America Influence Nepal Instability: नेपाल में व्याप्त भ्रष्टाचार, नेपोकिड्स की लग्जरी लाइफ्टाइल और सोशल मीडिया पर बैन की वजह से Gen-Z युवाओं ने विद्रोह कर दिया. इस विद्रोह की वजह से प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देकर भागना पड़ा. कई नेताओं को लोगों ने घरों से घसीटते हुए बाहर लाये और मारपीट की. फाइनेंस मिनिस्टर को तो लोगों ने सड़कों पर लातों से मारा. अन्य कैबिनेट मंत्रियों के साथ भी जो व्यवहार किया गया वो हैरानजनक था, लेकिन हम देखते हैं कि नेपाल में जो कुछ हुआ वैसा ही कुछ हमें बांग्लादेश और श्रीलंका में भी देखने को मिला.
तो सवाल उठता है कि क्या भारत के बगल में मौजूद सभी देशों को डीस्टेबलाइज किया जा रहा है? और क्या ये भारत को किसी प्रकार का हिंट देने की कोशिश है कि, जो आपके आसपास हो रहा है कल आपके यहां भी हो सकता है. इन चीजों को समझने के लिए हमें इस पूरे मामले के लार्जर पिक्चर को देखने की आवश्यकता है.
नेपाल, भारत और चीन के बीच एक बफर स्टेट के रूप में काम करता है. विशेषज्ञों के अनुसार पहले नेपाल की सत्ता में भारत और चीन का इन्फ्लुएंस था, लेकिन धीरे-धीरे इसमें अमेरिका की एंट्री होती है. अमेरिका लंबे समय से चीन को काउंटर करना चाहता था. इसलिए नेपाल में मौजूदा व्यवस्था परिवर्तन में अमेरिका के हाथ को इनकार नहीं किया जा सकता है.
अब सवाल उठता है कि नेपाल तो बहुत ही छोटा देश है. वहां ना तो तेल मौजूद है और ना ही उसकी इकॉनोमी इतनी ताकतवर है कि उसमें अमेरिका इंट्रेस्ट ले. तो इसका जवाब है क्यों नहीं!
अमेरिका के अंदर चीन को काउंटर करने की सोच साल 2007 से 2008 के बीच आई. जब 2001 में अमेरिका के अंदर 9/11 हुआ, तो अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया. इसके बाद अमेरिका ने 2003 में इराक पर भी हमला कर दिया. साल दर साल दोनों देशों में युद्ध का खर्च बढ़ता चला गया. साल 2007 तक अमेरिका ने युद्ध में ट्रिलियन डॉलर खर्च कर दिये. इतना पैसा खर्च करने के बाद अमेरिका को समझ आया कि वो इन दोनों जगहों पर वो परिस्थिति नहीं बना सका, जो युद्ध शुरू करने से पहले सोचा था. वहीं युद्ध में अचानक से इतने पैसे खर्च होने के चलते अमेरिका के अंदर एक फाइनेंशियल क्राइसिस आया. फाइनेंशियल क्राइसिस के समय अमेरिका इतना टूट चुका था कि वो दुनिया में अपने मित्र देशों को सुरक्षा देने में असमर्थ हो गया. इसी मौके की तलाश चीन को थी. चीन ने उस समय ग्लोबल लीडरशिप की कमान अपने हाथ में ले ली.
दरअसल चीन लंबे समय से अमेरिका को वैश्विक पटल पर पीछे छोड़ने के लिए एक राह देख रहा था. वो राह उसे 2007-2008 के मंदी के दौरान मिली. उसने अमेरिका के कंधे पर बंदूक रखकर ग्लोबल लीडरशिप की तरफ बढ़ चला. इसी दौरान साल 2010-11 के बीच अमेरिका के सहयोगी पश्चिमी देशों में भी एक क्राइसिस आ गया. जिसे हम यूरोजोन क्राइसिस के नाम से जानते हैं. अब अमेरिका पूरी तरह से असहाय हो गया था. चीन ने इसी का फायदा उठाते हुए ग्लोबल लीडरशिप की कमान संभाल ली. वैश्विक तौर पर चीन के इस उभार को उसके वन बेल्ट वन रोड इनिशिएटिव ने काफी मदद की.
इसके बाद अमेरिका को ये समझ आ चुका था कि अगर अमेरिका का कोई सबसे बड़ा दुश्मन है तो वो है चीन. अमेरिका ने चीन को काबू करने के लिए बहुत सारे तौर-तरीके सोचे. अंत में उसे दो चीजें स्पष्ट तौर पर दिखी. पहली चीज थी चीन का इकोनॉमिक ग्रोथ एक डायनेमो है. जिसपर चीन बहुत फोकस करता है. अमेरिका ने समझा कि चीन का ग्रोथ तभी संभव है जब तक उसके आसपास के देशों में शांति होती है. इसलिए अमेरिका ने अपनी विदेश नीति में चीन के आसपास के देशों को महत्व देना शुरू कर दिया. क्योंकि अगर चीन के बगल में मौजूद देशों में अमेरिका के समर्थन वाली सरकार आ जाए. तो चीन हमेशा चिंतित रहेगा कि अमेरिका उसके बगल में मौजूद है.
