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South India Hindi History: दक्षिण भारत के अविभाजित आंध्र प्रदेश से आने वाले पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव 17 भाषाएं जानते थे. राजनीतिक शोर-शराबे से दूर देखें तो दक्षिण में हिंदी और उसके बोलने वालों का एक लंबा, जैविक इतिहास है.
दक्षिण में हिंदी की सक्रिय उपस्थिति स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान शुरू हुई. महात्मा गांधी ने 1918 में मद्रास (अब चेन्नई) में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की. इसका उद्देश्य गैर-हिंदी भाषी जनता को हिंदी सिखाना था ताकि राष्ट्रीय एकता मजबूत हो.
प्रोफेसर जे. आत्माराम (हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग) के मुताबिक- ‘हिंदी सीखना उस राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने का एक तरीका था.’
1922 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने हिंदी दक्षता की पहली प्रारंभिक परीक्षा ली. 1931 में पहला स्नातक स्तर का परीक्षा ‘राष्ट्रभाषा विशारद’ आयोजित हुआ. हैदराबाद, विजयवाड़ा, कोची और गुलबर्गा जैसे केंद्रों में हिंदी सीखने का चलन बढ़ा. आंध्र प्रदेश ने हिंदी और अन्य दक्षिणी भाषाओं के बीच एक पुल का काम किया.
कर्नाटक और केरल में भी ज्यादा विरोध नहीं था. एर्नाकुलम में 1930 के दशक से सक्रिय दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने हिंदी को चुपचाप फैलाया.
स्वतंत्रता के बाद हिंदी का प्रसार और भी स्वाभाविक रूप से हुआ- रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से. मद्रास और तिरुचिरापल्ली के रेडियो स्टेशनों पर हिंदी कार्यक्रमों के साथ क्षेत्रीय भाषाओं के कार्यक्रम भी चलते रहे.
1970 के दशक तक दूरदर्शन दक्षिण तक पहुंच चुका था. सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपेरिमेंट (SITE) 1975 में कर्नाटक और आंध्र प्रदेश पर केंद्रित था. कृषि और शिक्षा संबंधी कार्यक्रमों में दृश्य सामग्री के साथ दो भाषाएं (अक्सर हिंदी और तेलुगु) होती थीं.
प्रोफेसर बी.पी. संजय (SITE पर काम करने वाले और भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व निदेशक) अनुसार
‘जब निर्देशात्मक कार्यक्रमों में भाषा का विकल्प था, तो जनसंचार कार्यक्रम जैसे रामायण, महाभारत, चित्रहार आदि घर-घर पहुंचे. लोग हिंदी नहीं बोलते थे, लेकिन भाषा बिना किसी रुकावट के उनके घरों और दिलों में उतर गई.’
1970-80 के दशक में दक्षिणाचल हिंदी समिति जैसी संस्थाओं ने भक्ति साहित्य का अनुवाद किया. ‘कल्पना’ और ‘गोलकोंडा दर्पण’ जैसी हिंदी पत्रिकाएं हैदराबाद से निकलती थीं और उत्तर भारत में भी लोकप्रिय थीं.
1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने तीन-भाषा फॉर्मूले को बढ़ावा दिया- हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषा. तमिलनाडु को छोड़कर लगभग सभी दक्षिणी राज्यों ने सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में तीन-भाषा नीति अपनाई.
आज प्रवास के कारण हिंदी और उसकी बोलियां और तेजी से फैल रही हैं. केरल के कुछ जिलों में उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से आए प्रवासियों के लिए बस बोर्ड हिंदी में भी दिखते हैं.
‘तमिलनाडु में कोई आपको हिंदी पढ़ाने या सीखने से नहीं रोकता. 2009 से हम यह संस्थान चला रहे हैं. इसमें सिर्फ स्कूल के छात्र और सिविल सेवा के उम्मीदवार नहीं, बल्कि ईरोड के हल्दी व्यापारी भी आते हैं. उन्हें व्यापार के लिए हिंदी बोलने की जरूरत होती है और हम उनकी मदद करते हैं.’
दक्षिण भारत में हिंदी की यात्रा राजनीतिक थोपने से ज्यादा स्वतंत्रता आंदोलन, शिक्षा, मीडिया और व्यावसायिक जरूरत से जुड़ी रही है. महात्मा गांधी से लेकर दूरदर्शन के धारावाहिकों तक, और आज के प्रवासियों तथा व्यापारियों तक- हिंदी ने अपनी जगह धीरे-धीरे और स्वाभाविक रूप से बनाई है.
राजनीतिक बहस जारी रहेगी, लेकिन इतिहास बताता है कि भाषाएं अक्सर सत्ता के फरमान से नहीं, बल्कि लोगों की जरूरत और सांस्कृतिक संपर्क से फैलती हैं.
-भारत एक्सप्रेस
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