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ट्रेड डील, H-1B वीजा और कच्चा तेल…, अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के नतीजों से भारत को कितनी राहत और कितनी टेंशन? पढ़ें-EXPLAINER

US Midterm Elections 2026: सत्ता में रहना एक बात है और सत्ता में रहते हुए अपनी मर्जी चला पाना दूसरी बात. डोनाल्ड ट्रंप को अब इन दोनों के बीच का फर्क समझ आने वाला है. मिडटर्म चुनाव में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका लगा है. डेमोक्रेट्स ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों, यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट में बहुमत हासिल कर लिया है. कई राज्यों में भी डेमोक्रेट्स ने अपनी स्थिति मजबूत की है. अब तक के आंकड़ों के मुताबिक, डेमोक्रेट्स ने 240 सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि रिपब्लिकन पार्टी 147 सीटों पर ही सिमट गई है. इसका सीधा मतलब है कि ट्रंप राष्ट्रपति तो बने रहेंगे, लेकिन संसद में अब उनके सामने विरोधी पार्टी का बहुमत होगा. उनके फैसलों पर सवाल उठेंगे, प्रशासन की जांच होगी और कई बड़े प्रस्तावों को संसद से मंजूरी दिलाना मुश्किल हो सकता है.

इस चुनाव का असर सिर्फ अमेरिका की राजनीति तक सीमित नहीं है. भारत के लिए भी इसके कई मायने हैं. ट्रेड डील, भारतीय पेशेवरों के H-1B वीजा और कच्चे तेल की कीमतों पर इसका असर पड़ सकता है. तो सवाल है कि ट्रंप के बचे हुए दो साल कैसे बीतेंगे? क्या ईरान के साथ चल रहा युद्ध रुक सकता है? और क्या अमेरिका की बदली हुई संसद से भारत को कोई राहत मिलेगी?

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रंप को मिले झटके के कई पहलू हैं. इस चुनाव का ट्रंप पर क्या प्रभाव पड़ेगा, दुनिया और भारत में इसका क्या असर पड़ेगा. इन सब बातों को जानने से पहले अमेरिका का चुनावी गणित समझना जरूरी है.

मिडटर्म चुनाव क्यों होता है?

अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव हर चार साल में होता है. लेकिन राष्ट्रपति चुनाव के ठीक दो साल बाद मिडटर्म चुनाव कराए जाते हैं. इस चुनाव में अमेरिकी संसद के निचले सदन, यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी 435 सीटों पर और सीनेट की करीब एक-तिहाई सीटों पर मतदान होता है. इस बार डोनाल्ड ट्रंप खुद उम्मीदवार नहीं थे. लेकिन यह चुनाव उनके दो साल के कामकाज का लिटमस टेस्ट माना जा सकता है. यानी जनता ने सीधे तौर पर ट्रंप को नहीं चुना, लेकिन उनकी नीतियों और फैसलों पर अपनी राय जरूर जाहिर की और अब तक के नतीजे बताते हैं कि इस चुनाव में डेमोक्रेट्स को बड़ी बढ़त मिली है.

NBC की रिपोर्ट के मुताबिक, डेमोक्रेट्स ने सीनेट की सात ऐसी सीटें जीत लीं, जहां पहले रिपब्लिकन पार्टी के सांसद थे. इनमें आयोवा, कंसास, ओहायो, मेन, नॉर्थ कैरोलिना, साउथ कैरोलिना और टेक्सास शामिल हैं. इनमें कंसास की जीत खास है. क्योंकि वहां करीब 100 सालों से कोई डेमोक्रेट सीनेटर नहीं चुना गया था. अब डेमोक्रेट्स के पास सीनेट में कम से कम 54 सीटें होंगी.

वहीं हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भी डेमोक्रेट्स 218 सीटों का बहुमत का आंकड़ा पार कर चुके हैं. ऐसे में अब स्पीकर कौन होगा यह भी फैसला डेमोक्रेट्स के पास चला गया है.

