विश्लेषण

तो…2024 के लिए रचना होगा ‘चक्रव्यूह’

एक मुल्ला जी मस्जिद के बाहर बैठे थे। उनसे एक शरारती लड़के ने पूछा, “मुल्ला जी आपके पड़ोस में शादी है और आप यहाँ बैठे हैं।” मुल्ला जी ने जवाब दिया, “तो मुझे क्या?” लड़के ने फिर छेड़ा, “सुना है वो आपके यहाँ मिठाई भेजने वाले हैं।” मुल्ला जी पलट कर बोले, “तो तुझे क्या?” अब किसी देश का प्रधानमंत्री पैर छुए या बॉस कह कर संबोधित करे। स्वागत में पलक पाँवड़े बिछाए या गर्मजोशी से झप्पी डाले तो इस पर भारत के मतदाताओं का जवाब होगा, “तो मुझे क्या?”

कर्नाटक चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा के ख़ेमे में बहुत घबराहट है। प्रधान मंत्री मोदी की अन्तराष्ट्रीय छवि को मार्केट करके इस घबराहट से ध्यान हटाने की कोशिश कि जा रही है। ऑस्ट्रेलिया में होने वाली क्वाड नेताओं की बैठक अमरीका के राष्ट्रपति जो बाईडेन के न आ पाने के कारण स्थगित कर दी गई थी। फिर भी मोदी ऑस्ट्रेलिया गये, जबकि उन्हें कोई सरकारी न्योता नहीं था। ये उनकी निजी यात्रा थी जिसके लिए अप्रवासी भारतीयों की एक रैली का आयोजन किया गया। जिसमें लगभग बीस हज़ार भारतीयों ने हिस्सा लिया। जबकि ऑस्ट्रेलिया में दस लाख भारतीय रहते हैं। जानकारों का कहना है कि इन बीस हज़ार श्रोताओं में पंद्रह हज़ार गुजराती थे। ये भी सुना है कि बारह चार्टर हवाई जहाज़ चीयरलीडर्स को ले कर गये थे।

दरअसल भाजपा ने कई देशों में ‘फ़्रेंड्स ऑफ़ बीजेपी’ नाम के हज़ारों संगठन बना रखे हैं। पिछली बार जब पीएम मोदी ऑस्ट्रेलिया गये थे तो ऑस्ट्रेलिया में इस संगठन के अध्यक्ष बालेश धनखड़ ने ऐसे ही कार्यक्रम आयोजित किए थे। ये इत्तिफ़ाक़ ही है कि वही बालेश पाँच कोरियाई महिलाओं के साथ बलात्कार के आरोप में जेल में बंद है। उधर अमरीका में पीएम मोदी के स्वागत के लिए अब तक जो भव्य आयोजन किए गये हैं उनका प्रारूप भी राजनैतिक न हो कर कॉर्पोरेट इवेंट मैनेजमेंट जैसा रहा है। ज़ाहिर है कि ऐसे आयोजनों में लोगों को लाने, होटलों में ठहराने और खिलाने-पिलाने में अरबों रुपया खर्च होता है। ये पैसा कौन खर्च कर रहा है? ‘पीएम केयर्स’ में जमा और खर्च पैसे का हिसाब आजतक देश के मतदाताओं को नहीं दिया गया। जबकि इस निजी ट्रस्ट को सरकारी की तरह ही दिखा कर चंदे में भारी भरकम रक़म उघाई गई थी। विपक्ष को संदेह है कि कहीं यही पैसा तो पीएम मोदी की छवि बनाने पर खर्च नहीं किया जा रहा? वरना आज के दौर में किसे फ़ुरसत हैं कि वो तकलीफ़ उठा कर किसी रैली में जाए, जब सब कुछ टीवी या सोशल मीडिया पर उपलब्ध है।

