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किन्नरों द्वारा जबरन ‘नेग’ वसूली गैरकानूनी: इलाहाबाद हाई कोर्ट का सख्त संदेश

हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक किन्नर की याचिका पर नेग के नाम पर जबरन वसूली को ग़ैर क़ानूनी करार दिया है. अदालत ने इस तरह की वसूली को भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत अपराध बताया है. यह केस उत्तर प्रदेश के गौंडा ज़िले के किन्नर रेखा देवी की याचिका पर सुना जा रहा था. जिसमें रेखा देवी ने अपनी जजमानी का इलाक़ा निर्धारित करने की अदालत से माँग की थी. याचिकाकर्ता का कहना था कि इलाक़ों की भौगोलिक सीमा स्पष्ट ना होने के कारण, प्रायः किनारों के अलग-अलग समूहों के बीच झड़पें व हिंसा तक होती है. पर अदालत ने इस याचिका को खारिज करते हुए उक्त निर्णय सुनाया.

यह सही है कि घर में ख़ुशी के मौक़े पर, जैसे पुत्र या पुत्री का जन्म, विवाह या नए घर में गृह-प्रवेश के अवसर पर किन्नर बधाई देने आते हैं और नाच गा कर अपना नेग माँगते हैं. भारत में यह अनूठी प्रथा हज़ारों सालों से चली आ रही है. इसकी जड़ें पौराणिक काल में हैं.

रामायण से जुड़ी व्यापक रूप से स्वीकृत कथा

सबसे प्रसिद्ध और व्यापक रूप से स्वीकृत कथा रामायण से जुड़ी है. जब भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के लिए अयोध्या से जाते हैं, तो वे लोगों (पुरुषों और स्त्रियों) को वापस लौट जाने को कहते हैं. किन्नर (जो न पुरुष हैं न स्त्री) इस आदेश से खुद को बंधा नहीं मानते और राम की प्रतीक्षा में वहीं रह जाते हैं. 14 वर्ष बाद राम लौटते हैं तो उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर राम उन्हें वरदान देते हैं कि शुभ अवसरों पर उनका आशीर्वाद विशेष रूप से फलीभूत होगा. इसी वरदान को बधाई की परंपरा का मूल माना जाता है. किन्नर समुदाय गाते-बजाते, तालियां बजाते हुए आशीर्वाद देते हैं और बदले में नेग (दक्षिणा या उपहार) लेते हैं. यह मान्यता है कि उनकी उपस्थिति और आशीर्वाद नकारात्मक ऊर्जा दूर करती है और सौभाग्य लाती है. यह कथा वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास की रामचरितमानस दोनों में मिलते हैं.

इसी तरह महाभारत में अर्जुन का बृहन्नला रूप (तीसरे लिंग वाला) और शिखंडी जैसे पात्र तीसरे लिंग की मान्यता दिखाते हैं. लगभग 400 ईसा पूर्व लिखे गएकामसूत्र में किन्नरों का स्पष्ट उल्लेख है. वेदों, पुराणों और अन्य शास्त्रों में भी किन्नरों का जिक्र मिलता है. किन्नरों को गायन, नृत्य और आध्यात्मिक शक्ति से जुड़ा माना जाता था. कई विद्वान और स्रोत इस समुदाय की उपस्थिति को 4000 वर्ष से अधिक पुरानी बताते हैं.

किन्नर समुदाय की जबरन वसूली

मुगल काल में किन्नरों की भूमिका और संगठित हुई. वे हरम की रखवाली, दरबारी सेवाएं और प्रशासन में महत्वपूर्ण स्थान रखते थे. बधाई की परंपरा इस काल में अधिक प्रचलित और संरचित रूप में चली, जहां वे शुभ अवसरों पर नृत्य-गान करके आशीर्वाद देते और नेग प्राप्त करते थे. दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य में उनकी सांस्कृतिक-सामाजिक स्थिति मजबूत थी.

अंग्रेज़ों ने 1871 के ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ के तहत किन्नरों को अकिन्नरों को जबरन वसूली का अधिकार नहीं: हाई कोर्टपराधी घोषित कर दिया, जिससे उनकी पारंपरिक आजीविका और सम्मान प्रभावित हुआ. आज़ादी के बाद यह क़ानून समाप्त कर दिया गया. इस तरह बधाई-नेग की परंपरा उत्तर भारत, खासकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में आज भी जीवित है. कुछ राज्यों में सरकार ने नेग की दरें तय करने की कोशिश भी की है. पर उसमें विशेष कामयाबी नहीं मिली.

इसी अस्पष्टता का लाभ उठा कर किन्नर समुदाय प्रायः अपने जजमानों से जबरन वसूली करता है. कभी-कभी तो वसूली का तरीका बहुत अभद्र होता है. जिसमें जजमान के परिवार के सामने निर्वस्त्र हो जाना, भद्दी गालियाँ देना, बद्दुआएँ देना और डराना धमकाना. कभी-कभी यह सब नाटक इस सीमा तक हो जाता है कि भयभीत जजमान अपनी आर्थिक हैसियत से कई गुना ज़्यादा दे कर पिंड छुड़ाता है. ऐसी वसूली को ‘नेग’ कतई नहीं कहा जा सकता. ये सरासर गुंडई और अवैध वसूली का तरीका है, जिस पर स्थानीय पुलिस और प्रशासन को लगाम लगानी चाहिए. इसके साथ ही कई बार ऐसी घटनाएँ भी सामने आती हैं जब बाकायदा सम्पूर्ण पुरुष होते हुए भी मर्द, स्त्री का रूप धारण कर किन्नर होने का दावा करते हैं और इस वसूली में अपनी ताक़त दिखाते हैं.

पुलिस की जिम्मेदारी होनी चाहिए तय

हमारी सामाजिक मान्यताओं के अनुसार किन्नरों का शुभ अवसरों पर आकर गाना बजाना और बधाई देना शुभ माना जाता है. समाज इनका ख़ुशी से स्वागत करता है और ऐसे अवसरों पर अड़ोसी-पड़ोसी जुट कर इनके साथ हास-परिहास भी करते हैं. ये एक स्वस्थ परंपरा है. प्रायः छोटे शहरों और कस्बों में किन्नरों के समूह कई पीढ़ियों तक अपने जजमान परिवारों से जुड़े रहते हैं और उनकी सुख-समृद्धि के लिए आशीर्वाद देते हैं. देखा जाए तो सभी किन्नर संपन्न नहीं होते. वे अभावों में पलते हैं. उनकी आर्थिक, शैक्षिक या स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा का उचित इंतज़ाम नहीं होता.

फिर भी वे पारस्परिक सहयोग से अपना जीवन यापन कर लेते हैं. ऐसे में किन्नरों को नाचने गाने या भीख मांगने से हटा कर छोटे व्यवसायों या नौकरियों में लगाने की ज़िम्मेदारी, सरकार और समाज दोनों की है. जिससे वे सम्मानजनक जीवन जी सकें. पर आपराधिक तरीके से जबरन वसूली करने वाले किन्नरों से परिवारों को सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी स्थानीय पुलिस को तत्परता से निभानी चाहिए, जबकि ऐसा नहीं होता. इस समस्या को भी गंभीरता से लेने की ज़रूरत है.

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-भारत एक्सप्रेस

विनीत नारायण, वरिष्ठ पत्रकार

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