अमेरिका ने सोचा कि अगर चीन को काबू करना है तो उसके पड़ोसियों को अपने शिकंजे में लेना होगा और यहां पर अमेरिका की विदेश नीति में भारत की एंट्री होती है. अमेरिका ने समझा कि चीन का सबसे बड़ा पड़ोसी भारत है. भारत की चीन से दुश्मनी भी है, तो क्यों ना भारत से दोस्ती बढ़ाई जाए. इसलिए भारत और अमेरिका के बीच साल 2015 से 2020 तक रिलेशनशिप काफी अच्छा दिखता है. अमेरिका इस दौरान भारत को मिलिट्री एग्रीमेंट्स से लेकर हर वैश्विक तौर पर हर जगह चीन के विकल्प के तौर पर पेश किया. अमेरिका चाहता था कि भारत इस इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक क्रेडिबल प्लेयर के तौर पर आ जाए.
हालांकि भारत इस दौरान अमेरिका को बार बार ये चेताता रहा कि वो अमेरिका का पिट्ठू बनना नहीं चाहता. उसकी विदेश नीति स्वतंत्र रहेगी. इस दौरान भारत अमेरिका के साथ भी संबंध रखा, तो रूस के साथ भी उतनी ही सहज रहा. भारत के इस रवैये को देख अमेरिका भारत के पड़ोसी देशों पर डोरे डालना शुरू किया.
अमेरिकी नीति का सबसे पहला शिकार बांग्लादेश होता है. बांग्लादेश की सत्ता पर उस समय शेख हसीना बैठी हुई थीं. अमेरिका ने उनसे डिमांड किया कि वो अपना सेंट मार्टिन आइलैंड हमें दे दे. ताकि वो वहां पर एक मिलिट्री बेस बना सके. जिसे शेख हसीना ने मना कर दिया. इसका खामियाजा ये हुआ कि शेख हसीना के खिलाफ बांग्लादेश में भयंकर विद्रोह हुआ और उनकी सरकार चली गई. इस दौरान शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़कर भारत आना पड़ा.
जब बांग्लादेश में हसीना की सरकार चेंज हुई. तो अमेरिका को एक टूलकिट मिल गया कि हमारे पास सोशल मीडिया, सोशल मीडिया से यूथ को जोड़ना और यूथ प्लस सोशल मीडिया का प्रयोग करके सबसे बड़ी सरकार को चेंज करना अब कोई मुश्किल काम नहीं. अमेरिका ने एक कॉकटेल फार्मूला निकाल लिया था.
अब सबसे बड़ी बात ये है कि नेपाल इस मामले में कैसे फंसा? आप नेपाल की अगर राजनीतिक परिस्थिति देखेंगे तो दो बातें आपको समझ में आएगी. पहली जो नेपाल में जो सरकार आई वो राजशाही के खिलाफ विद्रोह से आई थी. इस वजह से वहां राजशाही समर्थकों की भी भारी संख्या है तो लोकतंत्र समर्थकों की भी.
दूसरी कि नेपाल की राजनीति में दो धड़े हैं और वो दो धड़े पक्ष और विपक्ष दोनों पार्टियों में बराबर हिस्सेदारी रखते हैं. पहला धड़ा भारत को सपोर्ट करता है और चीन से नाराज रहता है. तो दूसरा धड़ा चीन को समर्थन देता है और भारत से नफरत करते हैं.
इसके बाद अमेरिका ने दोनों पार्टियों में से चुनिंदा लोगों को अपना समर्थन देना शुरू किया. जिसके बाद नेपाल की सियासत में तीन धड़े बन गए. एक धड़ा भारत का, दूसरा चीन और तीसरा अमेरिका का.
राजनीतिक विश्लेषक और अमेरिका, भारत, चीन और मध्य पूर्व की राजनीति पर नजर रखने वाले पवनीत सिंह कहते हैं कि, ये तीनों धड़े सभी पार्टियों में मौजूद हैं. इसकी वजह से कोई भी सरकार सही तरीके से चल नहीं पाई. नेपाल में कोई भी नेता 5 साल का अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सका.
USA ने इस दौरान नेपाल में अपने समर्थक नेताओं पर खूब पैसे लूटाए. उनके बच्चों को विदेशों में सेटल किया और यहां पर उनको पैसों से लेकर सोशल मीडिया के जरिये प्रचार में भी मदद की. ताकि चीन के प्रभाव को कम किया जा सके.
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इस दौरान अमेरिका ने एक अलग तरह की राजनीति खेली. पवनीत सिंह कहते हैं कि अमेरिका ने राजनेताओं को तो अपने साथ रखा ही साथ ही वो किसी युवा को ऐसे तौर पर पेश करने की कोशिश की जिसके प्रति लोगों में आस्था आए और लोगों में लोकतंत्र पर भरोसा बरकरार रहे. क्योंकि अमेरिका कभी नहीं चाहता है कि नेपाल में राजशाही आए. इसका खामियाजा अमेरिका म्यांमार में भुगत चुका था.
पवनीत सिंह अपने आलेख में आगे कहते हैं कि, इस वजह से काठमांडू के मेयर बालेन शाह को अमेरिका आगे बढ़ाना शुरू किया. और जब नेपाल की तत्कालीन सरकार गिरी तो युवाओं के बीच बालेन शाह सबसे ज्यादा चर्चा में आए. युवा उनको प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं.
अब नेपाल की राजनीति दोराहे पर खड़ी है. वहां से वो या तो लोकतंत्र के सहारे आगे बढ़ेगा या राजशाही के सहारे. लेकिन एक बात जो सबसे कॉमन है कि इस सरकार को गिराने में किसी ने सबसे बड़ा रोल प्ले किया तो वो है अमेरिका.
– भारत एक्सप्रेस
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