देश के जागरूक नागरिक इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि पीएम मोदी को अप्रवासी भारतीयों से ही अपने स्वागत के लिए इवेंट मैनेजमेंट करवाने की ज़रूरत क्यों पड़ती है? जबकि ये वो लोग हैं जो भारत के विकास की प्रक्रिया में हिस्सा न लेकर विदेश चले गये और वहाँ सफल होने के बाद अब भारतवासियों को ज्ञान देते हैं। ये वो अप्रवासी भारतीय नहीं हैं जो अपनी कमाई हुई विदेशी मुद्रा भारत भेजते हों। विदेशी मुद्रा भेजने वाली जमात तो उन ग़रीब अप्रवासी भारतीयों की है जो खाड़ी के देशों या अन्य देशों में मेहनत मज़दूरी करके अपनी कमाई भेजते हैं। अगर अप्रवासी भारतीय वास्तव में पीएम मोदी के प्रशंसक हैं और यह मानते हैं कि पीएम मोदी ने वाक़ई भारत की कायाकल्प कर दी है तो वे लौट कर भारत में बसने क्यों नहीं आते? सच्चाई तो यह है कि इन नौ सालों में हज़ारों अरबपतियों ने भारत की नागरिकता छोड़ कर विदेशों की नागरिकता ले ली है। अबसे पहले कभी किसी प्रधान मंत्री ने विदेशों में अपनी छवि बनाने के लिए ऐसे आयोजन नहीं करवाए। जब भी कोई प्रधान मंत्री विदेश जाते थे तो भारतीय दूतावास के अधिकारी कुछ चुनिंदा भारतीय परिवारों को दूतावास में चाय पर बुला कर प्रधान मंत्री का एक सामान्य स्वागत करवा दिया करते थे।

पीएम मोदी की छवि बनाने में जनता के हज़ारों करोड़ रुपये विज्ञापनों में खर्च कर दिया गया है। ये विज्ञापन केंद्र सरकार, उसके मंत्रालय, सार्वजनिक उपक्रम, प्रांतीय सरकारें, सरकार से लाभान्वित बड़े उद्योगपति और भाजपा प्रकाशित करवाते हैं। इन विज्ञापनों से देश की जनता का क्या भला हो रहा है? क्या दो करोड़ रोज़गार हर वर्ष देने का वादा किए गये अठारह करोड़ लोगों को पिछले नौ वर्षों में रोज़गार मिल गया? अगर मिल गया होता तो मुफ़्त का राशन लेने वाले साठ करोड़ लोगों के घर में एक-एक सपूत तो कमाने वाला हो गया होता। क्योंकि ऐसा नहीं हुआ है इसलिए ये परिवार ग़रीबी की सीमा रेखा से नीचे आज भी जी रहे हैं। चीयर लीडर्स की रैलियाँ विदेशों में करवाने के बजाए अगर पीएम मोदी ने देश भर में ‘जनता दरबार’ लगाए होते और उनसे उनकी समस्याएँ सुनी होती तो वास्तव में पीएम मोदी की छवि कुछ और ही बनती। तब उन्हें विज्ञापनों और विदेशी यात्राओं की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

भारत में पीएम मोदी की हर यात्रा में वो चाहे धार्मिक हो या राजनैतिक करोड़ों रुपये के फूल सजाए जाते हैं और फूल पत्तियों से भारी थैलियाँ घर-घर बँटवा कर लोगों से पीएम मोदी पर फूल फेंकने को कहा जाता है। सड़कें फूलों से पट जाती हैं। जैसा हाल के चुनावों में कर्नाटक में बार-बार हुआ। बावजूद इसके भाजपा बुरी तरह हार गई। मतलब ये कि वो फूल लोगों ने अपने पैसे और भावना से नहीं फेंके। बल्कि उनसे फ़िकवाए गये थे। सवाल है कि क्या भाजपा के पास जनता को प्रभावित करने के लिए कोई और मुद्दे नहीं बचे, सिवाय पीएम मोदी की छवि भुनाने के? तो क्या 2024 की वयतरणी केवल पीएम मोदी की छवि के सहारे पार की जाएगी? जितना ज़्यादा बढ़-चढ़ कर उनका प्रचार किया जा रहा है उसका वांछित परिणाम तो आ नहीं रहा। दिल्ली, बंगाल, हिमाचल और कर्नाटक आदि कितने ही राज्यों में भाजपा को हार का मुँह देखना पड़ा है। ज़रूरत इस बात की है कि भाजपा और पीएम मोदी नक़ली छवि पर धन और ऊर्जा खर्च करने के बजाए अपनी ठोस उपलब्धियों को मतदाताओं के सामने रखें और उनके आधार पर वोट माँगे।

-भारत एक्सप्रेस

विनीत नारायण, वरिष्ठ पत्रकार

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