CNBC के मुताबिक, डेमोक्रेट्स ने हाउस की कम से कम 24 सीटें, पांच गवर्नर पद और कई राज्यों की विधानसभाओं में भी जीत हासिल की है. जबकि रिपब्लिकन पार्टी एक भी सीट पलटने में कामयाब नहीं रही. इस चुनाव में हार का दंश डोनाल्ड ट्रंप को इसलिए भी ज्यादा चुभेगी क्योंकि यह 20 सालों में पहली बार है जब किसी रिपब्लिकन राष्ट्रपति की पार्टी ने संसद के दोनों सदनों में अपना बहुमत गंवाया है और यहीं से अगला सवाल पैदा होता है आखिर अमेरिकी जनता ने ट्रंप की पार्टी के खिलाफ वोट क्यों किया?

ट्रंप के खिलाफ वोट क्यों?

इस चुनाव के नतीजों को समझने के लिए उन मुद्दों पर नजर डालनी होगी, जिनका सीधा असर अमेरिकी नागरिकों की जिंदगी पर पड़ा. विश्लेषकों ने डेमोक्रेट्स की जीत के पीछे मुख्य रूप से तीन वजहें बताई हैं.

पहली, ईरान के साथ युद्ध, दूसरी, पेट्रोल की बढ़ती कीमतें और तीसरी, अर्थव्यवस्था को लेकर आम लोगों की चिंता. दरअसल, ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अमेरिका को नई जंगों से दूर रखने की बात कही थी. लेकिन उनकी सरकार के दौरान ईरान के साथ युद्ध शुरू हुआ और यह आठ महीने से ज्यादा समय तक खिंच गया.

इस युद्ध का असर सिर्फ सैन्य मोर्चे पर नहीं पड़ा. तेल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई और इसका असर आम अमेरिकी नागरिकों की जेब पर भी दिखाई दी. पेट्रोल महंगा होता है, तो सिर्फ गाड़ी चलाने का खर्च नहीं बढ़ता. सामान ढोने से लेकर रोजमर्रा की कई चीजों की लागत पर भी इसका असर पड़ता है. यानी युद्ध और महंगाई का मुद्दा सीधे मतदाताओं की जिंदगी से जुड़ गया. इसकी पुष्टि चुनाव के बाद रिपब्लिकन नेताओं के बयानों से भी होती है.

उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने खुद ईरान युद्ध को चुनावी हार की वजहों में गिनाया. ट्रंप ने भी माना कि गैसोलीन की बढ़ती कीमतों का असर चुनाव पर पड़ा. लेकिन इसके साथ उन्होंने यह भी कहा कि ईरान के खिलाफ कार्रवाई जरूरी थी और उनकी सरकार इस नीति को जारी रखेगी. अब सवाल है कि संसद में बहुमत गंवाने के बाद ट्रंप के लिए आगे का रास्ता कितना मुश्किल होगा?

अमेरिका में राष्ट्रपति के पास काफी शक्तियां होती हैं. वे प्रशासन चलाते हैं, कार्यकारी आदेश जारी कर सकते हैं और विदेश नीति से जुड़े कई अहम फैसले लेते हैं. लेकिन राष्ट्रपति के पास सारी ताकत नहीं होती. कानून बनाने, बजट मंजूर करने और सरकार के कामकाज की निगरानी करने में अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस की भी बड़ी भूमिका है.अब इसी संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स का बहुमत होगा. इसका मतलब है कि ट्रंप प्रशासन को आने वाले दो साल में कई मुद्दों पर विपक्ष के सवालों और विरोध का सामना करना पड़ सकता है. इसे चार बड़े मोर्चों से समझिए.

