World’s Smallest Snake: दुनिया का सबसे छोटा और बेहद दुर्लभ सांप बारबाडोस थ्रेडस्नेक (Barbados threadsnake) जो करीब दो दशकों के बाद फिर से वैज्ञानिकों को मिला है. यह सांप जब पूरी तरह से बड़ा होता है, तब भी इसकी लंबाई सिर्फ 10 सेंटीमीटर होती है और यह इतना पतला होता है कि किसी स्पेगेटी या धागे जैसा लगता है.
इस प्रजाति को इतने सालों से किसी ने नहीं देखा था, जिस कारण वैज्ञानिकों ने इसे विलुप्त मान लिया था. लेकिन हाल ही में हुए एक पर्यावरणीय सर्वेक्षण में यह फिर से सामने आया है.
बारबाडोस के केंद्रीय इलाके में, पर्यावरण मंत्रालय और अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संगठन री:वाइल्ड (Re:wild) की टीम जब एक सर्वेक्षण कर रही थी, तब उन्हें एक चट्टान के नीचे यह नन्हा सा सांप दिखाई दिया.
री-वाइल्ड के कैरिबियन प्रोग्राम ऑफिसर जस्टिन स्प्रिंगर ने बताया कि जब वे अपने साथी के साथ पेड़ों की जड़ों में फंसी एक चट्टान को पलट रहे थे, तब उन्होंने मजाक में कहा था कि ‘मुझे थ्रेडस्नेक की खुशबू आ रही है’ और चौंकाने वाली बात यह थी कि वही सांप उन्हें उस चट्टान के नीचे वाकई में मिल गया.
इस सांप को पहली बार 1889 में देखा गया था. यह सांप कभी 4,800 ऐसी प्रजातियों में शामिल था, जिन्हें विज्ञान की दुनिया में गायब माना गया था. साल 2000 के दशक की शुरुआत से यह बिल्कुल गायब हो गया था इसकी लंबाई सिर्फ 10 सेमी (World’s Smallest Snake) होती है. दिखने में यह एक पतले धागे जैसा लगता है.
यह यौन प्रजनन करता है और मादा एक बार में सिर्फ एक अंडा देती है जो सरीसृपों में एक बहुत ही दुर्लभ बात है. इसके शरीर पर नारंगी रंग की धारियां और नाक पर तराजू जैसे निशान पाए गए हैं. बारबाडोस पर उपनिवेशीकरण के बाद से वहां की 98% मूल वनस्पति खत्म कर दी गई, जो कि थ्रेडस्नेक का मुख्य आवास थी. इसके जंगल खेती, विकास और बाहरी प्रजातियों की वजह से तेजी से नष्ट होते गए.
पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारी कॉनर ब्लेड्स ने कहा कि थ्रेडस्नेक की आबादी शायद बहुत छोटी है. अब जरूरत है कि और नमूने खोजे जाएं, ताकि इसके अस्तित्व को बचाया जा सके. जस्टिन स्प्रिंगर ने बताया, “जब आप किसी चीज़ की सालों से तलाश कर रहे हों और वो अचानक मिल जाए, तो वो किसी चमत्कार से कम नहीं होता.”
यह खोज सिर्फ इस सांप की नहीं, बल्कि बारबाडोस के पारिस्थितिकी तंत्र की भी बड़ी उपलब्धि है. विशेषज्ञों का मानना है कि थ्रेडस्नेक की वापसी एक चेतावनी और उम्मीद दोनों है. अगर समय रहते इनके आवासों की रक्षा की जाए, तो लुप्तप्राय प्रजातियों को बचाया जा सकता है. अब वैज्ञानिक इसे अधिकारिक रूप से दर्ज कर चुके हैं और उम्मीद है कि आने वाले समय में और भी थ्रेडस्नेक देखे जा सकेंगे बशर्ते वन्यजीवन का संरक्षण किया जाए.
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-भारत एक्सप्रेस
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