देशों के रिश्तों की तस्वीर 1980 के दशक से बिल्कुल अलग दिखाई देती है.
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अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार से जुड़ी धार्मिक रस्मों की शुरुआत ईरान के प्रमुख धार्मिक शहर कोम से होगी. इसके बाद उनके पार्थिव शरीर को इराक के दो सबसे पवित्र शिया शहरों नजफ और कर्बला ले जाया जाएगा. यहां विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें क्षेत्र के कई प्रमुख शिया धार्मिक नेता और ईरान समर्थक समूहों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है.
इसके बाद गुरुवार (9 जुलाई) को अंतिम चरण में पार्थिव शरीर को वापस ईरान लाया जाएगा, जहां मशहद स्थित इमाम रजा के पवित्र मजार के पास उन्हें सुपुर्द-ए-खाक (दफनाया) किया जाएगा. एक समय जिन दो देशों के बीच युद्ध और दुश्मनी की कहानी लिखी गई थी, आज उसी इतिहास के बीच यह घटनाक्रम पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति और धार्मिक रिश्तों की नई तस्वीर पेश करता है.
-भारत एक्सप्रेस
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