पहला मोर्चा: ट्रंप प्रशासन की जांच और जवाबदेही

अब तक ट्रंप प्रशासन को संसद में अपनी ही पार्टी का समर्थन हासिल था. लेकिन अब डेमोक्रेट्स संसदीय समितियों के जरिए सरकार के फैसलों की जांच कर सकते हैं. वे ईरान युद्ध, समुद्र में नावों पर हुए हमलों और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के फैसलों पर सवाल उठा सकते हैं. अमेरिकी संसद की समितियों के पास अधिकारियों को समन भेजने, दस्तावेज मांगने और सुनवाई करने जैसी शक्तियां होती हैं. यानी अब ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों को संसद के सामने जवाब देना पड़ सकता है.

इतना ही नहीं, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के खिलाफ महाभियोग की चर्चा भी सामने आई है.हालांकि, ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि हेगसेथ अपने पद पर बने रहेंगे.

दूसरा मोर्चा: टैरिफ पर टकराव

ट्रंप की आर्थिक नीति का एक बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से आने वाले सामान पर टैरिफ लगाने का रहा है.लेकिन अब डेमोक्रेट्स इस नीति को चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं. वे टैरिफ के फैसलों में संसद की भूमिका बढ़ाने और ट्रंप के कुछ फैसलों को पलटने के लिए बिल ला सकते हैं. लेकिन यहां एक संवैधानिक पेच है. अगर संसद कोई बिल पास करती है और ट्रंप उस पर वीटो लगा देते हैं, तो उस वीटो को पलटने के लिए हाउस और सीनेट, दोनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए. फिलहाल डेमोक्रेट्स के पास इतना बहुमत नहीं है. यानी डेमोक्रेट्स ट्रंप की टैरिफ नीति को चुनौती तो दे सकते हैं, लेकिन उसे आसानी से खत्म कर पाना उनके लिए संभव नहीं होगा.

तीसरा मोर्चा: ईरान युद्ध की फंडिंग

किसी भी युद्ध को लंबे समय तक चलाने के लिए हथियार, सैनिक और भारी बजट की जरूरत होती है. और इस बजट में अमेरिकी संसद की भूमिका अहम होती है. डेमोक्रेट्स पहले ही कह चुके हैं कि वे ईरान युद्ध के लिए अतिरिक्त फंडिंग को मंजूरी देने के पक्ष में नहीं हैं.

इसके अलावा ट्रंप की इमिग्रेशन नीति को और सख्त करने के लिए अतिरिक्त पैसा देने का भी विरोध किया जा सकता है. डेमोक्रेट्स युद्ध खत्म करने या सैन्य कार्रवाई के लिए संसद की मंजूरी को लेकर नए प्रस्ताव ला सकते हैं. इस मुद्दे पर दोबारा वोटिंग की मांग भी हो सकती है.

इसका मतलब यह नहीं है कि संसद के पास युद्ध रोकने का कोई सीधा बटन है. लेकिन बजट और फंडिंग पर उसका नियंत्रण ट्रंप प्रशासन के लिए मुश्किलें जरूर बढ़ा सकता है.

चौथा मोर्चा: महंगाई और स्वास्थ्य सेवाएं

डेमोक्रेट्स ने चुनाव के दौरान आम लोगों की जेब से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दी थी. अब वे पेट्रोल, राशन और इलाज की लागत कम करने के लिए अपना 100 दिन का एजेंडा आगे बढ़ा सकते हैं. इसके अलावा ओबामा केयर की बढ़ी हुई सब्सिडी बहाल करने और मेडिकेड में की गई कटौतियों को पलटने की कोशिश भी हो सकती है.

हालांकि, इन प्रस्तावों को लागू करने के लिए कानून और बजट से जुड़ी प्रक्रिया पूरी करनी होगी..यानी यहां भी ट्रंप प्रशासन और डेमोक्रेट्स के बीच टकराव की संभावना है. कुल मिलाकर, ट्रंप की राष्ट्रपति पद की कुर्सी सुरक्षित है, लेकिन अब उनके फैसलों पर संसद की निगरानी और विरोध दोनों बढ़ेंगे.

