आज (शुक्रवार) को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) अपने गठन के सौ वर्ष पूरे कर रही है. कानपुर के एक सादे से सभागार में 1925 की ठंडी सर्दी में जन्मी यह पार्टी, जो साम्यवाद की लाल झंडी को भारत की मिट्टी से जोड़ने का सपना लेकर आई, आज भी मजदूरों, किसानों और वंचितों की आवाज बनी हुई है. एक सदी की यह यात्रा केवल राजनीतिक घटनाओं की नहीं, बल्कि असंख्य बलिदानों, आंदोलनों और वैचारिक संघर्षों की गाथा है.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 26 दिसंबर, 1925 को कानपुर में हुई थी. यह वह दौर था जब रूसी क्रांति की लहरें भारत पहुंच रही थीं और युवा क्रांतिकारी ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ एक नई वैचारिक क्रांति की तलाश में थे. पार्टी के संस्थापक मनबेंद्रनाथ रॉय (एम.एन. रॉय) थे, जो ताशकंद से लौटे थे और कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से प्रेरित होकर भारत लौटे. सम्मेलन में करीब 500 प्रतिनिधि शामिल हुए, जिनमें सच्चिदानंद विष्णु घाटे पहले महासचिव बने.
इससे पहले, 1920 में मुंबई, कलकत्ता और मद्रास जैसे शहरों में छोटे-छोटे कम्युनिस्ट समूह सक्रिय हो चुके थे. लेकिन कानपुर सम्मेलन ने इन्हें एकजुट किया. पार्टी का घोषणा-पत्र स्पष्ट था: साम्राज्यवाद का अंत, मजदूर-किसान सत्ता और सामाजिक न्याय. ब्रिटिश सरकार ने इसे खतरनाक मानते हुए तुरंत प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन यह दमन ही पार्टी की पहचान बन गया.
1930 के दशक में भाकपा ने मजदूर हड़तालों और किसान विद्रोहों को नेतृत्व दिया. 1928 का ब्रिस्टल स्ट्राइक और 1934 का कलकत्ता ट्राम हड़ताल इसके उदाहरण हैं.
भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों पर कम्युनिस्ट विचारों का गहरा प्रभाव था, और पार्टी ने तेलंगाना किसान विद्रोह (1946-51) जैसे बड़े आंदोलनों को हवा दी. स्वतंत्रता के बाद, भाकपा ने भूमि सुधार, मजदूर अधिकार और अल्पसंख्यक सुरक्षा की मांगें उठाईं. 1950-60 के दशक में यह मुख्य विपक्षी दल बनी, और 1957 के केरल विधानसभा चुनाव में पहली कम्युनिस्ट सरकार बनाई, ई.एम.एस. नंबूदिरीपाद के नेतृत्व में. यह भारत का पहला गैर-कांग्रेसी सरकार थी.
स्वतंत्रता के बाद वैचारिक मतभेदों ने पार्टी को प्रभावित किया. सोवियत संघ और चीन के बीच वैचारिक युद्ध ने भारत को भी बांटा. 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद आंतरिक कलह बढ़ी, और 1964 में भाकपा दो धड़ों में बंट गई – एक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और दूसरी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी). बाद में 1969 में नक्सलबाड़ी आंदोलन से भाकपा(माले) का जन्म हुआ. विभाजन ने वामपंथ को विविधता दी.
इसके अलावा, भाकपा की यात्रा कई विवादों से भी घिरी रही, जिन्होंने इसकी छवि को प्रभावित किया. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ‘पीपुल्स वॉर’ नीति अपनाने के कारण पार्टी पर ब्रिटिश समर्थक होने का आरोप लगा, जिससे भारत छोड़ो आंदोलन में उसकी अनुपस्थिति ने इसे अलग-थलग कर दिया. 1962 के भारत-चीन युद्ध में सोवियत-समर्थक रुख अपनाने के बावजूद, कुछ नेताओं के चीन-समर्थन ने ‘राष्ट्र-विरोधी’ होने के आरोप लगाए. 1975 के आपातकाल के दौरान भाकपा का इंदिरा गांधी सरकार का समर्थन एक बड़ा विवाद बना, जबकि भाकपा(मार्क्सवादी) ने इसका विरोध किया—इससे पार्टी को ‘सत्ता-समर्थक’ की उपाधि मिली.
भाकपा पहली पार्टी थी जिसने महिलाओं को समान अधिकारों की बात की. निजीकरण, उदारीकरण की लहरों ने वामपंथ को कमजोर किया.
ये भी पढ़ें: पीएम मोदी 27 और 28 दिसंबर को दिल्ली में मुख्य सचिवों के पांचवें राष्ट्रीय सम्मेलन की अध्यक्षता करेंगे
-भारत एक्सप्रेस
सुप्रीम कोर्ट ने 2005 के चर्चित सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में 22 आरोपियों को बरी…
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को जनता दर्शन में प्रदेश के अलग-अलग जिलों से आए…
रांची के हरमू स्थित डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा पर कालिख पोतने के मामले…
सुप्रीम कोर्ट ने ₹2,000 से अधिक के यूपीआई भुगतानों पर प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR)…
UP News: लखीमपुर खीरी में लगातार बारिश और तेज हवाओं से हालात बिगड़ गए हैं.…
सुप्रीम कोर्ट ने वकील के दफ्तर की तलाशी और जांच एजेंसी द्वारा जब्त डिजिटल सामग्री…