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हवाई सफर पर ‘ग्रहण’! क्या सुरक्षित है आपकी फ्लाइट? Rajneesh Kapur opinion

Air Aravel Insecurity: हवाई यात्राएं आधुनिक युग में दुनिया की रीढ़ बनी हुई है. यह न केवल यात्रियों को दुनिया के कोने-कोने से जोड़ता है, बल्कि व्यापार, पर्यटन और वैश्विक अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करती हैं. लेकिन क्या नागरिक उड्डयन उद्योग उतना मजबूत है जितना दिखता है? हाल के वर्षों में, विभिन्न संकटों ने इसकी कमजोरियों को उजागर किया है. 2025 में एयरबस के हालिया संकट ने इस बहस को फिर से जीवित कर दिया है. इससे कई सवाल उठने लगे कि क्या हवाई यात्राएं सुरक्षित हैं?

एयरबस की घोषणा से करोड़ों का नुकसान

नवंबर 2025 में, एयरबस ने घोषणा की कि A320 फैमिली के एक विमान में हुई घटना के विश्लेषण से पता चला कि तीव्र सौर विकिरण (रेडिएशन) महत्वपूर्ण डेटा को बिगाड़ सकता है. यह गड़बड़ी फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम को प्रभावित करती है, जो विमान की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. परिणामस्वरूप, कंपनी ने लगभग 6,000 A320 सीरीज के विमानों के लिए तत्काल सॉफ्टवेयर अपडेट और पूर्व-सतर्कता कार्रवाई का आदेश दिया. इसने वैश्विक विमान यात्राओं में भारी व्यवधान पैदा किया. हजारों यात्री हवाई अड्डों पर फंस गए, उड़ानें रद्द हुईं और एयरलाइनों को करोड़ों का नुकसान हुआ.

दिसंबर की शुरुआत तक, एयरबस ने दावा किया कि अधिकांश विमानों को ठीक कर लिया गया है, लेकिन अभी भी कई विमानों पर काम चल रहा है. इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि सॉफ्टवेयर समस्या के ठीक बाद, कंपनी ने A320 के कुछ विमानों के धातु पैनलों में औद्योगिक गुणवत्ता की समस्या पाई, जो फ्यूजलेज को प्रभावित करती है. यह कुछ ही विमानों तक सीमित है, लेकिन यह दर्शाता है कि एक समस्या दूसरी को जन्म दे सकती है.

हवाई उद्योग की कमजोरियां

यह संकट हवाई उद्योग की कमजोरियों को स्पष्ट रूप से उजागर करता है. सबसे बड़ी कमजोरी है बाजार का एकाधिकार. एयरबस और बोइंग मिलकर 90% से अधिक यात्री विमानों का उत्पादन करते हैं. यदि एक कंपनी में कोई समस्या आती है, तो पूरा उद्योग प्रभावित होता है.

उदाहरण के लिए, 2019 में बोइंग 737 मैक्स की दुर्घटनाओं ने पूरे उद्योग को हिला दिया था और अब एयरबस का संकट उसी कड़ी का हिस्सा लगता है. दूसरी कमजोरी है तकनीकी निर्भरता. आधुनिक विमान सॉफ्टवेयर, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम पर आधारित हैं. सौर विकिरण जैसी बाहरी घटनाएं, जो जलवायु परिवर्तन के साथ बढ़ रही हैं, इन सिस्टमों को प्रभावित कर सकती हैं. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरी भी एक बड़ा मुद्दा है. IATA के अनुसार, 2025 में हवाई यात्रा में 5% की वृद्धि की उम्मीद थी, लेकिन एयरबस संकट ने इसे प्रभावित किया. एयरलाइनों की लाभप्रदता कम हो गई और निवेशकों का विश्वास डगमगाया. पर्यावरणीय दबाव भी बढ़ रहा है; कार्बन उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों में, नई तकनीकों को अपनाने में जोखिम है. कुल मिलाकर, यह उद्योग एक जटिल जाल में फंसा है जहां एक छोटी गड़बड़ी वैश्विक संकट पैदा कर सकती है.