नई संसद जनवरी में कामकाज शुरू करेगी. इसके बाद व्हाइट हाउस और अमेरिकी कांग्रेस के बीच कई मुद्दों पर टकराव देखने को मिल सकता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ट्रंप की सारी ताकत खत्म हो गई है. उनके पास अब भी कार्यकारी आदेश जारी करने और संसद के बिलों पर वीटो लगाने का अधिकार है. तो आगे का दौर सत्ता के दो केंद्रों के बीच खींचतान का हो सकता है.

अमेरिका में डेमोक्रेट्स की जीत का भारत पर क्या असर होगा? यह सवाल हर कोई पूछ रहा है. चलिये हम बताते हैं कि मिडटर्म इलेक्शन में ट्रंप के हारने का असर भारत पर क्या पड़ेगा. इसे हम तीन बड़े मुद्दों से समझेंगे.

पहला मुद्दा: भारत- अमेरिका ट्रेड डील और टैरिफ

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर पिछले कुछ समय से बातचीत चल रही है. अक्टूबर की शुरुआत में अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव ने भी कहा था कि समझौते में आने वाली अड़चनों की पहचान कर ली गई है, लेकिन डील जल्द होने के संकेत नहीं हैं.

अब सवाल है कि क्या अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट्स के बहुमत से भारत को टैरिफ में राहत मिल सकती है? इसका जवाब तो समय के गर्भ में है, क्योंकि टैरिफ से जुड़े कई अहम फैसले लेने का अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति के पास है.

हाउस में डेमोक्रेट्स के नेता हकीम जेफ्रीज का भी आकलन है कि टैरिफ के मामले में राष्ट्रपति के पास काफी अधिकार हैं. ऐसे में संसद से टैरिफ में बड़ी कटौती कराने वाला कानून पास होना आसान नहीं होगा. यानी डेमोक्रेट्स ट्रंप की व्यापार नीति पर सवाल उठा सकते हैं, लेकिन भारत के लिए टैरिफ अपने आप कम नहीं हो जाएंगे.

भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील की बातचीत अब भी काफी हद तक ट्रंप प्रशासन के रुख पर निर्भर करेगी.

दूसरा मुद्दा: H-1B वीजा

यह मुद्दा भारत के उन लाखों युवाओं और पेशेवरों के लिए अहम है, जो अमेरिका में नौकरी करना चाहते हैं या वहां काम कर रहे हैं. H-1B वीजा के तहत अमेरिकी कंपनियां विदेशी पेशेवरों को नौकरी पर रख सकती हैं. इस वीजा के सालाना मंजूर आवेदनों में भारतीयों की हिस्सेदारी अक्सर 70 प्रतिशत से ज्यादा रहती है. लेकिन ट्रंप प्रशासन ने H-1B व्यवस्था को सख्त करने के लिए कई कदम उठाए हैं. पिछले साल नए H-1B आवेदनों पर एक लाख डॉलर की एकमुश्त फीस लगाने का फैसला भी किया गया था. भारत ने इस फैसले को लेकर काफी तीखी प्रतिक्रिया दी थी. लेकिन अब डेमोक्रेट्स के पास हाउस में बहुमत है. ऐसे में वे H-1B से जुड़ी पाबंदियों के असर की जांच कर सकते हैं. वे यह सवाल उठा सकते हैं कि इन फैसलों से अमेरिकी कंपनियों, टेक्नोलॉजी सेक्टर और विदेशी पेशेवरों पर क्या असर पड़ रहा है.

लेकिन यहां भी एक बात समझना जरूरी है. संसद में डेमोक्रेट्स का बहुमत आने का मतलब यह नहीं है कि H-1B वीजा के नियम तुरंत बदल जाएंगे. वे ट्रंप प्रशासन पर दबाव बना सकते हैं, लेकिन वीजा नीति में राहत की गारंटी नहीं दे सकते. इसलिए भारतीय युवाओं के लिए फिलहाल राहत की उम्मीद तो नहीं दिख रही.

