विश्लेषण

क्या सुरक्षा केवल कानून है? अंशु हर्ष की ‘इच्छा मृत्यु’ ने उठाया सवाल, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बीच गूंजी बेजुबान आवाज़ें

‘हर कहानी, हर पीड़ा, हर अन्याय ने मेरे मन को भीतर तक झकझोरा और मुझे यह महसूस कराया कि इन आवाजों को शब्द देना जरूरी है क्योंकि कई बार खामोशियों के पीछे छिपा सच, सबसे ज्यादा बोलता है. यही वे अनुभव और संवेदनाएं थीं, जिन्होंने इस रचना को जन्म दिया.’ ‘इच्छा मृत्यु’ पुस्तक से यह उद्धरण लेखिका अंशु हर्ष की पुस्तक ‘इच्छा मृत्यु: पैसिव यूथेनेशिया’का सार है. ठीक उसी समय जब सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु (passive euthanasia) के क्षेत्र में एक और मील का पत्थर रखा है, यह पुस्तक उस कानूनी और नैतिक बहस को साहित्यिक संवेदनशीलता से जोड़ती है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की यात्रा

2011 से 2026 तक सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा शानबाग मामले (2011) में पहली बार passive euthanasia की अवधारणा को मान्यता दी. अरुणा 42 वर्ष तक persistent vegetative state (PVS) में रही थीं. अदालत ने दिशानिर्देश जारी किया कि जीवन-रक्षक उपचार को हटाना (withholding/withdrawal of life support) संभव है, लेकिन यह हाईकोर्ट की मंजूरी से होना चाहिए.

फिर Common Cause (A Registered Society) vs Union of India (2018) में पांच-जज बेंच ने ऐतिहासिक फैसला दिया. अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) में “गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार” भी शामिल है. Passive euthanasia को वैध ठहराया गया—यानी जीवन-रक्षक यंत्र, वेंटिलेटर या clinically assisted nutrition and hydration (CANH) को हटाना. Active euthanasia (दवा देकर जान लेना) अभी भी अवैध है.

सबसे महत्वपूर्ण योगदान था living will या advanced medical directive को मान्यता. व्यक्ति स्वयं लिखित रूप में बता सकता है कि यदि वह terminal illness या PVS में चला जाए तो जीवन-रक्षक उपचार न दिया जाए. अदालत ने विस्तृत दिशानिर्देश दिए: प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड की जांच, न्यायिक मजिस्ट्रेट की भूमिका आदि.

जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इन दिशानिर्देशों को और सरल बनाया. Living will की प्रमाणिकता के लिए नोटरी या गजेटेड अधिकारी पर्याप्त, प्रक्रिया में समयसीमा तय की गई ताकि परिवारों को बार-बार अदालत न जाना पड़े.

11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार किसी विशिष्ट मामले में passive euthanasia की अनुमति दी. 32 वर्षीय हरिश राणा (2013 से PVS में) के मामले में डिवीजन बेंच ने CANH वापस लेने की अनुमति दी. अदालत ने भावुक संदेश दिया,

“हमारा निर्णय तर्क और तर्क से परे है… यह प्रेम, हानि, चिकित्सा और दया के बीच का फैसला है. यह मृत्यु चुनने का नहीं, बल्कि जीवन को कृत्रिम रूप से लंबा न खींचने का है… जब चिकित्सा केवल अनिवार्य को टाल सकती है, तो प्रकृति को अपना काम करने देना ही दया है.”

यह आदेश Common Cause दिशानिर्देशों (2018 व 2023) पर आधारित था और अदालत ने जोर दिया कि यह प्रक्रिया मुख्यतः चिकित्सकीय है. परिवारों को हर बार अदालत नहीं आना चाहिए.

खामोश पीड़ाओं को शब्द

इसी कानूनी पृष्ठभूमि पर अंशु हर्ष की 436 पृष्ठों की पुस्तक ‘इच्छा मृत्यु’ आती है. पुस्तक की नायिका दामिनी 42 वर्ष तक अस्पताल में बेजुबान, लावारिस पड़ी रही संवेदनहीनता और लापरवाही की कहानी. यह दामिनी कोई अकेली नहीं समाज में अनगिनत महिलाएं ऐसी पीड़ा झेल रही हैं.

लेखिका ने स्पष्ट कहा है कि अपराधों के खिलाफ वार्षिक मोमबत्ती मार्च या आक्रोश रैलियां पर्याप्त नहीं ये केवल औपचारिक जिम्मेदारी निभाती हैं. जब कानूनी और सामाजिक व्यवस्था महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा को गंभीरता से नहीं लेती, तब जीवन ‘इच्छा-मृत्यु’ की ओर धकेल दिया जाता है. पुस्तक passive euthanasia के नैतिक-भावनात्मक पक्ष को छूती है और पूछती है क्या महिलाओं के खिलाफ अपराधों को कभी गंभीरता से लिया जाएगा? क्या सुरक्षा केवल कानूनी मुद्दा है या सामाजिक परिवर्तन का?

अरुणा शानबाग के वास्तविक मामले से प्रेरित यह रचना उन खामोशियों को बोलने का माध्यम बनती है जिन्हें कानून अकेले संबोधित नहीं कर सकता. जहां सुप्रीम कोर्ट ने गरिमापूर्ण मृत्यु को मौलिक अधिकार घोषित किया, वहीं यह पुस्तक उस अधिकार के पीछे की पीड़ा, अन्याय और संवेदना को शब्द देती है.

कानून और साहित्य का संगम

सुप्रीम कोर्ट का 2018 का फैसला, 2023 का सरलीकरण और 2026 का पहला व्यावहारिक आदेश भारत में end-of-life care की दिशा बदल रहा है. अब passive euthanasia चिकित्सकीय प्रक्रिया बन चुकी है, जिसमें परिवारों को अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाना पड़ता. लेकिन कानून भावनाओं को पूरी तरह संबोधित नहीं कर सकता.

अंशु हर्ष की ‘इच्छा मृत्यु’ ठीक यही काम करती है. वह उन दामिनी जैसी अनगिनत आत्माओं की आवाज बनती है जिनकी खामोशी सबसे जोर से बोलती है. यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय भी है.

यह भी पढ़ें: राजकमल प्रकाशन के 81वें स्थापना दिवस पर ‘सहयात्रा उत्सव’: युवा वक्ताओं ने उठाए लोकतंत्र, उर्दू अदब और डायन प्रथा जैसे गंभीर मुद्दे

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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