क्या पर्याप्त हैं नियामक संस्थाओं के मानक?

नियामक संस्थाएं जैसे यूरोपीय यूनियन एविएशन सेफ्टी एजेंसी (EASA), फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (FAA) अमेरिका में और भारत में डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) उद्योग के मानकों को बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं. एयरबस संकट में, EASA ने तत्काल कार्रवाई की मांग की और सॉफ्टवेयर अपडेट को अनिवार्य किया. नियामकों का काम है विमानों के डिजाइन, निर्माण और संचालन की जांच करना. वे सर्टिफिकेशन प्रक्रिया के माध्यम से सुनिश्चित करते हैं कि कोई भी नया विमान या अपडेट सुरक्षा मानकों को पूरा करे. लेकिन क्या वे पर्याप्त हैं?

बोइंग 737 मैक्स मामले में FAA की आलोचना हुई कि उन्होंने निर्माता पर ज्यादा भरोसा किया. एयरबस मामले में भी, यदि सौर विकिरण की समस्या पहले पता चल जाती, तो संकट टाला जा सकता था. नियामकों को अधिक सक्रिय होना चाहिए, नियमित ऑडिट, स्वतंत्र जांच और उभरते जोखिमों जैसे साइबर हमलों या जलवायु प्रभावों पर ध्यान देना आदि. वैश्विक समन्वय भी जरूरी है, क्योंकि विमान अंतरराष्ट्रीय होते हैं. भारत जैसे विकासशील देशों में, DGCA को मजबूत बनाना चाहिए ताकि स्थानीय एयरलाइनों पर सख्ती से मानक लागू हों. नियामकों की भूमिका न केवल संकट प्रबंधन में है, बल्कि सकारात्मक उपायों में भी, जो उद्योग की कमजोरियों को कम कर सकती है और हवाई यात्राओं को सुरक्षित बना सकती है.

संकट में एयरलाइनों की भूमिका

एयरलाइनों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. वे अंतिम उपयोगकर्ता हैं और यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाती हैं. एयरबस संकट में, अमेरिकन एयरलाइंस जैसी कंपनियों ने तत्काल अपने बेड़े को अपडेट किया. एयरलाइनों को नियमित रखरखाव, पायलट प्रशिक्षण और सुरक्षा प्रोटोकॉल पर जोर देना चाहिए. वे निर्माताओं से पार्ट्स और अपडेट प्राप्त करती हैं, लेकिन अपनी जांच भी करनी चाहिए.

उदाहरण के लिए, इंडिगो और स्पाइसजेट जैसी भारतीय एयरलाइनों को, जो कि A320 पर निर्भर हैं, इस संकट से सबक लेना चाहिए. लागत कम करने के चक्कर में सुरक्षा से कोई भी समझौता नहीं करना चाहिए. एयरलाइनों को विविधीकरण अपनाना चाहिए, केवल एक निर्माता पर निर्भर न रहें. साथ ही, यात्री संचार में पारदर्शिता रखें, ताकि विश्वास बना रहे. कुल मिलाकर, एयरलाइनों की जिम्मेदारी है कि वे नियामकों के साथ मिलकर मानकों को लागू करें और संकटों में त्वरित प्रतिक्रिया दें.

सबकी जिम्मेदारी जरूरी

एयरबस संकट ने साबित किया कि हवाई उद्योग कितना संवेदनशील है. तकनीकी, आर्थिक और पर्यावरणीय चुनौतियों से घिरा हुआ है. लेकिन मजबूत नियामक ढांचा और जिम्मेदार एयरलाइंस इसकी रक्षा कर सकती हैं. सरकारों को अनुसंधान में निवेश करना होगा, उद्योग को अधिक लचीला बनाना होगा, ताकि भविष्य के संकटों से निपटा जा सके. आखिरकार सुरक्षा सर्वोपरि है, क्योंकि आकाश में उड़ान भरना जोखिम भरा है, लेकिन इसे सुरक्षित बनाना सभी की जिम्मेदारी है.

नोट- लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं.

रजनीश कपूर, वरिष्ठ पत्रकार

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