तीसरा मुद्दा: कच्चा तेल, रुपया और शेयर बाजार

इस मोर्चे पर अमेरिकी चुनाव के नतीजों का असर तुरंत देखने को मिला. चुनाव के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 8.5 प्रतिशत गिरकर 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई. इसके पीछे बाजार की एक बड़ी उम्मीद यह थी कि चुनावी हार के बाद ट्रंप ईरान युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता तलाश सकते हैं.

भारत के लिए यह खबर इसलिए अहम है, क्योंकि देश अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से आयात करता है. जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होता है, तो भारत का आयात बिल कम हो सकता है. इससे रुपये पर दबाव घटने, महंगाई को नियंत्रित करने और चालू खाते के घाटे को कम करने में मदद मिल सकती है. यानी तेल की कीमतों में गिरावट भारत की अर्थव्यवस्था के लिए राहत का एक रास्ता खोल सकती है. इससे रुपया भी मजबूत हो सकता है. लेकिन यहां एक पेंच है.

ट्रंप अभी भी कर सकते हैं ईरान पर हमला

कच्चे तेल की कीमतें सिर्फ अमेरिकी चुनाव के नतीजों से तय नहीं होतीं. पश्चिम एशिया में तनाव, तेल की सप्लाई और सैन्य गतिविधियों का भी इन पर सीधा असर पड़ता है. एक ब्रोकरेज रिपोर्ट ने भी चेतावनी दी थी कि अगर अमेरिका की तरफ से ईरान पर नए हमले होते हैं, तो तेल की कीमतें फिर बढ़ सकती हैं. और ट्रंप ने फिलहाल युद्ध जारी रखने की बात कही है. इसलिए तेल की कीमतों में आई गिरावट भारत के लिए राहत की खबर जरूर है, लेकिन इसे स्थायी राहत मानना जल्दबाजी होगी.

अब पूरी कहानी को एक साथ जोड़कर देखिए. अमेरिका में सत्ता का संतुलन बदल गया है. एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप हैं, जिनके पास राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियां और वीटो का अधिकार है. दूसरी तरफ डेमोक्रेट्स हैं, जिनके पास अब संसद के दोनों सदनों का बहुमत, जांच करने की शक्ति और बजट पर प्रभाव रखने का अधिकार होगा.

आने वाले दो साल अहम

इसका मतलब है कि आने वाले दो साल में अमेरिका की राजनीति में टकराव और गतिरोध बढ़ सकता है. ट्रंप जहां अपनी नीतियों को आगे बढ़ाना चाहेंगे, जबकि डेमोक्रेट्स उनके कई फैसलों को चुनौती दे सकते हैं.

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भारत के लिए भी तस्वीर मिली-जुली है. ट्रेड डील पर तत्काल राहत की उम्मीद सीमित है. H-1B वीजा के मामले में भी तुरंत बड़े बदलाव की गारंटी नहीं है. लेकिन हां एक बात जरूर है कि डेमोक्रेट्स अब अमेरिकी प्रशासन के फैसलों की जांच और उन पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकते हैं. इन तीनों मोर्चों पर आने वाले महीनों में अमेरिका के फैसलों का असर दिखाई दे सकता है.

-भारत एक्सप्रेस

Govind Kumar Singh

गोविंद सिंह बिहार के कैमूर जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज से हासिल की और पटना कॉलेज, पटना से मास कम्युनिकेशन में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा और ईटीवी भारत, इनशॉर्ट्स और श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन जैसे संस्थानों में काम करते हुए समाचार लेखन, कंटेंट एडिटिंग, रिसर्च और न्यूज प्रोडक्शन का अनुभव हासिल किया। फिलहाल वह भारत एक्सप्रेस में सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। उनकी पत्रकारिता का प्रमुख फोकस विदेश नीति, राष्ट्रीय राजनीति और बिहार से जुड़े मुद्दों पर है।

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