विश्लेषण

आग का तांडव: अज्ञानता और बदइंतजामी से कब तक उजड़ेंगे आशियाने?

Fire Safety Awareness India: दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में हुए दर्दनाक हादसे ने सभी झकझोर कर रख दिया है. इस दर्दनाक हादसे में 20 से अधिक लोगों की मृत्यु ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. ये सवाल प्रशासन पर, बिल्डर पर, होटल चलाने वालों पर, राहत एजेंसियों पर और कुछ हद तक आम जनता पर भी खड़े हो रहे हैं. आए दिन हम ऐसी आगज़नी के हादसों के बारे में सुनते रहते हैं. ऐसी दुर्घटनाओं में कई लोग अपनी जान भी गँवा देते हैं. अक्सर जान-माल के नुक़सान का कारण अज्ञानता और जागरूकता होती है.

अग्निकांड जैसे हादसों में यदि धैर्य और सूझबूझ से काम लिया जाए तो बड़े हादसे और जान-माल का नुक़सान टाला जा सकता है. परंतु पश्चिमी देशों की तुलना में हमारे देश की आपदा प्रबंधन या एजेंसियाँ उतनी तत्त्पर्ता से काम नहीं करतीं. यदि स्कूली बच्चों और सभी नागरिकों को आपदा प्रबंधन की प्राथमिक जानकारी व्यापक रूप से दे दी जाए तो दुर्घटनाओं के समय यह जानकारी जान-माल का अधिक नुक़सान होने से बचा सकती है.

जागरूकता और अज्ञानता के बीच का अंतर

पाठकों को याद दिला दें कि 1986 में दक्षिण दिल्ली के पाँच सितारा होटल सिद्धार्थ में भीषण आग लगी थी. इस दुर्घटना में 37 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और 40 से अधिक लोग घायल हुए थे. ग़ौरतलब है कि इस हादसे में मरने वाले केवल भारतीय ही थे जबकि उस होटल में अमरीका और जापान के मेहमान भी रह रहे थे. विदेशी मेहमानों को केवल मामूली चोट ही आई थी. क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों हुआ?

जैसे ही आग की खबर लगी, सभी विदेशियों ने अपने-अपने कमरों के दरवाज़ों के नीचे वाली जगह पर गीले तौलिये लगा दिये थे. ऐसा करने से धुएँ को कमरे के अंदर आने का मार्ग नहीं मिला. यदि धुआँ किसी कारण कमरे में घुसा भी तो काफ़ी कम मात्रा में. इसके साथ ही सभी विदेशियों ने अपनी नाक को एक गीले कपड़े से बांध रखा था जिससे कि धुआँ उनके फेंफड़ों में न जा सके.

चूँकि इन सभी विदेशियों को आपदा प्रबंधन की प्राथमिक जानकारी थी, ये सभी अपने-अपने कमरों में ज़मीन पर लेट गए. क्योंकि धुआँ हमेशा ऊपर की ओर ही उठता है. ऐसा करने से इन विदेशियों ने, अग्निशमन दल के पहुँचने तक ख़ुद को जीवित रखा. जबकि भारतीयों को ऐसी प्राथमिक जानकारी न होने के कारण आग और धुएँ का शिकार होना पड़ा. हड़बड़ी में सभी भारतीय यहाँ-वहाँ भागने लगे और फेंफड़ों में धुआँ घुसने के कारण उनका दम घुटा.

मौत को बुलावा देने वाली मानवीय गलतियाँ

दिल्ली हो या देश का अन्य कोई भी शहर जब भी किसी इमारत या भवन में आग लगती है तो वहाँ अफ़रा-तफ़री का माहौल बन जाता है. लोग अज्ञानता और घबराहट के चलते यहाँ-वहाँ भागते हैं और अपने शरीर में धुएँ को बड़ी आसानी से प्रवेश दे देते हैं. ग़ौरतलब है कि आग लगने की स्थिति में यदि हम इधर-उधर दौड़ते हैं तो हमारी सांस लेने की गति भी बड़ जाती है और धुआँ काफ़ी अधिक मात्रा में हमारे फेंफड़ों में घुस जाता है, नतीजतन हम बेहोश हो कर गिर जाते हैं और आग की लपटें हमें जला देती हैं. आँकड़ों के अनुसार अग्निकांड में ज़्यादा मौतें दम घुटने के कारण होती हैं.

संकट के समय जीवन रक्षा के अचूक उपाय

इसलिए यदि आप कभी ऐसी स्थिति में फँस जाएँ तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें. सबसे पहली बात बिलकुल भी घबराएँ नहीं. यदि आप होश में रहेंगे और हिम्मत से काम लेंगे तो आप औरों की मदद भी कर पायेंगे. अपने मुँह पर एक गीला रूमाल या कपड़ा बांध लें और ज़मीन पर लेटे रहें. यदि आप किसी बंद कमरे में फँस जाते हैं तो उस कमरे में जहां से भी धुआँ आने की संभावना हो उस रास्ते को किसी गीले कपड़े से जाम कर दें.

जब तक अग्निशमन दल के कर्मी आप तक पहुँचें, ऐसी ही सलाह अपने आस-पास के लोगों को भी दें. यदि आपका मोबाइल फ़ोन काम कर रहा हो तो आपातकालीन नम्बरों पर कॉल करके अपनी सही लोकेशन बताएँ जिससे कि आप तक सहायता पहुँच सके.

आधुनिक आपदा प्रबंधन की आवश्यकता

इसके साथ ही देश में आपदा प्रबंधन की एजेंसियों को भी नागरिकों के बीच जागरूकता को बढ़ाना चाहिए. दमकल विभाग को भी पुलिस कंट्रोल रूम की तर्ज़ पर छोटी-छोटी अग्निशमन की गाड़ियों को मुख्य स्थानों पर खड़ा कर देना चाहिए. ऐसा करने से ट्रैफ़िक जाम के चलते अग्निशमन की गाड़ियों को पहुँचने में देरी भी नहीं लगेगी. इन छोटों गाड़ियों में तैनात कर्मियों को अग्नि हादसों में प्राथमिक कार्यवाही करने की पूरी ट्रेनिंग भी हो.

दुर्घटना की स्थिति में ऐसे कर्मियों का नज़दीकी अग्निशमन केंद्र से संपर्क हो और वे सही स्थिति का जायज़ा लेकर उचित मदद मँगवा सकें. आज के सूचना क्रांति के युग में काफ़ी मदद सोशल मीडिया से भी मिल सकती है. जैसे पुलिस की मदद के लिए सिविल डिफ़ेंस के स्वयंसेवी त्योहारों और अन्य बड़े आयोजनों पर तैनात किए जाते हैं तो आपदा प्रबंधन के लिए भी ऐसा ही कुछ किया जाना चाहिए.

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-भारत एक्सप्रेस

रजनीश कपूर, वरिष्ठ पत्रकार

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