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दशकों तक अमेरिका समेत पश्चिमी देश और जियो-पॉलिटिकल विशेषज्ञ चीन की बढ़ती आर्थिक-सैन्य ताकत तथा विशाल आबादी को वैश्विक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते रहे. लेकिन वाशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट फोरम के नीति विश्लेषण निदेशक माइकल रुबिन का मानना है कि असल खतरा चीन के उदय में नहीं, बल्कि उसकी घटती आबादी में है और यह खतरा खासकर भारत के लिए गंभीर है.
रुबिन ने संडे गार्जियन में हाल ही में प्रकाशित अपने लेख ‘China’s population crash could mean war with India’ में तर्क दिया है कि आबादी के तेज पतन से जूझ रहा चीन राष्ट्रवाद भड़काने और आंतरिक समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए बाहरी संघर्ष की ओर बढ़ सकता है. उनका अनुमान है कि ताइवान पर हमला करने का जोखिम बहुत अधिक होने के कारण बीजिंग पहले अरुणाचल प्रदेश या भारत के अन्य संवेदनशील क्षेत्रों को निशाना बना सकता है.
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) और विश्व जनसंख्या संभावनाओं के आंकड़ों के अनुसार, 2023 में भारत की आबादी चीन से आगे निकल गई. वर्तमान में चीन की आबादी आधिकारिक तौर पर लगभग 1.405 अरब के आसपास है और लगातार घट रही है. 2025 में चीन में जन्म दर 5.63 प्रति हजार पर पहुंच गई, जो 1949 के बाद सबसे कम है. जन्म 7.92 मिलियन रहे जबकि मृत्यु 11.31 मिलियन.
संयुक्त राष्ट्र के मध्यम अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2100 तक भारत की आबादी 1.5 अरब से अधिक रहेगी, जबकि चीन की आबादी सिमटकर महज 633 मिलियन (लगभग 63.3 करोड़) रह जाएगी यानी चरम आबादी से करीब 55 प्रतिशत कम. यह बदलाव केवल संख्या का नहीं, बल्कि आर्थिक, सैन्य और सामाजिक शक्ति का भी है.
रुबिन उदाहरण देते हैं कि बढ़ती आबादी वाले देश अक्सर पड़ोसियों के संसाधनों पर नजर रखते हैं (नाजी जर्मनी का ‘लेबेन्स्रॉम’, जापान का मंचूरिया). लेकिन घटती आबादी भी आक्रामकता पैदा कर सकती है. रूस की आबादी 1990 के दशक में चरम पर पहुंचने के बाद घटी और व्लादिमीर पुतिन ने जनसांख्यिकी को प्राथमिकता बताते हुए जॉर्जिया (2008), क्रीमिया (2014) और यूक्रेन (2022) पर कार्रवाई की. ईरान में भी जन्म दर में तेज गिरावट के बाद शासन ने बाहरी संघर्ष का रास्ता चुना.
चीन में 36 साल तक चली एक-संतान नीति ने स्थिति को और बिगाड़ दिया. पुरुष वरीयता के कारण लिंग अनुपात बिगड़ा और प्रजनन क्षमता वाली महिलाओं की संख्या कम हो गई. नीति हटाने के बाद भी जन्म दर में स्थायी सुधार नहीं हुआ.
रुबिन का तर्क है कि ताइवान पर हमला अमेरिका और अन्य शक्तियों के हस्तक्षेप का जोखिम पैदा करता है. वहीं भारत के खिलाफ कार्रवाई को बीजिंग कम जोखिम वाला मान सकता है. अरुणाचल प्रदेश, अक्साई चिन और सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) जैसे क्षेत्र रणनीतिक रूप से संवेदनशील हैं. चीन और पाकिस्तान बांग्लादेश को भी अपने प्रभाव में लाने की कोशिश कर रहे हैं, जो स्थिति को और जटिल बना सकता है.
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी आबादी घटने से आर्थिक मंदी, बढ़ते बुजुर्ग आश्रितों और सामाजिक असंतोष का सामना कर रही है. ऐसे में राष्ट्रवाद को मजबूत करने के लिए बाहरी ‘डाइवर्जनरी वॉर’ का विकल्प आकर्षक लग सकता है.
रुबिन का निष्कर्ष साफ है कि नई दिल्ली को इस बदलते जनसांख्यिकीय और रणनीतिक समीकरण को गंभीरता से लेना होगा. भारत की युवा आबादी और जनसांख्यिकीय लाभ एक मजबूत आधार है, लेकिन सीमा सुरक्षा, सैन्य तैयारियां, कूटनीतिक गठबंधन और आर्थिक-तकनीकी क्षमता को और मजबूत करना जरूरी है.
चीन की घटती आबादी वैश्विक शक्ति संतुलन को बदल रही है. पश्चिम ने लंबे समय तक चीन के उदय को खतरा माना, लेकिन रुबिन के अनुसार असल खतरा उसके पतन में छिपा हो सकता है. भारत के लिए यह सतर्क रहने और रणनीतिक रूप से तैयार रहने का समय है.
-भारत एक्सप्रेस
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