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कौन थे दौलत सिंह कोठारी? जानिए DRDO, UGC और NCERT की नींव रखने वाले महान वैज्ञानिक की कहानी

भारत को आजादी के बाद वैज्ञानिक और शैक्षिक क्षेत्र में जो मजबूत नींव मिली, उसके पीछे कई ऐसे नाम हैं जो लाइमलाइट में कम आए लेकिन उनके योगदान अतुलनीय रहे. होमी भाभा, विक्रम साराभाई और मेघनाद साहा जैसे दिग्गजों की छाया में एक नाम है प्रोफेसर दौलत सिंह कोठारी. वे भारतीय रक्षा विज्ञान के वास्तुकार माने जाते हैं, जिन्होंने DRDO की नींव रखी, UGC और NCERT की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने में क्रांतिकारी योगदान दिया.

दौलत सिंह कोठारी का जन्म 6 जुलाई 1906 को उदयपुर (राजस्थान) में एक साधारण जैन परिवार में हुआ था. पिता की जल्दी मृत्यु के बाद मां ने उन्हें संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में पाला. उन्होंने उदयपुर और इंदौर में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1926 में बीएससी और 1928 में भौतिकी में एमएससी की डिग्री हासिल की, जहां उनके गुरु मेघनाद साहा थे.

1930 में यूपी सरकार की फेलोशिप पर वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध कैवेंडिश लेबोरेटरी पहुंचे. वहां उन्होंने लॉर्ड अर्नेस्ट रदरफोर्ड, पी. कपित्ज़ा और आर. एच. फाउलर जैसे महान वैज्ञानिकों के साथ काम किया. 1933 में उन्होंने “The Quantum Statistics of Dense Matter” विषय पर पीएचडी पूरी की. उनके शोध ने सांख्यिकीय थर्मोडायनामिक्स और श्वेत बौने तारों (White Dwarfs) के सिद्धांत को महत्वपूर्ण योगदान दिया.

दिल्ली विश्वविद्यालय में योगदान

भारत लौटकर 1934 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े और 1940 में मात्र 34 वर्ष की आयु में प्रोफेसर नियुक्त हुए. उन्होंने वहां भौतिकी विभाग का नेतृत्व किया और छात्रों को प्रेरित किया.

रक्षा विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति

1948 में स्वतंत्र भारत की सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए उन्हें रक्षा मंत्रालय का वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त किया गया (1948-1961). इस पद पर उन्होंने डिफेंस साइंस ऑर्गनाइजेशन की स्थापना की, जो बाद में DRDO बना.

वे भारतीय रक्षा विज्ञान के वास्तुकार कहे जाते हैं. उनके प्रयासों से निम्नलिखित प्रमुख संस्थान स्थापित हुए:

  • नेवल डॉकयार्ड लेबोरेटरी (बाद में Naval Chemical and Metallurgical Laboratory), मुंबई
  • इंडियन नेवल फिजिकल लेबोरेटरी, कोच्चि
  • सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी, दिल्ली
  • डिफेंस फूड रिसर्च लेबोरेटरी, मैसूर
  • डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ फिजियोलॉजी एंड एलाइड साइंसेज, चेन्नई
  • डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स रिसर्च लेबोरेटरी, हैदराबाद
  • और कई अन्य DRDO लैब्स

उन्होंने रक्षा अनुसंधान को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया, जिससे भारत आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा.

शिक्षा क्षेत्र में योगदान

1961 में उन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) का अध्यक्ष बनाया गया, जहां उन्होंने 1973 तक सेवा की. UGC को मजबूत कर उच्च शिक्षा के विस्तार और गुणवत्ता सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

1964-66 में वे राष्ट्रीय शिक्षा आयोग (Kothari Commission) के अध्यक्ष बने. यह आयोग आजादी के बाद शिक्षा को आधुनिक बनाने वाला पहला प्रमुख आयोग था. इसके सिफारिशों में समान विद्यालय व्यवस्था, मातृभाषा में शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण पर जोर दिया गया. NCERT की स्थापना में भी उनकी भूमिका अहम रही.

उन्होंने सिविल सेवा परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं में उत्तर देने की छूट दिलाने और परीक्षा केंद्र बढ़ाने में भी योगदान दिया, जिससे ग्रामीण और पिछड़े वर्ग के छात्रों को अवसर मिले.

सम्मान और विरासत

  • पद्म भूषण(1962)
  • पद्म विभूषण(1973)
  • भारतीय विज्ञान कांग्रेस के महासभापति (1963)
  • भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के अध्यक्ष (1973)
  • 2011 में भारत सरकार द्वारा डाक टिकट जारी

वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी रहे. 4 फरवरी 1993 को दिल्ली में उनका निधन हुआ. दौलत सिंह कोठारी ने बिना किसी ताम-झाम के देश सेवा की. उनका जीवन सादगी, समर्पण और दूरदृष्टि का प्रतीक है. आज जब हम DRDO, UGC, NCERT और मजबूत शिक्षा व्यवस्था की बात करते हैं, तो कोठारी जी की नींव को याद करना जरूरी है. वे साबित करते हैं कि असली देशभक्ति चमक-दमक में नहीं, बल्कि चुपचाप किए गए योगदान में होती है.

-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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