बेंजामिन एंडरसन अपनी किताब Imagined Communities (1983) में राष्ट्र को लेकर एक गहरी बात कहते हैं. उनके अनुसार कोई राष्ट्र लोगों की साझा सोच और विश्वास से बनता है. वे कहते हैं कि किसी भी राष्ट्र को जोड़कर रखने के लिए एक प्रतीक की जरूरत होती है. जो लोगों के भीतर राष्ट्रीय भावना को जिंदा रखता है.
बेंजामिन एंडरसन की ये बात ईरान पर एकदम सटीक बैठ रही है. अब ईरान अपने पूर्व सम्राट के बेटे को अपने प्रतीक के रूप में देख रहा है. अयातुल्ला खामेनेई की सत्ता को लगातार चुनौती मिल रही है. यह पहली बार नहीं है कि ईरान में इतने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं, लेकिन इस बार प्रदर्शन का पैटर्न बदल गया है. यह प्रदर्शन सिर्फ सत्ता परिवर्तन या समाज सुधार तक सीमित नहीं है, यह पहचान का प्रदर्शन बन गया है. जिसमें रेजा पहेलवी एक पहचान बनकर ऊभरे हैं. कयास लगाये जा रहे हैं कि अगर ईरान में तख्तापलट हुआ तो रेजा पहेलवी सत्ता पर बैठ सकते हैं. आखिर ये रेजा पहेलवी कौन हैं, उनकी कहानी क्या है और विदेशी मीडिया उन्हें क्यों प्रिंस ऑफ पर्सिया कह रही है? आइये बताते हैं.
साल 1960 में रेजा पहेलवी का जन्म ईरान की राजधानी तेहरान में हुआ. वे ईरान के शाही परिवार में पैदा हुए थे और सीधे तौर पर राजशाही के उत्तराधिकारी थे. बचपन से ही उन्हें भविष्य के राजा के रूप में तैयार किया जा रहा था. निजी शिक्षक उन्हें शासन, राजनीति और शाही परंपराओं की शिक्षा देते थे. माना जा रहा था कि एक दिन वे तेहरान के मयूर सिंहासन पर बैठेंगे और पहेलवी वंश की सत्ता आगे बढ़ाएंगे. लेकिन साल 1979 में ईरान में बड़ा बदलाव आया. इस्लामी क्रांति के बाद राजशाही खत्म हो गई और रेजा पहेलवी के राजा बनने की पूरी कहानी वहीं खत्म हो गई.
ईरान में जिस समय क्रांति भड़की उस समय पहेलवी पायलट का प्रशिक्षण लेने अमेरिका में थे. क्रांति के कुछ ही हफ्ते के अंदर राजशाही खत्म हो गई. दरबार भंग कर दिये गए और दशकों से चली आ रही ईरान की शासन व्यवस्था का नाटकीय रूप से अंत हो गया. राजशाही के खिलाफ लोगों का आक्रोश इतना अधिक था कि पहेलवी अमेरिका में ही निर्वासित जीवन जीने के लिए मजबूर हो गए. इस तरह से वह युवराज जो ईरान का भविष्य कहा जाता था, वह कभी वापस नहीं लौट सका.
जो रेजा पहेलवी कभी ईरान की सत्ता, नागरिकता, संपत्ति और वैधता जैसी बुनियादी संस्थाओं का भविष्य निर्माता बनने वाले थे, वह भूमिका एक ही झटके में समाप्त हो गई. 1979 की इस्लामी क्रांति ने न केवल राजशाही व्यवस्था को खत्म कर दिया, बल्कि पहेलवी परिवार की पूरी सत्ता भी छिन गई.
रेजा पहेलवी के पिता, शाह मोहम्मद रजा पहेलवी, अपनी जान बचाने के लिए ईरान छोड़ने पर मजबूर हुए. इसके बाद वे अलग-अलग देशों में शरण लेते रहे, लेकिन कहीं स्थायी ठिकाना नहीं मिला. आखिरकार वे मिस्र पहुंचे, जहां निर्वासन की अवस्था में ही उनका निधन हो गया.
वहीं रेजा पहेलवी अमेरिका में ही बसे रहे. वहीं पर उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और परिवार बसाया.
ईरान की इस्लामिक क्रांति ने लोगों को न्याय और सम्मान देने का वादा किया था, लेकिन धार्मिक संस्थाओं ने सत्ता पर नियंत्रण कर लिया. समय के साथ असहमती विद्रोह मानी जाने लगी. चुनाव वैचारिक सीमाओं के भीतर होने लगे. महिलाओं की स्वतंत्रता पर अंकुश लग गया. विदेश नीति फायदे की जगह पहचान पर टिक गई.
इसका सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर हुआ. लोगों का जहां व्यापार खत्म हो गया. वहीं खाने-पीने की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी देखने को मिली. जो ईरान कभी तेल व्यापार से दुनिया के अमीर देशों में शुमार होता था, उस देश के लोगों की कमाई पर अचानक ब्रेक लग गया.
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कई दशकों से अयातुल्ला खामेनेई सिर्फ नेता नहीं थे, वे धार्मिक, नैतिक और क्रांतिकारी प्रतीक बन चुके थे. शुरुआत में तो उन्होंने ईरान के बिखरे समाज को एकजुट किया, लोगों को न्याय देने का वादा किया, लेकिन आज स्थिति बदल गई है. लोगों का खामेनेई पर किया गया भरोसा कमजोर पड़ चुका है. लोगों में उनका डर तो है लेकिन अब वफादारी पर सवाल है.
इतिहास गवाह है कि जब लोगों का भरोसा टूटता है तो वो अतीत की तरफ झांकते हैं. भारत में भी यह हो चुका है. जब इंदिरा गांधी देश में इमरजेंसी लगाने के चलते सत्ता से बाहर हो गई थीं और देश में जनता पार्टी के रूप में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी. लेकिन मात्र तीन सालों में हीं जनता पार्टी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई. जनता ने एक बार फिर इतिहास में झांका और इंदिरा गांधी को अपना जनमत दिया. यहीं ईरान में हो रहा है. अशांति के इस दौर में ईरान के लोगों के अंदर फिर से राजशाही से उम्मीदें जगी हैं.
पहेलवी से जब मीडिया ने ईरान में होने वाले प्रदर्शनों के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि अगर देश से इस्लामी राज्य खत्म होता है तो वो एक अंतरिम मार्गदर्शन देने के लिए तैयार हैं. उन्होंने कहा कि यह अतीत को बहाल करने जैसा नहीं है, बल्कि यह सभी ईरानियों के भविष्य को लोकतंत्र की छत के नीचे सुरक्षित करने जैसा है.
रेजा पहेलवी का नाम भले ही राजशाही का प्रतीक है, लेकिन वो अब ईरान के पुराने और वास्तविक इतिहास से प्रेरणा ले रहे हैं. वो इरान को धर्म से नहीं बल्कि फारस की संस्कृति से जोड़ रहे हैं. बता दें कि, फारस की संस्कृति इस्लामी इतिहास से भी हजारों साल पुराना है.
शायद रेजा पहेलवी कभी ईरान न लौटें और शायद कभी शासन ना कर पाएं, लेकिन वो ईरानियों के लिए इस समय एक प्रतीक बन चुके हैं. फारस ने साम्राज्य बनाए, आक्रमणों का सामना किया, क्रांतियों को देखा और पुनर्निर्माण किया. क्या इस बार प्रिंस ऑफ पर्शिया ईरान को नई दिशा दिखा पाएंगे? यह समय ही बताएगा.
-भारत एक्सप्रेस
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